लोकतंत्र केवल चुनाव कराने, सरकार बनाने या बहुमत के आधार पर फैसले लेने का नाम नहीं है। उसकी असली मजबूती इस बात से भी तय होती है कि असहमति जताने वाले नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। शांतिपूर्ण विरोध सत्ता को जवाबदेह बनाता है, प्रशासन तक नागरिकों की आवाज पहुंचाता है और असंतोष को लोकतांत्रिक तरीके से व्यक्त करने का अवसर देता है। लेकिन विरोध के अधिकार का अर्थ कानून तोड़ने की छूट नहीं है। इसी तरह, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी का मतलब यह भी नहीं कि प्रशासन नागरिक अधिकारों से जुड़े सवालों का जवाब देने से बच सकता है। जंतर-मंतर दिल्ली की एक सड़क या धरना-प्रदर्शन की जगह भर नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक है, जहां नागरिक अपनी मांगों और शिकायतों को सत्ता तक पहुंचाने के लिए एकत्र होते हैं। किसानों से लेकर छात्रों, कर्मचारियों, महिलाओं और राजनीतिक संगठनों तक, अनेक समूहों ने यहां अपनी आवाज उठाई है। इसलिए जब जंतर-मंतर पर विरोध की गुंजाइश को लेकर सवाल उठते हैं, तो बहस किसी एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहती। यह लोकतंत्र में असहमति के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बहस बन जाती है।
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने और विरोध के लिए वैकल्पिक स्थान तय किए जाने के बाद यह सवाल और प्रासंगिक हो गया है। दिल्ली पुलिस ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी मैदान को प्रदर्शन स्थलों के रूप में अधिसूचित किया। इसके बाद 13 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका सहित अन्य लोगों ने कथित तौर पर बैरिकेड और बंद गेट पार कर जंतर-मंतर में प्रवेश किया। अगले दिन दोनों नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
पुलिस ने अतिक्रमण, निषेधाज्ञा के उल्लंघन, शांति बनाए रखने के बॉन्ड की शर्तें तोड़ने और सरकारी कर्मचारी के काम में बाधा डालने जैसे आरोपों के तहत कार्रवाई की।
इन घटनाओं के बीच कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते हैं। क्या प्रदर्शन स्थल बदलने से विरोध के अधिकार की प्रभावशीलता प्रभावित होती है? क्या बैरिकेड पार करने के आरोप अपने आप में कठोर कार्रवाई को उचित ठहराते हैं? क्या पांच दिन की न्यायिक हिरासत जरूरी थी? और सबसे अहम, कानून लागू करने वाली पुलिस की कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?
विरोध का अधिकार है, लेकिन सीमाएं भी हैं
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार असीमित नहीं है। किसी प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक व्यवस्था, आम लोगों की आवाजाही, सुरक्षा और दूसरों के अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है। प्रदर्शनकारियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे अपनी मांगों के समर्थन में हर नियम को मानने से इनकार कर दें। यदि किसी स्थान पर वैध प्रतिबंध लागू है और उसका उल्लंघन हुआ है, तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या कानून-व्यवस्था के नाम पर विरोध के लिए उपलब्ध जगह और अवसर इतने सीमित किए जा सकते हैं कि असहमति की आवाज का सार्वजनिक प्रभाव ही समाप्त हो जाए?
