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क्या जोन्स एक्ट हटने से सस्ता होगा पेट्रोल, ईरान युद्ध के बीच 100 साल पुराने कानून की क्यों हो रही चर्चा?

What Is the Jones Act: मिडिल ईस्ट में शुरू हुई जंग से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूचाल आ गया है, और तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ऐसे समय में अमेरिकी राष्ट्रपति ने जोन्स एक्ट को अस्थायी रूप से हटाते हुए 60 दिन की अस्थायी छूट दी है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर यह कानून क्या है, इसे क्यों बनाया गया था और युद्ध के समय इसे हटाने की चर्चा क्यों होती है?

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जोन्स एक्ट 1920 को निलंबित करने पर विचार कर रहे ट्रंप।
Authored by: Shiv Shukla
Updated Mar 21, 2026, 14:27 IST

What Is the Jones Act: पश्चिम एशिया में अमेरिका,इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार,समुद्री व्यापार और सप्लाई चेन को झकझोर कर रख दिया है। तेल टैंकरों की आवाजाही बाधित हो रही है,समुद्री मार्गों (Strait of Hormuz crisis) पर खतरा बढ़ गया है और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में अमेरिका के भीतर एक सदी पुराने कानून “जोन्स एक्ट” (Jones Act) को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऊर्जा संकट और आपूर्ति बाधाएं गंभीर होती देख कर इस कानून के नियमों को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है।

क्या है जोन्स एक्ट?

जोन्स एक्ट का आधिकारिक नाम Merchant Marine Act of 1920 है। इसे 1920 में अमेरिकी कांग्रेस ने पारित किया था। इस कानून का उद्देश्य अमेरिका के समुद्री व्यापार और शिपिंग उद्योग को मजबूत बनाना था। इस कानून के तहत अमेरिका के एक बंदरगाह से दूसरे बंदरगाह तक सामान या यात्रियों को ले जाने वाले जहाजों के लिए कुछ कड़े नियम तय किए गए हैं।

इन नियमों के अनुसार:

  • अमेरिका के एक बंदरगाह से दूसरे बंदरगाह तक सामान या यात्रियों को ले जाने वाला जहाज अमेरिका में बना हुआ होना चाहिए।
  • उसका स्वामित्व अमेरिकी नागरिकों के पास होना चाहिए।
  • वह अमेरिकी झंडे (U.S. flag) के तहत संचालित होना चाहिए।
  • जहाज के चालक दल में अमेरिकी नागरिक या स्थायी निवासी होने चाहिए।
  • इसका सीधा मतलब है कि विदेशी जहाज अमेरिका के घरेलू समुद्री व्यापार में हिस्सा नहीं ले सकते।

यह कानून क्यों बनाया गया था?

जोन्स एक्ट की जड़ें प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों से जुड़ी हैं। उस समय जर्मन पनडुब्बियों के हमलों ने अमेरिका के व्यापारी जहाजों को भारी नुकसान पहुंचाया था। इससे अमेरिका की समुद्री आपूर्ति क्षमता कमजोर हो गई थी। इस स्थिति से सबक लेते हुए अमेरिकी सरकार ने यह कानून बनाया ताकि देश के पास एक मजबूत व्यापारी जहाज बेड़ा हो। इसका उद्देश्य केवल व्यापार को बढ़ाना नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करना था। सरकार चाहती थी कि युद्ध या आपातकाल की स्थिति में अमेरिका के पास ऐसे जहाज हों जो सेना, हथियार, खाद्यान्न और अन्य जरूरी सामान को समुद्र के रास्ते तुरंत पहुंचा सकें।

जोन्स एक्ट क्या है?

जोन्स एक्ट क्या है?

किन-किन समूहों को इससे फायदा होता है?

जोन्स एक्ट को अमेरिकी शिपिंग कंपनियों, जहाज निर्माण उद्योग और समुद्री श्रमिक संगठनों का मजबूत समर्थन मिलता रहा है। इस कानून की वजह से अमेरिकी जहाज निर्माण उद्योग को सुरक्षा मिलती है, समुद्री क्षेत्र में रोजगार सुरक्षित रहते हैं, अमेरिका के पास युद्ध के समय काम आने वाला व्यापारी बेड़ा मौजूद रहता है और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई विशेषज्ञ भी इस कानून को जरूरी मानते हैं।

इस कानून की आलोचना क्यों होती है?

जोन्स एक्ट के समर्थक इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू उद्योग की रक्षा के लिए जरूरी बताते हैं,लेकिन कई आलोचक इसे महंगा और अप्रभावी कानून मानते हैं। उनका कहना है कि इस कानून के कारण अमेरिका के अंदर समुद्री व्यापार की लागत काफी बढ़ जाती है। दरअसल, अमेरिकी जहाजों को बनाना और चलाना विदेशी जहाजों की तुलना में कहीं ज्यादा महंगा होता है। इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है और अंततः इसका असर उपभोक्ताओं तक पहुंचता है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां सामान समुद्र के रास्ते पहुंचता है,वहां इसकी वजह से कीमतें अधिक हो जाती हैं।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं-

  • हवाई
  • प्यूर्टो रिको
  • अलास्का
  • गुआम जैसे द्वीपीय क्षेत्र
इन इलाकों में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि जोन्स एक्ट के कारण सामान महंगा पड़ता है।

ईरान युद्ध के दौरान जोन्स एक्ट का मुद्दा क्यों उठा?

