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ट्रंप अपने देश में हुए कमजोर! यूएस चुनाव नतीजे के भारत और पाकिस्तान के लिए क्या मायने?

Trump Congress Defeat India Trade Deal: अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स का कब्जा होने से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कमजोर पड़े हैं। जानिए इसका भारत के व्यापार-वीजा और पाकिस्तान के रक्षा-क्रिप्टो सौदों पर क्या असर पड़ेगा।

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ट्रंप अपने देश में हुए कमजोर! यूएस चुनाव नतीजे के भारत और पाकिस्तान के लिए क्या मायने?

US Midterms 2026 Impact on India Pakistan: अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों पर डेमोक्रेटिक पार्टी का कब्जा होना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ा झटका है, एक ऐसा नतीजा जिसके भारत और पाकिस्तान दोनों पर असर पड़ सकते हैं। भारत के लिए, कमजोर होते ट्रंप का मतलब यह हो सकता है कि उनकी टैरिफ और इमिग्रेशन नीतियों की और ज्यादा बारीकी से जांच हो और शायद एक बेहतर ट्रेड डील (व्यापार समझौता) करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिल जाए। पाकिस्तान के लिए, इस बदलाव का मतलब यह हो सकता है कि ट्रंप के करीबी लोगों के साथ उसने जो क्रिप्टो और डिफेंस डील की हैं, उनकी कड़ी जांच हो सकती है। इसी वजह से पाकिस्तान, ट्रंप का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रहा है।

हालांकि ट्रंप जनवरी 2029 तक पद पर रहेंगे, लेकिन अब वह अपनी मर्जी से कोई नया कानून पास नहीं करवा पाएंगे और न ही अपने एजेंडे को मनमाने ढंग से आगे बढ़ा पाएंगे। अपने कार्यकाल के आखिरी दो सालों में उन्हें एक ऐसी कांग्रेस का सामना करना पड़ेगा जो उनके खिलाफ ज्यादा आक्रामक होगी। डेमोक्रेट्स ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि वे ट्रंप की विदेश नीति के फैसलों और उनके परिवार के बिजनेस हितों की जांच करेंगे।

हालांकि, भारत और पाकिस्तान के लिए इसके नतीजे काफी अलग हो सकते हैं। हमारे साथ बने रहें, हम आपको बताएंगे कि ऐसा क्यों है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजे: भारत पर इसका क्या असर पड़ सकता है?

इस करारी हार के बाद, ट्रंप अपने 'MAGA' समर्थकों के सामने अपनी ताकत दिखाने के लिए विदेश नीति में कोई बड़ी जीत हासिल करना चाहेंगे। भारत के साथ एक तेज ट्रेड डील करना उनके एजेंडे में सबसे ऊपर हो सकता है।

दूसरी ओर, भारत इन मिडटर्म नतीजों को एक ऐसे मौके के रूप में देख सकता है जिससे वह अपने लिए एक फायदेमंद डील पक्की कर सके, जो कई महीनों से अटकी हुई है। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, असल में, भारत तब तक इंतजार कर रहा था जब तक उसे यह भरोसा न मिल जाए कि उसे चीन और वियतनाम जैसे अपने प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बेहतर टैरिफ शर्तें मिलेंगी।

इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन अभी 'ट्रेड एक्ट' की धारा 301 के तहत भारत और अन्य देशों की जांच कर रहा है। वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या ये देश अपनी जरूरत से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का इस्तेमाल करके अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ये मुद्दे ट्रेड डील करने में एक बड़ी रुकावट बन गए हैं।

अब, कमजोर होते ट्रंप की वजह से भारतीय वार्ताकारों को थोड़ी राहत मिल सकती है, और उन्हें किसी समझौते के लिए जल्दबाजी करने का दबाव कम महसूस हो सकता है। हालांकि, दूसरी तरफ, इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्ते बनाने का रास्ता आसान हो जाएगा।

गलतफहमी में न रहें। ट्रंप अभी भी टैरिफ लगाने के लिए अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। डेमोक्रेट्स के नियंत्रण वाली कांग्रेस इन फैसलों को अपने आप नहीं पलट सकती।

वह यह जरूर कर सकती है कि ट्रंप के टैरिफ का अमेरिकी व्यवसायों और उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ रहा है, इसकी जांच करे। इससे प्रशासन पर अपनी नीति में सुधार करने का दबाव बढ़ेगा।

H-1B वीजा: क्या भारत को कुछ राहत मिल सकती है?