जंतर-मंतर जैसे स्थल का महत्व केवल उसकी भौगोलिक स्थिति में नहीं, बल्कि संसद और सत्ता के केंद्र के निकट होने में भी है। किसी प्रदर्शन को शहर के दूसरे छोर पर भेज देने से विरोध का अधिकार कागज पर कायम रह सकता है, लेकिन उसकी पहुंच, दृश्यता और राजनीतिक प्रभाव बदल सकते हैं। वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल तय करना अपने आप में अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। लेकिन यह देखना जरूरी है कि वे स्थल कितने सुलभ हैं, वहां पहुंचना कितना व्यावहारिक है और क्या वहां प्रदर्शनकारियों को अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने का वास्तविक अवसर मिलता है।
जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन पर रोक के लिए प्रशासन को अपने फैसले का आधार, उसकी अवधि और सुरक्षा संबंधी कारण स्पष्ट करने चाहिए। यदि भीड़, यातायात या सुरक्षा की वास्तविक चिंताएं हैं, तो उनका समाधान पारदर्शी नियमों, उचित अनुमति प्रक्रिया और व्यावहारिक वैकल्पिक व्यवस्थाओं के जरिए खोजा जाना चाहिए। नागरिकों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि प्रदर्शन स्थल तय करने का फैसला किसी विचार या असहमति को दबाने के लिए नहीं, बल्कि वास्तविक प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर लिया गया है। सुरक्षा के कारणों का होना महत्वपूर्ण है, लेकिन उन कारणों का स्पष्ट और तर्कसंगत होना भी उतना ही जरूरी है।
बैरिकेड पार करने पर बवाल
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू बैरिकेड और बंद गेट पार करने का आरोप है। विरोध का अधिकार कानून के दायरे में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यदि प्रदर्शनकारियों ने किसी वैध आदेश का उल्लंघन किया है, तो उसकी जांच और कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन यह तय करने के लिए कि किस पर क्या कार्रवाई उचित है, घटना की पूरी तस्वीर सामने आनी चाहिए। क्या उपलब्ध रिकॉर्डिंग से प्रत्येक आरोपी की भूमिका स्पष्ट होती है? क्या किसी ने हिंसा की, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डाली? या आरोप मुख्य रूप से प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने और आदेश का उल्लंघन करने तक सीमित हैं? इन सवालों का जवाब पूरी घटनाक्रम-श्रृंखला, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच से मिलना चाहिए। यदि बैरिकेड पार करने और वैध आदेश के उल्लंघन के पर्याप्त सबूत हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन सभी प्रदर्शनकारियों को एक ही नजर से देखना और उनकी व्यक्तिगत भूमिका की अनदेखी करना भी उचित नहीं होगा। आरोप की प्रकृति, उसकी गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखना जरूरी है। कानून का शासन इसी सिद्धांत पर टिका है कि आरोप लगाने वाली संस्था साक्ष्य पेश करे और संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले। पुलिस का आरोप अंतिम फैसला नहीं होता। उसका परीक्षण निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए।
क्या सौरव दास और आशुतोष रांका की हिरासत जरूरी थी?
सौरव दास और आशुतोष रांका को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने का सवाल भी इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए। दोनों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया और दोबारा शांति भंग होने की आशंका के आधार पर हिरासत का आदेश दिया गया। CJP की ओर से इस कार्रवाई और हिरासत की जरूरत पर सवाल उठाए गए हैं। यहां प्रश्न उठता है कि किसी व्यक्ति पर नियम तोड़ने का आरोप हो सकता है, लेकिन इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि उसे हिरासत में रखना ही एकमात्र आवश्यक विकल्प था। दूसरी ओर, यदि कानून के तहत हिरासत के पर्याप्त आधार मौजूद हैं, तो केवल प्रदर्शनकारी होने के कारण किसी को कानूनी प्रक्रिया से छूट भी नहीं मिल सकती। इसलिए हिरासत के आदेश का आधार, लागू कानूनी प्रावधान, कथित उल्लंघन की प्रकृति और कम कठोर विकल्पों की उपलब्धता देखना जरूरी है। ये सवाल न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध कानून के अनुरूप और आवश्यक सीमा तक ही लगाया जाए।
प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों को उठाकर ले जाते सुरक्षाकर्मी
पुलिस की कार्रवाई भी जवाबदेही के दायरे में हो
लोकतंत्र में पुलिस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उसे भीड़ नियंत्रित करनी होती है, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखनी होती है और संभावित हिंसा को रोकना होता है। लेकिन यही जिम्मेदारी पुलिस पर अतिरिक्त जवाबदेही भी डालती है। जंतर-मंतर पर कार्रवाई के दौरान क्या हुआ, प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए किन तरीकों का इस्तेमाल किया गया और क्या किसी के साथ बल प्रयोग हुआ- इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच से मिलना चाहिए। यदि पुलिस ज्यादती, मारपीट, अनुचित बल प्रयोग या कानूनी सहायता तक पहुंच रोकने के आरोप लगाए गए हैं, तो उन्हें बिना जांच खारिज करना उचित नहीं होगा। CJP की लीगल टीम के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि नेताओं को देर रात तक अपने वकीलों से मिलने नहीं दिया गया। इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित रिकॉर्ड के आधार पर जांच होनी चाहिए। यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि हिरासत में लिए गए लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी दी गई या नहीं, उनके परिवार और वकीलों को नियमानुसार सूचित किया गया या नहीं और गिरफ्तारी, हिरासत तथा पेशी से जुड़ी प्रक्रिया का पालन हुआ या नहीं।
यदि किसी शिकायत की जांच होनी है, तो उसके लिए विश्वसनीय और निष्पक्ष व्यवस्था भी उपलब्ध होनी चाहिए। पुलिस की कार्रवाई का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं हो सकता कि उसने भीड़ को नियंत्रित कर लिया। यह भी देखना होगा कि नियंत्रण के लिए अपनाए गए तरीके कानूनसम्मत और आवश्यक थे या नहीं।
ये सवाल पुलिस के अधिकारों को नकारने के लिए नहीं हैं, बल्कि उन अधिकारों के इस्तेमाल में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए हैं। यदि प्रदर्शनकारियों ने कानून तोड़ा है, तो उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि पुलिस ने कानून या निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन किया है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। कानून का शासन तभी विश्वसनीय बनता है, जब कानून प्रदर्शनकारियों और उसे लागू करने वाली संस्थाओं- दोनों पर समान रूप से लागू हो।
असहमति की सीमा कौन तय करेगा?
