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ट्रंप के विरोधी लूला की जीत क्यों है खास? ब्राजील से पूरे लैटिन अमेरिका को क्या संदेश मिला?

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की जीत को सिर्फ एक देश के चुनावी नतीजे के तौर पर नहीं, बल्कि लैटिन अमेरिका की राजनीति, अमेरिकी प्रभाव और वामपंथी विचारधारा के भविष्य के संदर्भ में देखा जा सकता है।

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ट्रंप के विरोधी लूला की जीत क्यों है खास? (AI Photo)

दुनिया की राजनीति में डोनाल्ड ट्रंप के बढ़ते प्रभाव के बीच ब्राजील से ऐसा जनादेश आया है, जिसने लैटिन अमेरिका की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के मुखर आलोचक लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की जीत को सिर्फ एक राष्ट्रपति की वापसी नहीं, बल्कि वामपंथी राजनीति, राष्ट्रीय संप्रभुता और अमेरिकी दबदबे के खिलाफ उठती आवाज के तौर पर भी देखा जा रहा है। एक तरफ ट्रंप के करीब माने जाने वाले दक्षिणपंथी नेताओं का प्रभाव बढ़ने की चर्चा है, तो दूसरी तरफ ब्राजील के मतदाताओं ने लूला पर भरोसा जताया है। सवाल है कि आखिर लूला की जीत इतनी अहम क्यों है? क्या यह लैटिन अमेरिका में वामपंथ को नई ताकत देगी और क्या ब्राजील अमेरिका के दबाव के बीच अपनी स्वतंत्र विदेश और आर्थिक नीति बनाए रखने में कामयाब होगा?

25 अक्टूबर 2026 को हुए दूसरे दौर के मतदान में लूला ने दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लावियो बोल्सोनारो को करीब 44 लाख वोटों से हराया। निर्वाचन अधिकारियों के मुताबिक, लूला को 51.8 प्रतिशत और बोल्सोनारो को 48.2 प्रतिशत वैध वोट मिले। यह मुकाबला इसलिए भी खास रहा, क्योंकि पहले दौर में लूला अपने प्रतिद्वंद्वी से पीछे थे, लेकिन दूसरे दौर में उन्होंने बाजी पलट दी

ट्रंप के विरोधी लूला की जीत क्यों है खास?

लूला की जीत का एक बड़ा पहलू अमेरिका के साथ ब्राजील के संबंध हैं। ट्रंप प्रशासन की नीतियों और लैटिन अमेरिका में बढ़ते अमेरिकी प्रभाव की लूला आलोचना करते रहे हैं। दूसरी ओर, फ्लावियो बोल्सोनारो को ट्रंप का करीबी माना जाता है। ऐसे में चुनाव में लूला की जीत से उन राजनीतिक समूहों को राहत मिली है, जो लैटिन अमेरिकी देशों की नीतियों में अमेरिकी दबाव के बढ़ने का विरोध करते हैं।

लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की जीत के बाद उनके सपोर्टर (फोटो- AP)

लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा की जीत के बाद उनके सपोर्टर (फोटो- AP)

ब्राजील इस क्षेत्र की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इसलिए यहां की सत्ता में कौन है, इसका असर केवल देश की घरेलू नीतियों तक सीमित नहीं रहता। व्यापार, निवेश, क्षेत्रीय सहयोग और अमेरिका के साथ संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। ट्रंप की ओर से लगाए गए शुल्कों और आर्थिक दबाव के बीच लूला की वापसी यह संकेत देती है कि ब्राजील अपनी आर्थिक और विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने पर जोर जारी रख सकता है। हालांकि, चुनाव परिणाम अपने आप में यह साबित नहीं करता कि अमेरिका के साथ ब्राजील के संबंध पूरी तरह बदल जाएंगे।