एक और क्षेत्र जहां सत्ता संतुलन में बदलाव भारत के लिए मायने रख सकता है, वह है आव्रजन (इमिग्रेशन)।

कुशल विदेशी कामगारों, खासकर H-1B वीजा कार्यक्रम को लेकर ट्रंप की सख्ती ने भारतीय पेशेवरों और उन पर निर्भर अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों के बीच अनिश्चितता पैदा कर दी है।

प्रशासन ने न केवल H-1B वीजा के लिए 1,00,000 अमेरिकी डॉलर की भारी-भरकम फीस तय कर दी है, बल्कि संघीय एजेंसियों को यह निर्देश भी दिया है कि वे उन कंपनियों के H-1B वीजा आवेदनों की बारीकी से जांच करें, जो अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही हैं।

इन दोनों कदमों का अप्रत्यक्ष रूप से उन भारतीय टेक पेशेवरों पर असर पड़ा है, जो H-1B वीजा कार्यक्रम में सबसे बड़ी संख्या में शामिल हैं।

असल में, मंजूर किए गए हर चार H-1B वीजा में से लगभग तीन भारतीय नागरिकों को मिलते हैं, जो उन्हें अमेरिका के टेक सेक्टर की रीढ़ बनाते हैं।

कई डेमोक्रेटिक सांसदों ने ट्रंप के H-1B संबंधी कदमों की कड़ी आलोचना की है। अब जब कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने जा रहा है, तो कुशल आव्रजन को सीमित करने के आर्थिक परिणामों- खासकर अमेरिकी टेक कंपनियों पर पड़ने वाले असर- की जांच और कड़ी होने की संभावना है।

भले ही तुरंत कोई राहत न मिले, लेकिन लंबे समय में यह भारतीय टेक पेशेवरों के लिए अच्छी खबर हो सकती है।

हालांकि, भारत के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं होगा। डेमोक्रेट्स ने पहले भी भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना की है - एक ऐसा आरोप जिस पर नई दिल्ली ने कड़ा विरोध जताया है।

डेमोक्रेट्स ने पहले भी भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना की है

डेमोक्रेट्स ने पहले भी भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड की आलोचना की है

उम्मीद है कि डेमोक्रेट्स भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति और अल्पसंख्यक समूहों के साथ किए जा रहे बर्ताव पर अधिक बारीकी से ध्यान देंगे।

पाकिस्तान के साथ ट्रंप के समझौतों का क्या होगा?

पाकिस्तान के लिए, अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का दबदबा कायम होना एक नई मुसीबत खड़ी कर सकता है।

इस्लामाबाद ने पिछले डेढ़ साल में ट्रंप के साथ करीबी रिश्ते बनाने के लिए काफी मेहनत की है- ज्यादातर उनकी तारीफ करके और उनके अहंकार को झेलकर। इसमें से कुछ कोशिशें ऐसे बिजनेस सौदों के जरिए की गईं, जिनका संबंध ट्रंप के परिवार से है।

इसमें 'वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल' (ट्रंप परिवार का मुख्य क्रिप्टोकरेंसी बिजनेस) की एक सहयोगी कंपनी के साथ हुआ एक समझौता (MoU) भी शामिल है। अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ इसके सह-संस्थापकों में से एक हैं।

इसके अलावा, इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान ने अमेरिकी कंपनी 'पावरस' (Powerus) के साथ कई मानवरहित हवाई प्रणालियों (unmanned aerial systems) को लेकर एक समझौता किया। इस कंपनी के ट्रंप के बेटों के साथ करीबी संबंध हैं।

पाकिस्तान की तरफ से, इन दोनों समझौतों की कमान सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने संभाली थी, जिन्हें ट्रंप ने 'मेरा पसंदीदा फील्ड मार्शल' कहा है।

पिछले सितंबर में, पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण खनिजों (critical minerals) के विकास के लिए अमेरिकी कंपनी 'यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स' (USSM) के साथ 500 मिलियन डॉलर का एक समझौता भी किया था।

इसके अलावा, न्यूयॉर्क में रूजवेल्ट होटल के नवीनीकरण का सौदा भी है, जो पाकिस्तान की राष्ट्रीय एयरलाइन के स्वामित्व में है। खबरों के अनुसार, इस व्यवस्था को कराने में विटकॉफ ने अहम भूमिका निभाई थी।

अब, अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने का मतलब है कि ट्रंप और उनके करीबी लोगों के खिलाफ और ज्यादा जांच और सुनवाई होगी। डेमोक्रेट्स ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वे ट्रंप परिवार की स्टॉक ट्रेडिंग और क्रिप्टोकरेंसी से जुड़े कामों की जांच करेंगे। ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर और बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के बिजनेस सौदों की भी कड़ी जांच हो सकती है।

ऐसे हालात में, पाकिस्तानी सेना भी इन जांचों के दायरे में आ सकती है।

बड़ी तस्वीर क्या निकलकर आती है?

अमेरिकी कांग्रेस में सत्ता के संतुलन में बदलाव का भारत और पाकिस्तान पर अलग-अलग असर पड़ सकता है।

भारत के लिए, रिपब्लिकन पार्टी की हार एक मौका बन सकती है। इससे भारत को ट्रंप के साथ व्यापार पर बातचीत करने के लिए ज्यादा जगह मिलेगी, और उसे अपनी शर्तों के खिलाफ कोई समझौता करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। हालांकि, इससे भारत-अमेरिका संबंधों में चल रहा उतार-चढ़ाव वाला दौर शायद पूरी तरह खत्म न हो। पाकिस्तान के लिए चिंता का मुख्य विषय यह है कि ट्रंप के करीबी लोगों के साथ उसने जो कारोबारी रिश्ते बनाए हैं, उन पर अमेरिकी कांग्रेस की नजर पड़ सकती है।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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