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RBI के मुखिया को गवर्नर ही क्यों कहते हैं? चेयरमैन या हेड क्यों नहीं?

आरबीआई के शीर्ष पद को 'गवर्नर' कहने के पीछे ब्रिटिश कालीन इतिहास है, जो 'आरबीआई एक्ट 1934' से जुड़ा है। चूंकि यह कोई मुनाफा कमाने वाली कंपनी नहीं बल्कि देश की वित्तीय संप्रभुता संभालने वाली नियामक संस्था है, इसलिए इसके हेड को चेयरमैन नहीं कहा जाता।

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RBI के मुखिया को गवर्नर ही क्यों कहते हैं?

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश का केंद्रीय बैंक है, जो देश की पूरी बैंकिंग प्रणाली और मौद्रिक नीति को नियंत्रित करता है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि देश के इतने बड़े और महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थान के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति को प्रबंध निदेशक (MD), मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) या चेयरमैन (Chairman) न कहकर 'गवर्नर' (Governor) क्यों कहा जाता है। दरअसल, इसके पीछे एक गहरा ऐतिहासिक कारण है, जो ब्रिटिश काल से जुड़ा हुआ है। जब 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गई थी, तब भारत में ब्रिटिश हुकूमत का शासन था।

कैसे गवर्नर कहलाने लगे RBI हेड?

उस दौर में बैंक की संरचना और उसके नियमों को 'भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934' (RBI Act, 1934) के तहत तैयार किया गया था। ब्रिटिश बैंकिंग प्रणाली (विशेष रूप से बैंक ऑफ इंग्लैंड) में केंद्रीय बैंक के प्रमुख को 'गवर्नर' कहने की परंपरा थी। भारत का केंद्रीय बैंक भी उसी औपनिवेशिक ढांचे और कानून के तहत स्थापित किया गया था, इसलिए इसके सर्वोच्च पद का नाम भी 'गवर्नर' तय किया गया। आजादी के बाद भी देश के संविधान और वित्तीय व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई पुराने नियमों को बरकरार रखा गया, जिसके कारण आरबीआई के शीर्ष अधिकारी का पदनाम आज भी गवर्नर ही बना हुआ है। सर ऑसबॉर्न स्मिथ आरबीआई के पहले गवर्नर थे, जबकि चिंतामन द्वारकानाथ देशमुख (सी. डी. देशमुख) इसके पहले भारतीय गवर्नर बने थे।

कमर्शियल बैंकों में क्या कहते हैं?

सामान्य तौर पर कॉर्पोरेट जगत या वाणिज्यिक बैंकों (Commercial Banks) में शीर्ष पद के लिए चेयरमैन या एमडी जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है, क्योंकि उनका मुख्य काम शेयरधारकों के हितों की रक्षा करना और कंपनी का मुनाफा बढ़ाना होता है। आरबीआई कोई सामान्य व्यावसायिक बैंक नहीं है जो मुनाफे के लिए काम करे, बल्कि यह एक नियामक संस्था (Regulatory Body) है जो पूरे देश की अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति (Inflation) और नोटों की छपाई को नियंत्रित करती है। आरबीआई एक्ट, 1934 की धारा 7 (Section 7) के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह जनता के हित में रिजर्व बैंक के गवर्नर को आवश्यक दिशा-निर्देश दे सकती है, जिससे यह साफ होता है कि यह पद एक प्रशासनिक और संप्रभु (Sovereign) जिम्मेदारी वाला पद है।

यही कारण है कि इसे किसी कंपनी के चेयरमैन की तरह नहीं, बल्कि एक राज्य या क्षेत्र के प्रशासनिक प्रधान यानी 'गवर्नर' के रूप में देखा जाता है। आरबीआई गवर्नर की नियुक्ति सीधे केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, और वर्तमान में इस महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी वरिष्ठ नौकरशाह संजय मल्होत्रा संभाल रहे हैं। अगर वेतन (Salary) की बात की जाए, तो देश के सबसे बड़े बैंकर होने के बावजूद आरबीआई गवर्नर का वेतन किसी बड़े प्राइवेट बैंक के सीईओ के मुकाबले काफी सीमित होता है। आरबीआई गवर्नर को हर महीने लगभग 2.5 लाख रुपये (मूल वेतन) के साथ-साथ रहने के लिए सरकारी आवास, गाड़ियां और अन्य भत्ते मिलते हैं, जो कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारी के समकक्ष होते हैं। इस प्रकार, यह पद केवल एक नौकरी या कॉर्पोरेट पोजीशन नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता और वित्तीय स्थिरता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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