लैटिन अमेरिका में वामपंथ बनाम दक्षिणपंथ की लड़ाई

लूला की जीत ऐसे समय में हुई है, जब लैटिन अमेरिका के कई देशों में दक्षिणपंथी राजनीति और ट्रंप के साथ वैचारिक नजदीकी रखने वाले नेताओं का प्रभाव चर्चा में है। इस पृष्ठभूमि में ब्राजील के चुनाव ने दिखाया कि दक्षिणपंथी राजनीति की बढ़ती मौजूदगी के बावजूद वामपंथी नेता मतदाताओं का समर्थन हासिल कर सकते हैं।

लूला की जीत के बाद मेक्सिको और ब्राजील जैसे क्षेत्र के दो बड़े देशों में वामपंथी झुकाव वाले नेतृत्व की मौजूदगी बनी हुई है। मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शिनबाम ने लूला को बधाई देते हुए लोकतंत्र और ब्राजील की जनता की जीत का उल्लेख किया। क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कैनेल ने भी उन्हें बधाई दी और शांति, संप्रभुता तथा सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की बात कही। इन प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि क्षेत्र के वामपंथी नेताओं के लिए लूला की जीत राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व रखती है।

हालांकि, पूरे लैटिन अमेरिका को एक ही राजनीतिक विचारधारा के खेमे में रखना सही नहीं होगा। अलग-अलग देशों के नेताओं की प्राथमिकताएं और नीतियां अलग हैं। चिली के राष्ट्रपति जोस एंटोनियो कास्त और इक्वाडोर के राष्ट्रपति डैनियल नोबोआ ने भी लूला को बधाई दी। उन्होंने आर्थिक एकीकरण, संगठित अपराध से मुकाबले और क्षेत्रीय सहयोग जैसे साझा मुद्दों पर जोर दिया। इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद देशों के बीच सहयोग की जरूरत बनी रहती है।

पहले दौर में पिछड़े, फिर कैसे पलटी बाजी?

लूला के लिए चुनावी जीत आसान नहीं थी। पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो को 47.03 प्रतिशत और लूला को 45.16 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी लूला करीब 22 लाख वोटों से पीछे रह गए थे। इसके बाद उन्होंने अपने प्रचार अभियान की रणनीति बदली और युवा मतदाताओं सहित उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश की, जो अब तक किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में स्पष्ट रूप से नहीं थे। चुनाव में महंगाई, रोजमर्रा की चीजों की कीमतें, अपराध और सुरक्षा जैसे मुद्दे अहम रहे। बोल्सोनारो ने अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई और खाद्य पदार्थों की कीमतें घटाने का वादा किया। वहीं, लूला ने सामाजिक सहायता और आर्थिक प्रोत्साहन योजनाओं पर जोर दिया। दोनों नेताओं और उनके सहयोगियों के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों ने भी चुनावी बहस को प्रभावित किया।

लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा (फोटो- AP)

लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा (फोटो- AP)

लूला का राजनीतिक सफर: ट्रेड यूनियन से राष्ट्रपति भवन तक

लूला की राजनीतिक यात्रा कई उतार-चढ़ाव से गुजरी है। उन्होंने 1970 के दशक में ट्रेड यूनियन नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई और बाद में वर्कर्स पार्टी की स्थापना में मदद की। 2002 में वह पहली बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और 2006 में दोबारा चुने गए। उनके शुरुआती कार्यकाल में सामाजिक नीतियां और श्रमिकों से जुड़े मुद्दे उनकी राजनीति के प्रमुख हिस्से रहे।

बाद के वर्षों में ब्राजील की राजनीति भ्रष्टाचार के आरोपों और सत्ता संघर्ष से प्रभावित हुई। लूला को भी भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी ठहराया गया और उन्हें 580 दिन जेल में बिताने पड़े। बाद में ब्राजील के सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा रद्द कर दी, जिससे उनके राजनीतिक जीवन में वापसी का रास्ता खुला। 2022 में उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो को बेहद करीबी मुकाबले में हराया और 2023 में फिर सत्ता संभाली। 2026 का चुनाव उनके राजनीतिक सफर का एक और ऐतिहासिक पड़ाव बन गया। पहले दौर में पिछड़ने के बावजूद दूसरे दौर में जीत हासिल कर उन्होंने चौथा गैर-लगातार राष्ट्रपति कार्यकाल सुनिश्चित किया।

चुनाव के बाद विवाद, क्या नतीजे स्वीकार करेंगे बोल्सोनारो?

