सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को छत्तीसगढ़ में एक सोशल वर्कर के खिलाफ फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज FIR पर सवाल उठाए। पोस्ट में महिलाओं पर लगाए गए ऐतिहासिक 'ब्रेस्ट टैक्स' को लेकर टिप्पणी की गई थी, जिसे कथित तौर पर हिंदू महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक बताया गया। कोर्ट ने सवाल किया कि इस मामले में FIR दर्ज करने की जरूरत ही क्या थी। साथ ही कहा कि पुलिस को ऐसे मामलों के बजाय बड़े मामलों पर ध्यान देना चाहिए।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने रुपनारायण एक्का की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। एक्का ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस महादेवन ने टिप्पणी की, “FIR दर्ज करने की क्या जरूरत है? बड़े मामलों पर ध्यान दीजिए। इस तरह के मामलों पर नहीं।”
प्रशांत भूषण बोले- फेसबुक पोस्ट में कोई अपराध नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि फेसबुक पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं था, जो अपराध की श्रेणी में आता हो। उन्होंने कहा कि पोस्ट में केवल यह कहा गया था कि हिंदुओं को बताया जाना चाहिए कि महिलाओं के स्तन ढकने पर लगाया जाने वाला टैक्स औरंगजेब ने नहीं, बल्कि किसी ब्राह्मण ने लगाया था।
प्रशांत भूषण ने कहा कि यह पोस्ट किसी अपराध के दायरे में नहीं आता है और मामला पूरी तरह निराधार है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “इसीलिए हमने इस मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार किया है।”
भूषण ने आगे कहा कि यह इतिहास को लेकर उनका नजरिया है, जो गलत भी हो सकता है, लेकिन यह उनका विचार है। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, “इसका मतलब है कि लोगों के पास समय बर्बाद करने के लिए बहुत समय है।”
पुलिस के सामने पेश नहीं होने पर कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितंबर को नोटिस जारी किया था, लेकिन उसके बाद से एक्का पुलिस थाने में पेश नहीं हुए हैं। इस पर कोर्ट ने कहा, “आप उन्हें समन कीजिए। वह पेश होंगे।”
राज्य के वकील ने अदालत को बताया कि एक्का को पेश होने के लिए नोटिस उसी दिन जारी किया जा रहा है। वहीं, प्रशांत भूषण ने राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत याचिका पर जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाया।
राज्य सरकार के वकील के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई 4 दिसंबर तक टाल दी। अदालत ने एक्का को मिली अंतरिम राहत भी अगली सुनवाई तक बढ़ा दी। सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने जांच में सहयोग करने की शर्त पर उनके खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था।
क्या है मामला?
यह मामला छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के कुनकुरी पुलिस थाने में दर्ज FIR से जुड़ा है। एक्का के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 299 और धारा 353(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। धारा 299 धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से धार्मिक मान्यताओं का जानबूझकर अपमान करने से संबंधित है, जबकि धारा 353(2) समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने के इरादे से झूठी जानकारी या अफवाह फैलाने से संबंधित है।
पुलिस के मुताबिक, एक्का ने 13 अप्रैल 2025 को सोशल मीडिया पर हिंदू महिलाओं के संबंध में कथित अपमानजनक सामग्री पोस्ट की थी। इसके बाद ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष दीपक मिश्रा ने शिकायत दर्ज कराई।
एक्का ने अग्रिम जमानत के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन 15 दिसंबर 2025 को उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने दूसरी अग्रिम जमानत याचिका दायर की। इसमें उन्होंने हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि दूसरे मामले में जमानत पर रिहा होने के बाद उन्होंने कथित अपराध किया।
हाईकोर्ट ने 3 जुलाई को दूसरी याचिका भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि परिस्थितियों में ऐसा कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ है, जिसके आधार पर पहले फैसले से अलग रुख अपनाया जाए। हाईकोर्ट ने एक्का के इसी तरह के अन्य मामलों में कथित तौर पर शामिल होने का भी उल्लेख किया था।
इसके बाद एक्का ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 4 दिसंबर को तय की है और तब तक उन्हें मिली अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी।
