Bihar Politics News: लोकसभा चुनाव में इस बार भाजपा के लिए बिहार की राह आसान नहीं होगी। नीतीश कुमार की जेडीयू ने जब भाजपा से नाता तोड़कर लालू के लालटेन में तेल भरने का फैसला लिया, तो कहीं न कहीं उस वक्त भाजपा को लोकसभा चुनाव की चिंता सताई होगी। तभी तो जेडीयू के बाद भाजपा बिहार में छोटे दलों को साथ लाने की कोशिशों में जुट गया। जीतनराम मांझी के HAM को साथ लाने के बाद भाजपा अब चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) और पशुपति पारस को एक साथ लाने की कवायद तेज कर दी है। मगर फिलहाल के वक्त में भाजपा की असल टेंशन एलजेपी के दोनों गुटों को साथ लाने की है।
भाजपा ने तलाशा चाचा-भतीजे को साथ लाने का फॉर्मूला
हाजीपुर लोकसभा सीट को लेकर चाचा-भतीजे का मनमुटाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। तो क्या भाजपा ने उस फॉर्मूले को तलाश लिया है, जिससे चिराग पासवान और पशुपति पारस के बीच की दरारें भरी जा सकती हैं। भाजपा की कोशिश है कि एलजेपी फिर से एक हो जाए और चिराग पासवान के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए। लोजपा में रामविलास पासवान के वक्त जैसे हालात बनाने के लिए पशुपति पारस को मनाना बेहद जरूरी है। चिराग पासवान ने बीते कुछ दिनों से चाचा के खिलाफ अपनी जुबान को काबू में कर रखा है, जो इस बात का इशारा है कि चिराग और फूंक फूंककर कदम बढ़ा रहे हैं। पशुपति पारस फिलहाल मोदी सरकार में मंत्री हैं, उन्हें भाजपा ऐसे समझाना चाहेगी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे।
क्या रामविलास की जगह लेंगे भाई पशुपति पारस?
रामविलास पासवान को सियासत में मौसम वैज्ञानिक का दर्जा दिया जाता था। अपने आखिरी समय में रामविलास राज्यसभा सांसद थे और उन्हें उस वक्त मोदी कैबिनेट में मंत्री बनाया गया था। अब अगर भाजपा चिराग पासवान को साथ लेकर चलना चाहती है, तो हाजीपुर सीट के विवाद पर पूर्णविराम लगाना बेहद जरूरी है। भाजपा इस समझाइश में जुटी है कि राज्यसभा के रास्ते पशुपति को सरकार में मंत्री बनाया जाएगा। अगर वो इसके लिए मान जाते हैं तो चाचा-भतीजे का विवाद फिलहाल के लिए खत्म हो जाएगा। रामविलास पासवान के वक्त लोजपा ने लोकसभा चुनाव में 6 सीटों पर जीत हासिल की थी। अब अगर उसी फॉर्मूले पर दोनों नेता राजी हो जाते हैं तो बिहार में भाजपा की राह थोड़ी आसान हो सकती है। सूत्रों का कहना है कि चिराग को उनकी मर्जी के हिसाब से हाजीपुर सीट देने पर मुहर लग सकती है। आधिकारिक तौर पर इसका ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन चिराग के हाव भाव से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
हर बार से भाजपा के लिए कितना अलग होगा ये चुनाव
अगर साल 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव का जिक्र करें, तो इस बार भाजपा का चुनाव थोड़ा अलग रहने वाला है। भाजपा ने साल 2014 में ने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें उसे 22 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। वहीं 2019 के चुनाव में भाजपा को 17 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि रामविलास पासवान के रहते हुए एलजेपी ने 6 सीटें हासिल की थीं। भाजपा इस बार के चुनाव में मांझी की पार्टी HAM को भी एक सीट दे सकती है। भाजपा बिहार में इस बार जेडीयू और आरजेडी के खिलाफ चुनाव लड़ेगी। जाहिर है, राह आसान नहीं होगी। इसीलिए वो 30 से अधिक सीटों पर दावेदारी ठोकने की कोशिश करेगी। फिलहाल भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती चाचा-भतीजे को एक करने की है।
