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चीन ने माना, क्लिनिकल ट्रायल में भारत दुनिया के टॉप देशों में शामिल, WHO के आंकड़े शेयर कर चीनी दूतावास ने की तारीफ

भारत में चीन के दूतावास ने X पर साझा की पोस्ट, 2025 के आंकड़ों के मुताबिक क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्रेशन में चीन पहले और भारत दूसरे नंबर पर। भारत में 21,410 और चीन में 24,524 ट्रायल दर्ज किए गए। अमेरिका 8,851 ट्रायल के साथ तीसरे स्थान पर

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क्लीनिकल ट्रायल में भारत अव्वल

Photo : PTI

मेडिकल रिसर्च और बायोमेडिकल साइंस के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका को लेकर चीन की ओर से भी एक अहम जानकारी साझा की गई है। भारत में चीन के दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट साझा कर बताया है कि साल 2025 में वैश्विक क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्रेशन के मामले में चीन और भारत दुनिया में सबसे आगे रहे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों का हवाला देते हुए चीनी दूतावास ने भारत को इस सूची में दूसरे स्थान पर बताया है। चीनी दूतावास की पोस्ट में कहा गया है कि साल 2025 में चीन में 24,524 और भारत में 21,410 क्लिनिकल ट्रायल दर्ज किए गए। इस सूची में अमेरिका 8,851 ट्रायल के साथ तीसरे स्थान पर रहा। पोस्ट में दोनों देशों में बायोमेडिकल रिसर्च की बढ़ती गति को भी रेखांकित किया गया है।

खास बात यह है कि भारत में चीन के दूतावास ने इस जानकारी को ऐसे समय साझा किया है, जब मेडिकल रिसर्च, फार्मास्यूटिकल सेक्टर और बायोटेक्नोलॉजी में भारत की वैश्विक भूमिका लगातार चर्चा में है। चीन की ओर से साझा किए गए इन आंकड़ों में भारत की स्थिति अमेरिका जैसे विकसित देशों से भी आगे दिखाई गई है।

चीन और भारत के बीच कितना है अंतर?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में चीन में 24,524 क्लिनिकल ट्रायल दर्ज किए गए, जबकि भारत में इनकी संख्या 21,410 रही। दोनों देशों के बीच 3,114 ट्रायल का अंतर है। वहीं अमेरिका में 8,851 ट्रायल दर्ज किए गए। यानी भारत में दर्ज क्लिनिकल ट्रायल की संख्या अमेरिका से लगभग 2.4 गुना है।

इस सूची में ईरान 4,237 ट्रायल के साथ चौथे स्थान पर है। जापान में 3,656, जर्मनी में 3,455 और तुर्किये में 2,923 क्लिनिकल ट्रायल दर्ज किए गए। फ्रांस में 2,560 ट्रायल हुए, जबकि स्पेन और ब्रिटेन दोनों में 2,170-2,170 ट्रायल दर्ज किए गए। इस तरह साझा किए गए शीर्ष 10 देशों के आंकड़ों में चीन और भारत की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। दोनों देशों में मिलाकर 45,934 क्लिनिकल ट्रायल दर्ज किए गए।

क्या होता है क्लिनिकल ट्रायल?

क्लिनिकल ट्रायल किसी नई दवा, वैक्सीन, मेडिकल उपकरण या इलाज की पद्धति को इंसानों पर वैज्ञानिक तरीके से परखने की प्रक्रिया है। किसी नई दवा को बाजार में उतारने से पहले यह जांचना जरूरी होता है कि वह बीमारी के इलाज में कितनी प्रभावी है, कितनी सुरक्षित है और मरीजों पर उसका क्या असर हो सकता है।

कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग, संक्रमण और दूसरी गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए विकसित की जा रही दवाओं और उपचार पद्धतियों की जांच में क्लिनिकल ट्रायल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके जरिए वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि नई दवा मौजूदा इलाज के मुकाबले कितनी कारगर है और उसके इस्तेमाल से मरीजों को क्या फायदे या नुकसान हो सकते हैं।

किसी देश में क्लिनिकल ट्रायल की संख्या को वहां के मेडिकल रिसर्च इकोसिस्टम, अस्पतालों, शोध संस्थानों, वैज्ञानिकों और फार्मास्यूटिकल कंपनियों की अनुसंधान गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।

क्लिनिकल ट्रायल में भारत की स्थिति क्यों अहम?

भारत लंबे समय से दुनिया के बड़े दवा और वैक्सीन उत्पादक देशों में शामिल रहा है। भारतीय फार्मा उद्योग की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत मौजूदगी है। अब क्लिनिकल ट्रायल के आंकड़े भी वैश्विक मेडिकल रिसर्च में भारत की महत्वपूर्ण भागीदारी को सामने ला रहे हैं।

भारत में मेडिकल कॉलेजों, सरकारी और निजी अस्पतालों, शोध संस्थानों तथा फार्मास्यूटिकल कंपनियों का बड़ा नेटवर्क है। देश में अलग-अलग तरह की बीमारियों से प्रभावित बड़ी आबादी भी मेडिकल रिसर्च के लिए महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध कराती है।

डायबिटीज, कैंसर, हृदय रोग और संक्रामक बीमारियों के क्षेत्र में नए इलाज और दवाओं को विकसित करने के लिए भारत में रिसर्च की व्यापक संभावनाएं हैं। क्लिनिकल ट्रायल की बड़ी संख्या इस क्षेत्र में जारी अनुसंधान गतिविधियों को दर्शाती है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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