Middle East War Global Impact: पश्चिम एशिया में अमेरिका-इस्राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने दुनिया की राजनीति,अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार को झकझोर कर रख दिया है। बीते 10 दिनों में हुए हमलों,पलटवार और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरों ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को गंभीर चुनौती दे दी है। हालात तब और गंभीर हो गए जब ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी। यह वही समुद्री मार्ग है,जहां से दुनिया के कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। यही वो वजह है जिसके कारण युद्ध का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा, चाहे अनचाहे एशिया, यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका तक सभी महाद्वीपों के देश इसकी जद में आ गए हैं और इससे प्रभावित हैं। कई देशों को तेल और गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ने के बाद ईंधन बचाने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि कहीं पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं तो कहीं सरकारें वाहनों की आवाजाही कम करने के लिए ऑड-ईवन सिस्टम लागू कर रही हैं।
म्यांमार जैसे देशों में सम और विषम नंबर की गाड़ियों को अलग-अलग दिनों में चलाने का नियम लागू किया गया है ताकि सीमित ईंधन का बेहतर प्रबंधन किया जा सके। वहीं कुछ देशों ने स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए हैं, तो कई सरकारों ने ईंधन निर्यात रोक दिया है और रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि ईरान युद्ध की वजह से दुनिया में ऊर्जा संकट कितना गंभीर हो गया है, किन देशों ने ऑड-ईवन या अन्य कड़े कदम उठाए हैं और भारत इस संकट से निपटने के लिए क्या रणनीति अपना रहा है? आइए समझते हैं....
युद्ध से कितना बड़ा ऊर्जा संकट पैदा हुआ?
जैसे ही संघर्ष तेज हुआ, वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने लगी। तेल की कीमतें तेजी से ऊपर जाने लगीं और ब्रेंट क्रूड की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। यह स्तर 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार देखा गया। केवल एक सप्ताह के भीतर तेल की कीमतों में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, युद्ध के कारण ऊर्जा उत्पादन और निर्यात केंद्रों पर हमलों का खतरा बढ़ गया। दूसरा, समुद्री मार्गों पर सुरक्षा जोखिम के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई। तीसरा, कई कंपनियों ने संभावित नुकसान से बचने के लिए सप्लाई अनुबंधों पर फोर्स मेज्योर लागू कर दिया।
ईरान-इजराइल और अमेरिका की जंग से शुरू हुआ उर्जा संकट।
एलएनजी उत्पादन पर भी असर
तेल के अलावा गैस बाजार भी इस संघर्ष से प्रभावित हुआ है। कतर दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में से एक है।ईरानी ड्रोन हमले के बाद कतर की प्रमुख एलएनजी निर्यात सुविधा को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इससे वैश्विक गैस बाजार में अस्थिरता पैदा हो गई। इसके अलावा सऊदी अरब की अरामको, कुवैत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और बहरीन की ऊर्जा कंपनियों ने भी संभावित खतरे को देखते हुए सप्लाई अनुबंधों में बदलाव शुरू कर दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से यातायात भी प्रभावित
वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई भी प्रभावित हुई है, जिसके कारण भी यह संकट और बड़ा होता जा रहा है। दरअसल, जब आप दुनिया ता नक्शा उठाकर देखेंगे तो पाएंगे कि दुनिया के ऊर्जा नक्शे में होर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद बड़ा है। यह फारस की खाड़ी और अरब सागर को जोड़ने वाला संकरा समुद्री मार्ग है,जिसके जरिए तेल और गैस के टैंकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं। दुनिया के कई बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों जैसे सऊदी अरब,इराक,कुवैत,यूएई और कतर का निर्यात इसी मार्ग से होता है। अगर आंकड़ों की बात करें तो हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है,तो दुनिया के ऊर्जा बाजार में भारी संकट पैदा हो सकता है। इसी कारण ईरान की तरफ से उठाए गए कदम ने वैश्विक चिंता को और बढ़ा दिया है।
समुद्री व्यापार पर क्या असर पड़ा?
ऊर्जा संकट का असर केवल तेल और गैस की कीमतों तक सीमित नहीं है। समुद्री व्यापार भी इससे प्रभावित हुआ है। जब जहाजों पर हमलों का खतरा बढ़ता है या समुद्री मार्ग असुरक्षित हो जाते हैं, तो शिपिंग कंपनियां अपनी सेवाओं की कीमतें बढ़ा देती हैं। पश्चिम एशिया से चीन तक तेल ले जाने वाले सुपरटैंकर का किराया बढ़कर 400,000 डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच गया है।इसी तरह एलएनजी गैस ले जाने वाले जहाजों का किराया छह गुना बढ़कर लगभग 264,000 डॉलर प्रतिदिन हो गया है। इसके अलावा बीमा कंपनियों ने भी जहाजों के बीमा प्रीमियम में भारी बढ़ोतरी कर दी है, खासकर उन जहाजों के लिए जो युद्ध प्रभावित क्षेत्रों से गुजरते हैं।
कौन से देश क्या कदम उठा रहे?
