आधे से ज्यादा लोगों ने माना कि PM का कृषि कानूनों को रद्द करने का फैसला सही, 2022 में निभाएगा अहम भूमिका: सर्वे

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Nov 22, 2021, 12:02 AM IST

IANS-C Voter सर्वेक्षण के अनुसार, कम से कम 55 प्रतिशत लोगों का कहना है कि तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने का फैसला 2022 की शुरूआत में होने वाले विधानसभा चुनावों में अहम भूमिका निभाएगा।

आधे से ज्यादा लोगों ने माना कि PM का कृषि कानूनों को रद्द करने का फैसला सही, 2022 में निभाएगा अहम भूमिका: सर्वे

नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 नवंबर को तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की घोषणा की। हालांकि, राजनीतिक जानकारों का ये भी मानना है कि तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की एक वजह ये भी थी क्योंकि व्यापक रूप से ये तीनों कानून अलोकप्रिय थे। इस बारे में कानूनों को लेकर इस तरह की थ्योरी भी चल रही थी कि इन कानूनों के जरिये अंबानी और अडानी किसानों की जमीन हड़प लेंगे और खुले बाजार में किसानों के लिए सौदा करना आसान नहीं होगा।

सीवोटर-आईएएनएस का सर्वे

दिल्ली की ओर जाने वाली और दिल्ली के बाहर जाने वाली सड़कों की साल भर की नाकेबंदी को भी कृषि कानूनों की व्यापक अलोकप्रियता की वजह बताया गया। भारत भर में आईएएनएस-सीवोटर स्नैप पोल द्वारा मिले तथ्य और डेटा के मुताबिक, 50 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं का स्पष्ट बहुमत था कि कृषि कानून किसानों के लिए फायदेमंद थे। इसके विपरीत, केवल 30 प्रतिशत को लगता है कि वे फायदेमंद नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने स्वयं 19 नवंबर को कृषि कानूनों को निरस्त करते हुए कहा था कि उनकी सरकार चाहती है कि छोटे किसानों को अधिक से अधिक लाभ मिले।

राजनीतिक मकसद था विरोध

कृषि कानूनों के समर्थन के और भी सबूत हैं। लगभग 48 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने बताया कि सरकार को सभी हितधारकों के साथ परामर्श और आवश्यक संशोधनों के बाद संसद में कृषि कानूनों को फिर से पेश करना चाहिए। यह कोई नहीं जानता कि राजनीतिक माहौल को देखते हुए कृषि कानून फिर से पेश किया जाएगा या नहीं, लेकिन तथ्य यह है कि इस तरह के कदमों को लोगों का समर्थन है। उत्तरदाताओं के एक विशाल 56.7 प्रतिशत लोगों की राय थी कि राजनीतिक मकसद के कारण इन कानूनों का विरोध किया गया।

आगामी चुनाव में अहम भूमिका

आईएएनएस-सीवोटर सर्वेक्षण ने यह स्पष्ट किया है कि कृषि कानून और इसको लेकर होने वाली राजनीति आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। 55.1 प्रतिशत लोगों का स्पष्ट तौर पर मानना था कि इस फैसले का चुनावों पर प्रभाव पड़ेगा, जबकि केवल 30.8 प्रतिशत का मानना है कि चुनावों में इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। एक बार फिर एनडीए और विपक्षी समर्थकों के विचारों में एकरूपता नजर आई। एनडीए के लगभग 53 प्रतिशत मतदाताओं ने महसूस किया कि चुनावों पर असर पड़ेगा, जबकि 56 प्रतिशत से अधिक विपक्षी मतदाताओं ने ऐसा ही महसूस किया।

लोगों ने दी ये राय

यह पूछे जाने पर कि क्या मोदी, जैसा कि उन्होंने 2015 में भूमि अधिग्रहण विधेयक के साथ किया था, दबाव के आगे झुक जाते हैं, जब उन पर व्यवसाय समर्थक होने का आरोप लगाया जाता है? तो एनडीए के 36.3 प्रतिशत समर्थक इससे असहमत थे, जबकि 43 प्रतिशत ने हां में कहा। यह पूछे जाने पर कि निरस्त करने का श्रेय किसे जाता है, एनडीए के 47 प्रतिशत मतदाताओं ने मोदी सरकार का सुझाव दिया, जबकि 36 प्रतिशत विपक्षी समर्थकों ने इससे असहमति जताई। संसद में कृषि कानूनों का विवादास्पद पारित होना और उसके बाद अब निरस्त करना सब राजनीतिक है। लगभग एक साल से चल रहे तीन कृषि कानूनों के विरोध के पीछे के मकसद के बारे में पूछे जाने पर, 56 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं ने कहा कि विरोध राजनीति से प्रेरित थे। दिलचस्प बात यह है कि लगभग 48 प्रतिशत विपक्षी मतदाताओं की भी ऐसी ही राय थी।

सरकार के लिए बुरी खबर

मोदी सरकार द्वारा कृषि कानूनों को निरस्त करने के फैसले के खिलाफ एक ओर जहां किसानों का एक वर्ग जश्न मनाने में व्यस्त है तो दूसरी ओर, सुधारों के मोर्चे से बुरी खबरें आने के संकेत मिले हैं। ये जानकारी आईएएनएस-सीवोटर पोल के जरिये उभरकर सामने आई हैं। सरकार द्वारा आक्रामक तरीके से अपनाए जा रहे सुधार के उपाय केवल कृषि कानून ही नहीं थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अन्य सुधारों के अलावा दो और सुधार उपायों पर बहुत अधिक राजनीतिक पूंजी लगाई है। पहला प्राचीन श्रम कानूनों में बदलाव से संबंधित है, जो केवल कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को लाभान्वित कर रहे हैं, जबकि अधिकांश श्रमिकों (विश्वसनीय अनुमानों के अनुसार लगभग 90 प्रतिशत श्रमिकों) को लाभ से वंचित कर रहे हैं।

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