सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक रिट याचिका दायर कर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की नियुक्तियों को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इन नियुक्तियों के दौरान 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023' (CEC and ECs Act, 2023) में तय कानूनी प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन नहीं किया गया।
2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति पर सवाल
याचिका में 14 मार्च 2024 की उन अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है, जिनके जरिए ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इसके अलावा 17 फरवरी 2025 की अधिसूचना के जरिए ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाने को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन नियुक्तियों में 2023 के कानून की धारा 5, 6 और 8(1) में तय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
सर्च कमेटी के पैनल को लेकर क्या है दावा?
याचिका में 2023 के अधिनियम की धारा 6 का हवाला देते हुए कहा गया है कि सर्च कमेटी को प्रत्येक रिक्त पद के लिए पांच लोगों का पैनल तैयार करना था। याचिका के मुताबिक, मार्च 2024 में जब दो चुनाव आयुक्तों के पद खाली हुए तो सर्च कमेटी ने दोनों पदों के लिए कुल छह नामों की सिफारिश की। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 22 मार्च 2024 के आदेश का भी हवाला दिया है। उस मामले में 2023 के कानून को चुनौती दी गई थी और कोर्ट ने कहा था कि दो रिक्तियों के लिए धारा 6 के तहत 10 नाम होने चाहिए।
उस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति की जल्दबाजी में अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर भी चिंता जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि चयन समिति के सदस्यों को उम्मीदवारों के बारे में पूरी जानकारी पहले उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
एक दिन में ही सर्च कमेटी की सिफारिश और चयन का दावा
याचिका के मुताबिक, 13 मार्च 2024 को विधायी विभाग के सचिव ने नेता प्रतिपक्ष को 200 से ज्यादा लोगों की सूची भेजी थी। यह सूची सर्च कमेटी के शॉर्टलिस्ट को अंतिम रूप देने से पहले भेजी गई थी। इसके अगले दिन सर्च कमेटी ने छह नामों की सिफारिश की और उसी दिन चयन समिति ने ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त करने का फैसला किया। याचिकाकर्ता ने सवाल उठाया है कि क्या ये छह नाम वास्तव में धारा 6 के तहत सर्च कमेटी की ओर से तैयार किया गया वैधानिक ‘पैनल’ था।
चुनाव संचालन का अनुभव होने पर भी सवाल
याचिका में 2023 के कानून की धारा 5 का भी हवाला दिया गया है। इसके मुताबिक, चुनाव आयुक्त के पद के लिए वही व्यक्ति पात्र है जो केंद्र सरकार में सचिव या उसके समकक्ष पद पर रह चुका हो और जिसकी सत्यनिष्ठा के साथ-साथ चुनावों के प्रबंधन और संचालन की जानकारी और अनुभव हो।
याचिकाकर्ता का दावा है कि ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के आधिकारिक प्रोफाइल पर चुनाव करवाने का कोई अनुभव नहीं है।
ज्ञानेश कुमार के मामले में याचिका में कहा गया है कि उनकी Executive Record Sheet में 26 पोस्टिंग दर्ज हैं, लेकिन इनमें से किसी को चुनाव से संबंधित जिम्मेदारी के तौर पर वर्गीकृत नहीं किया गया है। उन्होंने एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर के तौर पर काम किया था, लेकिन रिकॉर्ड में इस पद को भूमि राजस्व प्रबंधन और जिला प्रशासन के तहत दर्ज किया गया है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि सार्वजनिक रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं है कि कुमार ने कभी जिला निर्वाचन अधिकारी के तौर पर काम किया था, चुनाव पर्यवेक्षक रहे थे या चुनाव से जुड़ी कोई अन्य जिम्मेदारी निभाई थी।
सुखबीर सिंह संधू को लेकर भी इसी तरह की दलील दी गई है। उनकी आधिकारिक प्रोफाइल में जिला मजिस्ट्रेट, उत्तराखंड के मुख्य सचिव, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के चेयरमैन और लोकपाल के सचिव जैसे पदों का उल्लेख है। हालांकि, याचिका के मुताबिक इनमें से किसी पद को चुनाव प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारी के तौर पर नहीं बताया गया है।
विवेक जोशी की नियुक्ति पर भी सवाल
