दिल्ली पुलिस ने Jantar Mantar को प्रदर्शन स्थलों की लिस्ट से हटा लिया है। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से प्रदर्शन के लिए रामलीला मैदान, सीबीडी मैदान और बुराड़ी ग्राउंड जाने को कहा है। हालांकि, जंतर-मंतर का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और इस पर कोई भी फैसला अब सुप्रीम कोर्ट से ही आएगा। दिल्ली देश की राजधानी है और देशभर के मुद्दों को लेकर यहां अक्सर धरने-प्रदर्शन होते रहते हैं। जंतर-मंतर में दशकों से लोग और संगठन अपनी-अपनी मांगों के साथ आते और नारा बुलंद करते हैं। चलिए समझते हैं जंतर-मंतर और अन्य प्रदर्शन स्थलों में क्या फर्क है? क्यों जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस के फैसले के बाद लोगों में रोष है?
दिल्ली में किसी बड़े विरोध प्रदर्शन, धरने या जनसभा के आयोजन के लिए जगह चुनना सिर्फ भीड़ जुटाने का मामला नहीं है। आयोजन स्थल का किराया, वहां की क्षमता, पुलिस की अनुमति, ट्रैफिक व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े नियम भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि रामलीला मैदान, जंतर-मंतर, शाहदरा के CBD ग्राउंड और बुराड़ी ग्राउंड जैसे स्थानों की चर्चा होती है।
Ramlila Maidan में किसी विरोध प्रदर्शन के आयोजन के लिए करीब 1.21 लाख रुपये प्रतिदिन का शुरुआती खर्च बताया जाता है। जबकि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए किसी तरह का शुल्क नहीं लगता। हालांकि, दोनों स्थानों की क्षमता और इस्तेमाल से जुड़े नियम भी अलग हैं। बड़े आयोजनों के लिए बुराड़ी ग्राउंड जैसे विकल्प भी मौजूद हैं।
इस पूरे मामले को पांच अहम प्रश्नों के जरिए समझते हैं - किस जगह की कितनी क्षमता है, कहां कितना खर्च आएगा, रामलीला मैदान के हिस्से की बुकिंग क्यों नहीं होती और इंडिया गेट पर प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं है।
बुकिंग का कितना खर्च और भीड़?
रामलीला मैदान लगभग 12 एकड़ में फैला हुआ है और यहां एक समय में लगभग 50 हजार लोगों जुट सकते हैं। इसके मुकाबले जंतर-मंतर पर लगभग 3 हजार लोगों की भीड़ के हिसाब से प्रदर्शन आयोजित किए जाते रहे हैं। यानी दोनों स्थानों की क्षमता में बहुत बड़ा अंतर है।
रामलीला मैदान की बुकिंग का शुरुआती खर्च टैक्स और जमा राशि सहित करीब 1.21 लाख रुपये प्रतिदिन है। जंतर-मंतर पर पहले प्रदर्शन के लिए अलग से मैदान का किराया नहीं लिया जाता। हालांकि, दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर 2026 के आदेश के तहत जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है। इस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर आज ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब भी मांगा है।
दूसरे मैदान कौन से हैं?
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाए जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने जो तीन विकल्प दिए हैं उनकी क्षमता और संसद से दूरी भी अलग-अलग है।
रामलीला मैदान
सेंट्रल दिल्ली में मौजूद रामलीला मैदान की क्षमता 50 हजार लोगों की है और यह लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद से 6 किमी दूर है। बड़े धरनों और जनसभाओं के लिए यह प्रमुख स्थल है।
CBD ग्राउंड
पूर्वी दिल्ली के शाहदरा क्षेत्र में क्रॉस रिवर मॉल के पास मौजूद इस ग्राउंड की क्षमता 15000 लोगों की है। यह संसद से लगभग 14 किमी की दूरी पर मौजूद है।
बुराड़ी ग्राउंड
उत्तरी दिल्ली में मौजूद यह ग्राउंड दिल्ली का सबसे बड़ा धरना स्थल है। इसकी क्षमता लगभग 80 हजार लोगों की है। यह संसद से 22-23 किमी दूर है। लगभग 50 एकड़ में फैला यह मैदान बड़ी रैलियों के लिए निर्धारित विकल्पों में शामिल है।
इन आंकड़ों से यह तो साफ है कि दिल्ली में प्रदर्शन के लिए जगह चुनते समय सिर्फ लोगों की संख्या ही नहीं, बल्कि संसद और प्रमुख सरकारी दफ्तरों से उस स्थल की दूरी भी मायने रखती है। जंतर-मंतर के संसद के नजदीक होने से माना जाता है कि सरकार तक आवाज जल्दी और ऊंचे सुर में पहुंचती है।
रामलीला मैदान की बुकिंग
50 हजार की क्षमता वाला रामलीला मैदान काफी बड़ा है। प्रश्न ये है कि क्या अलग-अलग संगठन एक ही दिन मैदान के अलग-अलग हिस्से किराए पर लेकर प्रदर्शन कर सकते हैं? उत्तर है नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि मैदान का एक हिस्सा भारी वाहनों की पार्किंग के लिए निर्धारित है, जबकि शेष खुला हिस्सा आयोजनों के लिए रखा जाता है। मौजूदा व्यवस्था में बुकिंग वाले खुले हिस्से को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर कई आयोजकों को एक साथ नहीं दिया जाता है।

जंतर-मंतर का मामला सुप्रीम कोर्ट में
इसके पीछे जगह के प्रबंधन, भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा और आयोजनों के बीच टकराव से बचने जैसे व्यावहारिक कारण हो सकते हैं। किसी तरह के आयोजन की योजना बनाने वाले व्यक्ति नगर निगम से इस संबंध में लिखित जानकारी ले सकते हैं।
इंडिया गेट पर प्रदर्शन क्यों नहीं?