चुनाव के नतीजे आने के बाद भी विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। मतदान का निर्धारित समय समाप्त होने से कुछ मिनट पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश क्रिस्टियानो जानिन ने मतदान की अवधि दो घंटे बढ़ाने का फैसला किया। लूला के चुनाव अभियान ने साओ पाउलो और साल्वाडोर में मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाने वाली बसों से जुड़ी समस्याओं का हवाला दिया था। बोल्सोनारो के पक्ष ने भी दक्षिणी इलाकों में खराब मौसम के कारण मतदान का समय बढ़ाने का अनुरोध किया था।

हालांकि, मतदान अवधि बढ़ाने के फैसले पर सवाल उठाते हुए बोल्सोनारो ने हार स्वीकार करने से इनकार किया और चुनाव परिणाम रद्द करने की मांग की। उनके सहयोगियों ने इस फैसले को लेकर न्यायाधीश के पहले लूला के वकील रहने का मुद्दा भी उठाया।

ब्राजील से लैटिन अमेरिका को क्या संदेश मिला?

लूला की जीत का सबसे बड़ा संदेश यह है कि लैटिन अमेरिका की राजनीति में कोई एक विचारधारा स्थायी रूप से हावी नहीं है। दक्षिणपंथी राजनीति और ट्रंप के साथ करीबी संबंध रखने वाले नेताओं के बढ़ते प्रभाव के बीच ब्राजील के मतदाताओं ने एक ऐसे नेता को फिर चुना, जो सामाजिक न्याय, श्रमिक अधिकारों और राष्ट्रीय संप्रभुता पर जोर देता है।

लेकिन इस जीत को केवल ट्रंप की हार या वामपंथ की निर्णायक जीत के रूप में देखना भी अधूरा होगा। लूला को महंगाई, सुरक्षा, भ्रष्टाचार के आरोपों और गहरे राजनीतिक विभाजन जैसी चुनौतियों से निपटना होगा। इसके अलावा, ब्राजील की संसद और क्षेत्रीय राजनीति में दक्षिणपंथी ताकतों की मौजूदगी भी उनकी सरकार के लिए अहम होगी।

कुल मिलाकर, लूला की वापसी यह बताती है कि ब्राजील अपनी राजनीतिक दिशा खुद तय करना चाहता है और अमेरिका के साथ संबंधों में अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने की कोशिश कर सकता है। लैटिन अमेरिका के दूसरे देशों के लिए भी यह चुनाव इस बात का उदाहरण है कि मतदाताओं का फैसला क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है। अब असली परीक्षा यह होगी कि लूला अपने चुनावी वादों को किस हद तक पूरा करते हैं और क्या उनकी सरकार आर्थिक दबावों के बीच ब्राजील की संप्रभुता तथा सामाजिक नीतियों के एजेंडे को आगे बढ़ा पाती है।

Shishupal Kumar
शिशुपाल कुमारauthor

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय और क्राइम रिपोर्टिंग में गहरी रुचि और मजबूत पकड़ के साथ वे समाचारों की बारीकियों को समझने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। शिशुपाल ने अपने करियर की शुरुआत एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के रूप में की, जहां उन्होंने प्रोडक्शन से लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग तक पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में काम किया। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों स्तरों पर उनकी दक्षता है। अब तक शिशुपाल कुमार 15,000 से अधिक खबरें प्रकाशित कर चुके हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज, रियल-टाइम कवरेज, डेटा-आधारित विश्लेषण और एक्सप्लेनर लिखने में खास महारत रखते हैं। उनकी स्टोरीज तथ्यों की सटीकता और सहज भाषा की वजह से पाठकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ती हैं।

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