याचिका में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी की नियुक्ति को लेकर भी इसी तरह का दावा किया गया है। उनके आधिकारिक प्रोफाइल में हरियाणा के मुख्य सचिव, रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त, वित्तीय सेवा विभाग और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के सचिव जैसे वरिष्ठ पदों का उल्लेख है। हालांकि, याचिकाकर्ता का कहना है कि सार्वजनिक रिकॉर्ड में चुनाव प्रबंधन या संचालन से जुड़ी कोई विशिष्ट जिम्मेदारी दर्ज नहीं है।
याचिकाकर्ता ने यह भी माना है कि सार्वजनिक प्रोफाइल में दर्ज नहीं की गई किसी चुनावी जिम्मेदारी की जानकारी केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के पास हो सकती है।
2025 में CEC और EC की नियुक्ति को भी चुनौती
याचिका में 17 फरवरी 2025 को हुई नियुक्तियों को भी अलग से चुनौती दी गई है। इसी प्रक्रिया के तहत ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त से मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया था और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क है कि 2023 के अधिनियम की धारा 5 से 8 तक की प्रक्रिया इन नियुक्तियों पर भी नए सिरे से लागू होनी चाहिए थी। इसके तहत नई सर्च कमेटी का पैनल तैयार किया जाना और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अपनाया जाना जरूरी था। याचिका के मुताबिक, चयन समिति की बैठक 17 फरवरी 2025 को हुई थी और ज्ञानेश कुमार को 19 फरवरी 2025 से CEC नियुक्त किया गया। इसी बैठक में ज्ञानेश कुमार के CEC बनने के बाद खाली हुए चुनाव आयुक्त के पद पर विवेक जोशी के चयन का फैसला भी किया गया। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या चयन समिति ने चयन से पहले अपनी प्रक्रिया तय की थी और क्या वह प्रक्रिया उस समय के रिकॉर्ड से स्पष्ट होती है।
नियुक्तियों से जुड़े मूल रिकॉर्ड मांगने की मांग
याचिकाकर्ता ने 2024 और 2025 की नियुक्तियों से संबंधित सर्च कमेटी और चयन समिति की कार्यवाही के मूल रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करने की मांग की है। याचिका के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने 27 सितंबर 2026 और 2 अक्टूबर 2026 को RTI आवेदन दाखिल कर नियुक्तियों से संबंधित रिकॉर्ड मांगे थे, लेकिन इन आवेदनों पर अभी तक जवाब नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट से याचिका में राहत की क्या मांग?
याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत के तौर पर नियुक्तियों से जुड़े मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और उन्हें कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश देने की मांग की है। इसके अलावा याचिका लंबित रहने के दौरान भविष्य में CEC या चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कुछ सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की गई है। इनमें सर्च कमेटी के चयन मानदंड की पहले से जानकारी देना, प्रत्येक रिक्त पद के लिए पांच नामों का पैनल तैयार करना, उम्मीदवारों के चयन के आधार को रिकॉर्ड करना और चयन से पहले चयन समिति की प्रक्रिया तय करना शामिल है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी को क्वो वारंटो की रिट जारी कर यह बताने के लिए कहा जाए कि वे किस कानूनी अधिकार के तहत अपने पद पर बने हुए हैं। याचिका में कहा गया है कि यदि कोर्ट यह पाता है कि उनकी नियुक्तियां कानून के मुताबिक नहीं हुई हैं, तो इन पदों को रिक्त घोषित किया जाए।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि क्या 2023 के कानून की धारा 6 प्रत्येक रिक्त पद के लिए पांच नामों का पैनल तैयार करना अनिवार्य करती है। इसके अलावा यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या चयन समिति को उम्मीदवारों के चयन से पहले अपनी प्रक्रिया तय करना जरूरी है और क्या किसी मौजूदा चुनाव आयुक्त को CEC नियुक्त किए जाने पर भी कानून की पूरी प्रक्रिया नए सिरे से अपनानी होगी।
याचिका में यह संवैधानिक सवाल भी उठाया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के बावजूद CEC और चुनाव आयुक्तों के खिलाफ क्वो वारंटो की रिट जारी की जा सकती है या नहीं।
यह याचिका ऐसे समय दाखिल हुई है जब विपक्षी दलों की ओर से CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन किए जा रहे हैं। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट में SIR से जुड़े फैसलों को लेकर भी चुनाव आयोग के खिलाफ याचिकाएं लंबित हैं। इस सप्ताह की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा था, जिनमें आरोप लगाया गया है कि CEC ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए कुछ फैसले अकेले लिए।