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित है और दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है। यहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। लेकिन युद्ध के कारण-
  • कई तेल टैंकरों की आवाजाही रुक गई।
  • जहाजों पर हमलों का खतरा बढ़ गया।
  • मध्य पूर्व के कुछ देशों ने तेल उत्पादन घटा दिया।
  • इन परिस्थितियों ने तेल बाजार में भारी उथल-पुथल पैदा कर दी।

तेल की कीमतों में कितना उछाल आया?

ईरान अमेरिका और इजरायल की जंग शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। लेकिन युद्ध और सप्लाई बाधाओं के बाद यह बढ़कर करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इसका असर सीधे पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा है। न सिर्फ बाकी दुनिया बल्कि अमेरिका में भी इसका असर साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 3.63 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई, यह सिर्फ एक महीने में लगभग 69 सेंट बढ़ गई है। इससे आम उपभोक्ताओं और उद्योगों दोनों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है।

हालात से निपटने के लिए ट्रंप प्रशासन क्या कदम उठाने की सोच रहा है?

ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अमेरिकी प्रशासन कई विकल्पों पर विचार कर रहा है।इसी क्रम में जोन्स एक्ट के नियमों को अस्थायी रूप से निलंबित करना भी है। अह जब ऐसा हो गया है तो विदेशी जहाज भी अमेरिका के बंदरगाहों के बीच माल ढुलाई कर सकेंगे। सरकार का मानना है कि इससे ऊर्जा उत्पादों की आपूर्ति तेज हो सकती है। साथ ही कृषि और औद्योगिक सामान की ढुलाई आसान हो सकती है। इसके अलावा,बंदरगाहों पर जाम की स्थिति कम हो सकती है।
जोन्स एक्ट में छूट से किया बदल जाएगा?

जोन्स एक्ट में छूट से किया बदल जाएगा?

क्या इससे पेट्रोल की कीमतें कम होंगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि जोन्स एक्ट में छूट देने से कुछ राहत मिल सकती है,लेकिन यह पेट्रोल की कीमतों को बहुत ज्यादा कम नहीं कर पाएगा। एक अमेरिकी थिंक टैंक Center for American Progress के अनुसार इससे पूर्वी तट पर पेट्रोल की कीमत लगभग 3 सेंट प्रति गैलन तक घट सकती है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में कीमतें बढ़ने की भी संभावना है। आलोचकों का यह भी कहना है कि इससे अमेरिकी जहाज निर्माण उद्योग और श्रमिकों को नुकसान हो सकता है।

ऊर्जा संकट से निपटने के लिए और क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

अमेरिका और उसके सहयोगी देश ऊर्जा संकट को कम करने के लिए कई और उपाय कर रहे हैं।

  • रूसी तेल पर अस्थायी छूट
अमेरिका ने यूक्रेन युद्ध से जुड़े प्रतिबंधों में सीमित समय के लिए ढील देने का फैसला किया है, जिससे कुछ देशों को रूसी तेल खरीदने की अनुमति मिल सके।
  • भारत को अस्थायी अनुमति
भारत को भी कुछ समय के लिए रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी गई है ताकि वैश्विक बाजार में आपूर्ति बनी रह सके।
  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का बड़ा कदम
International Energy Agency (IEA) ने सदस्य देशों के भंडार से लगभग 400 मिलियन बैरल तेल बाजार में जारी करने का फैसला किया है। यह एजेंसी के इतिहास में आपातकालीन तेल रिलीज का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।
  • अमेरिकी रणनीतिक भंडार का उपयोग
अमेरिका ने भी अपने Strategic Petroleum Reserve से लगभग 172 मिलियन बैरल तेल जारी करने की घोषणा की है, जिसे 120 दिनों में बाजार में लाया जाएगा।

फिर भी संकट क्यों बना रह सकता है?

विश्लेषकों का मानना है कि ये सभी कदम केवल अस्थायी राहत दे सकते हैं। क्योंकि रिफाइनरियां पहले से तय अनुबंधों पर काम करती हैं। नई सप्लाई बाजार तक पहुंचने में समय लगता है और अगर युद्ध लंबा खिंचा तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसलिए ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है।

अमेरिका तेल निर्यातक होते हुए भी क्यों प्रभावित है?

अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है और कुल मिलाकर वह तेल का शुद्ध निर्यातक भी है। लेकिन इसके बावजूद वह वैश्विक कीमतों से बच नहीं सकता। इसका कारण यह है कि तेल एक वैश्विक कमोडिटी है और इसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में तय होती हैं। इसके अलावा अमेरिका में उत्पादित तेल का बड़ा हिस्सा लाइट और स्वीट क्रूड होता है, जबकि देश की कई रिफाइनरियां भारी (heavy, sour) क्रूड को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई हैं। इस वजह से अमेरिका को कुछ मात्रा में तेल आयात भी करना पड़ता है।

ईरान युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है और तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। ऐसे समय में अमेरिका के भीतर जोन्स एक्ट को अस्थायी रूप से हटाने पर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि यह कदम सप्लाई चेन को कुछ राहत दे सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक मध्य पूर्व में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं होते, तब तक वैश्विक तेल बाजार और अर्थव्यवस्था पर इसका असर जारी रहने की संभावना है।

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