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CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर उठे सवालों पर EC का सुप्रीम कोर्ट में जवाब, कहा-एक न्यूज रिपोर्ट के आधार पर दायर हुई याचिका

CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर सवाल उठाने वाली याचिका पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दाखिल किया। आयोग ने कहा कि याचिका एक न्यूज रिपोर्ट पर आधारित है।

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EC का सुप्रीम कोर्ट में जवाब (फाइल फोटो)

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में काउंटर एफिडेविट दाखिल किया है। आयोग ने याचिका के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह पूरी तरह एक न्यूज रिपोर्ट पर आधारित है। आयोग के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने संबंधित खबर में किए गए दावों की पुष्टि के लिए आयोग से तथ्यात्मक स्थिति जानने का प्रयास भी नहीं किया था।

कल सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से पहले दाखिल हलफनामे में आयोग ने कहा है कि जवाब दाखिल करने के लिए इस हलफनामे को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों सहित आयोग के तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। आयोग ने याचिका को गलत धारणाओं पर आधारित बताते हुए कहा है कि इसे कानूनन सुनवाई योग्य नहीं माना जाना चाहिए और खारिज किया जाना चाहिए।

SIR के तीनों आदेश सर्वसम्मति से लिए गए फैसले: आयोग

चुनाव आयोग ने साफ किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े तीनों आदेश- 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026- आयोग के सर्वसम्मत फैसलों के आधार पर जारी किए गए थे। आयोग ने कहा कि ये आदेश संविधान के अनुच्छेद 324 और संबंधित चुनाव कानूनों के तहत जारी किए गए। आयोग ने हलफनामे में बताया कि किसी फाइल पर विचार के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त या अन्य निर्वाचन आयुक्तों की टिप्पणियां, सवाल, सुझाव अथवा अलग-अलग विचार अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं होते। आयोग के अनुसार, किसी प्रस्ताव पर संबंधित अधिकारियों और सदस्यों के विचारों पर विचार करने के बाद सक्षम प्राधिकारी निर्णय लेता है।

हलफनामे के मुताबिक, आयोग में फाइलें सामान्य तौर पर पहले एक निर्वाचन आयुक्त, फिर दूसरे निर्वाचन आयुक्त और उसके बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास जाती हैं। हालांकि, तत्काल आदेश जारी करने की जरूरत होने पर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सदस्यों की मंजूरी ली जा सकती है और बाद में उसे आधिकारिक फाइल पर दर्ज किया जाता है। आयोग ने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों को कुछ शक्तियां सौंपी गई हैं, उन्हें उन्हीं शक्तियों के दायरे में काम करना चाहिए। यदि कोई अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

28 जुलाई के वर्क अलोकेशन आदेश पर क्या कहा?

आयोग ने आंतरिक कामकाज के बंटवारे से जुड़े 28 जुलाई 2026 के आदेश पर भी अपना पक्ष रखा है। हलफनामे के मुताबिक, यह आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए अतिरिक्त सचिव स्तर के एक आईएएस अधिकारी ने जारी किया था। आयोग ने कहा कि दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने अगले दिन, यानी 29 जुलाई को, इस आदेश और संबंधित अधिकारी के आचरण को लेकर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इसके बाद दोनों निर्वाचन आयुक्तों के 30 जुलाई के संयुक्त निर्देश के मद्देनजर 28 जुलाई के आदेश को कभी लागू नहीं किया गया।

फॉर्म-6 में संशोधन नहीं, SIR का घोषणा पत्र अलग दस्तावेज: ECI

मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में कथित बदलाव को लेकर आयोग ने कहा है कि उसने इस फॉर्म में कोई संशोधन नहीं किया है। हलफनामे के अनुसार, फॉर्म-6 में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।आयोग ने दलील दी कि SIR के दौरान इस्तेमाल किया जाने वाला घोषणा पत्र फॉर्म-6 से अलग दस्तावेज है। इसका इस्तेमाल मतदाता की पात्रता और पुराने मतदाता रिकॉर्ड से उसके विवरण को जोड़ने यानी मैपिंग में सहायता के लिए किया जाता है।