किस देश पर क्या असर और क्या एहतियाती कदम उठाए
पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात करने वाले देशों में एशिया के कई देश शामिल हैं। इसलिए इस संकट का सबसे ज्यादा असर एशिया में देखा जा रहा है।चीन
चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है। उसके पास लगभग 1.3 अरब बैरल का रणनीतिक तेल भंडार मौजूद है।इसके बावजूद चीन ने घरेलू आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अपनी रिफाइनरियों को पेट्रोल और डीजल के निर्यात पर रोक लगाने का निर्देश दिया है। इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय संकट के बावजूद चीन की घरेलू ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
पाकिस्तान
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट और ऊर्जा कमी की समस्या से जूझ रहा है। युद्ध के कारण तेल की कीमतों में वृद्धि ने पाकिस्तान की स्थिति को और मुश्किल बना दिया है। सरकार ने ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है। इसके अलावा ऊर्जा बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन क्लासेज और सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग जैसे उपायों पर विचार किया जा रहा है।पाकिस्तान ने सऊदी अरब से वैकल्पिक तेल आपूर्ति के लिए मदद भी मांगी है।
बांग्लादेश
बांग्लादेश में कतर से एलएनजी की आपूर्ति रुकने के कारण बिजली संकट गहरा गया है। सरकार ने ऊर्जा बचाने के लिए कई विश्वविद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है और ईद की छुट्टियां पहले घोषित कर दी हैं। इसके अलावा उद्योगों को भी सीमित बिजली आपूर्ति दी जा रही है।
जापान और दक्षिण कोरिया
जापान के पास लगभग 354 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार मौजूद है। इसके बावजूद सरकार ने राष्ट्रीय भंडार से तेल निकालने की तैयारी शुरू कर दी है।दक्षिण कोरिया ने ऊर्जा संकट को देखते हुए लगभग 30 वर्षों में पहली बार ईंधन की कीमतों पर ऊपरी सीमा (प्राइस कैप) लगाने का फैसला किया है।
वियतनाम और थाईलैंड
वियतनाम ने ऊर्जा संकट से निपटने के लिए ईंधन पर आयात शुल्क हटा दिया है। इसके अलावा कच्चे तेल के निर्यात पर रोक लगा दी गई है। थाईलैंड ने भी घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए ईंधन निर्यात को निलंबित कर दिया है।
श्रीलंका और नेपाल
इन देशों में ऊर्जा संकट की आशंका के कारण पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं।सरकारों ने लोगों से घबराहट में ईंधन खरीदने से बचने की अपील की है।
म्यांमार में ऑड-ईवन प्रणाली लागू
म्यांमार में टैंकरों की आपूर्ति बाधित होने से कई शहरों में ईंधन खत्म हो गया। स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने ऑड-ईवन प्रणाली लागू की है। इसके तहत सम और विषम नंबर वाली गाड़ियां अलग-अलग दिनों में चलेंगी।
पश्चिमी देशों में बढ़ी चिंता
अमेरिका
अमेरिका में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इससे महंगाई दर बढ़ने का खतरा है, जो राजनीतिक रूप से भी बड़ा मुद्दा बन सकता है। स्थिति को संभालने के लिए अमेरिका ने तेल टैंकरों को नौसैनिक सुरक्षा देने की पेशकश की है।
यूरोप और ब्रिटेन
यूरोप में प्राकृतिक गैस की कीमतों में 60 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। ब्रिटेन में गैस की कीमतें एक सप्ताह में लगभग दोगुनी हो गई हैं। यूरोप को अब अतिरिक्त 180 एलएनजी कार्गो खरीदने की जरूरत पड़ सकती है।
पश्चिम एशिया के उत्पादक देशों की स्थिति
- युद्ध का असर केवल उपभोक्ता देशों पर ही नहीं बल्कि उत्पादक देशों पर भी पड़ा है।
- निर्यात मार्ग बंद होने और तेल भंडारण क्षमता भर जाने के कारण कई देशों को उत्पादन घटाना पड़ा है।
- इराक ने अपने प्रमुख तेल क्षेत्रों में उत्पादन में लगभग 70 प्रतिशत कटौती की है।
- कुवैत और यूएई ने भी उत्पादन घटाने के संकेत दिए हैं।
मध्य पूर्व में जंग का भारत पर कितना असर।
भारत पर कितना असर?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत तेल आयात करता है। इसमें से करीब 40 प्रतिशत तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है।
भारत में तेल आपूर्ति का संतुलन
हालांकि भारत ने पिछले एक दशक में अपने तेल आयात स्रोतों में विविधता लाई है। अब भारत रूस, अमेरिका, अफ्रीका और मध्य एशिया से भी बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है। इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हुई है।
भारत ने क्या अपनाए उपाय।
गैस संकट सबसे बड़ी चुनौती
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है। भारत की एलपीजी और एलएनजी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। युद्ध के कारण एलपीजी की कीमतों में 60 से 115 रुपये तक वृद्धि, एलएनजी की कीमतों में लगभग 80 रुपये तक बढ़ोतरी हुई है।सरकार के आपात कदम
- स्थिति को संभालने के लिए भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं
- आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (ESMA) लागू
- रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का निर्देश
- वैकल्पिक आपूर्ति के लिए रूस और अन्य देशों से बातचीत
फिलहाल स्थिति नियंत्रण में
भारत के पास वर्तमान में लगभग 8 सप्ताह का तेल भंडार मौजूद है। हालांकि कीमतों में संभावित वृद्धि के डर से कई जगह पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें भी देखी गई हैं।
ईरान,अमेरिका और इस्राइल के बीच बढ़ते संघर्ष से एक बात तो साफ हो गई है कि पश्चिम एशिया में किसी भी सैन्य टकराव का असर केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, व्यापार और आम लोगों की जिंदगी को प्रभावित करता है। यदि यह संघर्ष लंबा चलता है तो तेल-गैस की कीमतों में और बढ़ोतरी, महंगाई में तेजी और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