एक प्रश्न ये है कि इंडिया गेट पर जगह बहुत अधिक है और यहां से किसी भी प्रदर्शन के लिए विजिब्लिटी की भी समस्या नहीं होगी। फिर इंडिया गेट पर प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं दी जाती? जैसा कि आप जानते हैं, इंडिया गेट देश का प्रमुख युद्ध स्मारक है। यहां हर रोज बड़ी संख्या में पर्यटक और आम लोग घूमने आते हैं। इसके आसपास के इलाके में कई अहम सरकारी भवन, केंद्रीय मार्ग और सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील स्थान मौजूद हैं।
ऐसे में बड़े विरोध प्रदर्शन से यातायात बाधित होने, पर्यटकों को परेशानी होने और सुरक्षा व्यवस्था पर ज्यादा दबाव पड़ने की आशंका रहती है। यही कारण है कि इंडिया गेट और सेंट्रल विस्टा के आसपास प्रदर्शन पर पाबंदियां लागू की जाती रही हैं। वैसे भी दिल्ली में प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने का अधिकार पुलिस और संबंधित प्रशासन के पास है।
छोटे प्रदर्शन को 6 घंटे के नोटिस पर अनुमति क्यों नहीं
कई बार किसी सरकारी फैसले, स्थानीय समस्या या अचानक सामने आए मुद्दे पर कुछ दर्जन लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं। ऐसे मामलों में लंबी प्रक्रिया परेशानी पैदा कर सकती है। इसलिए छोटे प्रदर्शनों के लिए छह घंटे के नोटिस पर विचार किया जाना चाहिए। इसके तहत आयोजकों को पहले से बताना होगा कि कितने लोग आएंगे, प्रदर्शन कहां होगा और कितनी देर चलेगा। पुलिस सुरक्षा या यातायात से जुड़ी किसी वास्तविक समस्या के आधार पर जरूरी कदम उठा सकती है।
जैसा प्रदर्शन वैसे इंतजाम
अगर कुछ लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखते हैं, सड़क नहीं रोकते और एंबुलेंस या दूसरी इमरजेंसी सेवाओं का रास्ता खुला रखते हैं, तो क्या उनके लिए भी वही प्रक्रिया होनी चाहिए जो हजारों लोगों की रैली के लिए लागू होती है? एक विकल्प यह हो सकता है कि प्रदर्शन को उसके आकार और संभावित प्रभाव के आधार पर अलग-अलग कैटेगरी में बांटा जाए।
- छोटा प्रदर्शन- कम लोगों के साथ सीमित समय के लिए, आसान प्रक्रिया।
- मध्यम प्रदर्शन- पहले से सूचना और बुनियादी सुरक्षा इंतजाम।
- बड़ा प्रदर्शन- विस्तृत अनुमति, भीड़ प्रबंधन और यातायात की योजना।
लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन का अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था, दोनों महत्वपूर्ण हैं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा और आम लोगों की सुविधा बनाए रखे। वहीं, प्रदर्शन करने वालों के लिए भी नियमों का पालन करना जरूरी है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि अगर लोगों को अपनी बात रखने के लिए महंगी बुकिंग, लंबा इंतजार और दूर के विकल्पों का सामना करना पड़े, तो क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अवसर वास्तव में उसकी पहुंच में है?