आयोग ने बताया कि बिहार में SIR के दौरान सामने आए अनुभवों के बाद बाद के आदेशों में घोषणा पत्र के प्रारूप में बदलाव किया गया। इसके जरिए आवेदक अपने या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड का विवरण दे सकते हैं। यदि पुराने रिकॉर्ड से संबंधित विवरण उपलब्ध नहीं हैं या नहीं दिए जाते, तो निर्धारित दस्तावेजों के साथ फॉर्म-6 जमा किया जा सकता है।हालांकि, आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रणाली में घोषणा पत्र जिस तरह प्रदर्शित किया गया था, उससे ऐसा आभास हो सकता था कि फॉर्म-6 में संशोधन कर दिया गया है।

इस समस्या को दूर करने के लिए आयोग ने कहा है कि 21 अक्टूबर 2026 के निर्णय के बाद ऑनलाइन आवेदन को दो अलग हिस्सों में बांटने का फैसला किया गया है- पहला, नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म-6 और दूसरा, SIR का घोषणा पत्र। इस तरह ऑनलाइन आवेदन भी भौतिक फॉर्म की तरह अलग-अलग दस्तावेजों के रूप में उपलब्ध होगा।

अनमैप्ड मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाना जरूरी नहीं

SIR के दौरान पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नहीं जुड़ पाने वाले यानी अनमैप्ड मतदाताओं को लेकर आयोग ने कहा है कि ऐसे सभी मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाना आवश्यक नहीं होगा।हलफनामे के मुताबिक, 26 सितंबर 2026 को आयोग ने फैसला किया था कि यदि SIR के दौरान किसी मतदाता को अनमैप्ड होने या तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किया जाता है, तो बूथ लेवल अधिकारी (BLO) उसके घर जाकर दस्तावेज एकत्र करेंगे और उन्हें ECINet पर अपलोड करेंगे। इसके बाद निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) मामले पर फैसला लेंगे।

आयोग ने कहा है कि केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सुनवाई की जरूरत होगी। ऐसी सुनवाई भी प्राथमिकता के आधार पर ऑनलाइन कराई जाएगी। जरूरत पड़ने पर मतदाता की ओर से परिवार का कोई वयस्क सदस्य भी सुनवाई में शामिल हो सकेगा। आयोग ने यह भी कहा कि जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए जिला निर्वाचन अधिकारियों को हेल्प डेस्क और विशेष शिविरों की व्यवस्था करने को कहा गया है।

ECINet पर ERO के आदेश के बिना नाम नहीं जोड़ा या हटाया जा सकता

ECINet पोर्टल की कार्यप्रणाली को लेकर आयोग ने कहा है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या सुधार करने का वैधानिक अधिकार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के पास है। पोर्टल के माध्यम से इन अधिकारों का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या बदला नहीं जाता।आयोग ने ECINet की सुरक्षा और कानून के अनुपालन की जांच के लिए विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने की जानकारी भी दी है। हलफनामे के अनुसार, इस समिति की अध्यक्षता वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त कर रहे हैं और इसमें IIT तथा IISc के विशेषज्ञ शामिल हैं।

आयोग ने कहा है कि पोर्टल में सुधार के लिए अधिकारियों और फील्ड कर्मचारियों से मिलने वाले सुझावों पर भी विचार किया जा रहा है। नए मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़े प्रस्तावों पर पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा होगी और उसके बाद आयोग की मंजूरी ली जाएगी।

गोवा में 97 मतदाताओं के मामलों पर आयोग का स्पष्टीकरण

गोवा में मतदाता सूची से कथित रूप से छूटे 97 मतदाताओं के मामलों पर आयोग ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट का हवाला दिया है।रिपोर्ट के मुताबिक, इन 97 मामलों में से 88 में फॉर्म-6 पहले ही भरा जा चुका था और उसे स्वीकार कर लिया गया था या उस पर प्रक्रिया जारी थी। छह मामलों में फॉर्म-6 नहीं भरा गया था; इनमें विदेशी नागरिक, विदेश में मौजूद या स्थानांतरित मतदाताओं से जुड़े मामले शामिल थे। बाकी तीन लोगों के पास पुर्तगाली पासपोर्ट होने की जानकारी दी गई।आयोग ने इन आंकड़ों के जरिए यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि सभी 97 मामले मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के समान नहीं हैं।

पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम जोड़ने की अपीलों पर आयोग का पक्ष

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों पर भी आयोग ने अपना पक्ष रखा है। हलफनामे के मुताबिक, इन अपीलों को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय के अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दाखिल किया था।आयोग ने कहा कि इन मामलों को उसके समक्ष नहीं लाया गया था। हलफनामे में संबंधित मतदाताओं के बारे में यह भी कहा गया है कि उनके नाम पहले से मतदाता सूची में दर्ज हैं और वे संबंधित विधानसभा चुनाव में मतदान करने के हकदार हैं। आयोग के अनुसार, उनके दस्तावेज पोर्टल पर उपलब्ध हैं और उनके पक्ष में न्यायिक अधिकारी का अनुकूल आदेश भी मौजूद है।आयोग ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के उन आदेशों का भी उल्लेख किया है, जिनमें SIR प्रक्रिया के दौरान दावों और आपत्तियों के निपटारे तथा अपीलों की सुनवाई के लिए व्यवस्था का जिक्र है।

CEC को हटाने की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: चुनाव आयोग

मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कामकाज पर रोक लगाने की मांग को लेकर आयोग ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया है। हलफनामे के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है।आयोग ने कहा कि CEC के कामकाज को रोकने की मांग करने वाली याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। आयोग ने यह भी दलील दी कि बहुमत या सर्वसम्मति के आधार पर निर्णय लेने की व्यवस्था को नजरअंदाज करके ऐसे आदेश की मांग करना 2023 के कानून में निर्धारित निर्णय प्रक्रिया के विपरीत होगा और इससे आयोग का कामकाज प्रभावित हो सकता है। हलफनामे में आयोग ने दोहराया कि याचिका को खारिज किया जाना चाहिए।

आयोग ने आंतरिक फाइलें मीडिया को देने से इनकार किया

याचिका में समाचार रिपोर्ट के आधार पर उठाए गए सवालों के जवाब में आयोग ने कहा कि उसने किसी भी आंतरिक नोट या फाइल को किसी समाचार एजेंसी या मीडिया संस्थान को जारी नहीं किया और न ही उसे जारी करने की अनुमति दी।आयोग ने दलील दी कि कानून की नजर में किसी समाचार रिपोर्ट को केवल उसके प्रकाशित होने के आधार पर तथ्यों का प्रमाण नहीं माना जा सकता। आयोग के मुताबिक, याचिका में रिपोर्ट में किए गए दावों को ही आधार बनाया गया है, जबकि याचिकाकर्ता ने संबंधित तथ्यों की पुष्टि करने का प्रयास नहीं किया।

EVM पर पुराने आरोपों का भी दिया हवाला

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से जुड़े आरोपों पर आयोग ने कहा कि इस तरह की चुनौतियों को सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार खारिज कर चुका है। हलफनामे में पूर्व के विभिन्न फैसलों और आदेशों का उल्लेख करते हुए आयोग ने याचिका में उठाए गए EVM संबंधी सवालों को गलत और भ्रामक बताया है।आयोग ने यह भी कहा कि SIR की प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत संचालित की जा रही है और इस प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं को सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपने फैसले में स्वीकार कर चुका है।

दशहरा अवकाश के कारण संक्षिप्त जवाब, विस्तृत हलफनामा दाखिल करने की अनुमति मांगी

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि दशहरा अवकाश के कारण फिलहाल संक्षिप्त जवाब दाखिल किया गया है। आयोग ने अदालत से विस्तृत बिंदुवार जवाब दाखिल करने की अनुमति देने का अनुरोध किया है। गौरतलब है कि यह काउंटर एफिडेविट आयोग के उप निर्वाचन आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु की ओर से दाखिल किया गया है। इसमें आयोग ने याचिका में लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए अपनी निर्णय प्रक्रिया, SIR के आदेशों, फॉर्म-6, ECINet और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के संवैधानिक संरक्षण से जुड़े पहलुओं पर अपना पक्ष रखा है। इन दलीलों पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को करना है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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