यह लोकतंत्र का सबसे बुनियादी सवाल है। प्रदर्शन की अनुमति, उसकी अवधि और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी शर्तें कानून तथा वैध प्रशासनिक आदेशों के तहत तय की जा सकती हैं। लेकिन उन आदेशों की वैधता और उनके इस्तेमाल पर न्यायिक समीक्षा तथा सार्वजनिक जवाबदेही का रास्ता खुला रहना चाहिए। प्रशासन को अपने सुरक्षा संबंधी फैसलों का औचित्य स्पष्ट करना चाहिए। पुलिस को अपनी कार्रवाई के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने चाहिए। प्रदर्शनकारियों को भी शांतिपूर्ण विरोध और लागू नियमों का पालन करना चाहिए। इनमें से किसी एक पक्ष की जिम्मेदारी दूसरे पक्ष की जिम्मेदारी को खत्म नहीं करती। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। यानी हर प्रशासनिक प्रतिबंध अपने आप अवैध नहीं है, लेकिन कानून-व्यवस्था का हवाला देना भी किसी प्रतिबंध को अपने आप उचित नहीं बना देता।
2018 में जंतर-मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, आम लोगों को होने वाली परेशानी और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर विचार किया था। इस फैसले का व्यापक संदेश यही है कि विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था को एक-दूसरे का शत्रु मानने के बजाय उनके बीच व्यावहारिक संतुलन तलाशना होगा। इस संतुलन की कसौटी यह होनी चाहिए कि प्रतिबंध किसी वास्तविक जरूरत पर आधारित है या नहीं, वह जरूरत के अनुपात में है या नहीं और उससे कम कठोर उपायों से उद्देश्य हासिल किया जा सकता है या नहीं। सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन नागरिकों के अधिकारों को यथासंभव सुरक्षित रखना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है।
बैरिकेड व्यवस्था का साधन हो, लोकतंत्र की दीवार नहीं
जंतर-मंतर का विवाद किसी एक राजनीतिक संगठन, एक प्रदर्शन या कुछ नेताओं की हिरासत से बड़ा है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें नागरिकों को असहमति जताने का अधिकार भी है और सार्वजनिक नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी भी। यदि प्रदर्शनकारियों ने कानून तोड़ा है, तो निष्पक्ष जांच और वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए। यदि पुलिस की कार्रवाई पर सवाल हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि प्रदर्शन स्थल बदलने का फैसला लिया गया है, तो उसके पीछे के कारण और विकल्पों की व्यावहारिकता स्पष्ट होनी चाहिए। और यदि किसी की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया गया है, तो उसकी जरूरत और कानूनी आधार की समीक्षा होनी चाहिए।
सवाल यह नहीं है कि लोकतंत्र में बैरिकेड होने चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि बैरिकेड किस उद्देश्य से लगाए गए हैं, उनका इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और क्या उनके पीछे खड़े नागरिकों की आवाज सुनने के लिए व्यवस्था तैयार है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता इस बात से तय नहीं होती कि असहमति को कितनी आसानी से रोका जा सकता है, बल्कि इससे होती है कि असहमति के बीच भी कानून, अधिकार और जवाबदेही का संतुलन कितना कायम रखा जाता है।
(डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख में लेखक के ये निजी विचार हैं।)
