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दुनिया के इन बड़े शहरों ने जहरीली हवा को साफ कर पेश की मिसाल, दिल्ली-NCR के लिए बड़ी सीख, क्या करना होगा?

हाल ही में विभिन्न एजेंसियों के सर्वे और रिपोर्ट्स में यह बात खुलकर सामने आई है कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर भारी-भरकम बजट खर्च होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिला है। आखिर इससे कैसे छुटकारा पाया जा सकता है....

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Photo : PTI
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण से कैसे मिलेगी राहत?
Authored by: अमित कुमार मंडल
Updated Nov 5, 2026, 14:08 IST
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जहां एक ओर दुनिया के कई प्रमुख शहर और देश कड़े व समयबद्ध कदमों के जरिए अपनी आबोहवा को साफ करने में कामयाब रहे हैं, वहीं देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटा एनसीआर क्षेत्र आज भी जहरीले प्रदूषण के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाया है। हाल ही में विभिन्न एजेंसियों के सर्वे और रिपोर्ट्स में यह बात खुलकर सामने आई है कि प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर भारी-भरकम बजट खर्च होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिला है। दिल्ली इन दिनों प्रदूषण और निम्न स्तर पर पहुंच चुके हवा गुणवत्ता इंडेक्स यानी एक्यूआई को लेकर चर्चा में है। आखिर इस मामले में कैसे चूक गया भारत और दिल्ली, दुनिया के किन देशों के प्रमुख शहरों ने जहरीली हवा को साफ करने की मिसाल पेश की है, दिल्ली-एनसीआर को किस तरह के कदम उठाने होंगे, विस्तार से इन सवालों के जवाब जानते हैं।

बीजिंग ने कैसे बदली जहरीली हवा?

चीन सरकार के 'क्लीन एयर एक्शन प्लान (2013-2020)' और बीजिंग पर्यावरण संरक्षण ब्यूरो के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि चीन ने किस तरह काम किया। कोयले पर रोक से लेकर इलेक्ट्रिक बसों तक चीन ने बड़े कदम उठाए हैं। 2013 में गंभीर वायु प्रदूषण के बाद बीजिंग ने क्लीन एयर एक्शन प्लान लागू किया। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को बंद किया गया और हीटिंग के लिए प्राकृतिक गैस को बढ़ावा दिया गया। पुरानी गाड़ियों को हटाने, नई कारों की बिक्री सीमित करने और इलेक्ट्रिक बसों का नेटवर्क बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए।

नतीजा:* 2013 से 2020 के बीच PM2.5 के स्तर में 50% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई।

लंदन ने सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाया

'ट्रांसपोर्ट फॉर लंदन' (TfL) और ग्रेटर लंदन अथॉरिटी द्वारा यूके क्लीन एयर एक्ट और 'अल्ट्रा लो एमिशन जोन' (ULEZ) पर जारी की गई मूल्यांकन रिपोर्ट के मुताबिक, लंदन ने सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाया और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर सख्त कानून बनाए। लंदन ने अल्ट्रा लो एमिशन जोन (ULEZ) लागू किया। इसके तहत तय उत्सर्जन मानकों पर खरे नहीं उतरने वाले वाहनों पर शुल्क लगाया जाता है। साथ ही सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा दिया गया, ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सके।

नतीजा: शहर के केंद्र में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई।

मेक्सिको ने वाहनों और उद्योगों पर लगाम कसी

मेक्सिको ने वाहनों और उद्योगों पर लगाम कसी और ट्रैफिक नियमों से लेकर फैक्ट्रियों पर कार्रवाई की। मेक्सिको सिटी ने प्रदूषण कम करने के लिए गाड़ियों की नंबर प्लेट के आधार पर उनके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाए। इसके अलावा प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर सख्ती की गई और शहर के भीतर स्थित एक बड़ी तेल रिफाइनरी को बंद किया गया।

नतीजा: वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार देखने को मिला।

लॉस एंजिल्स ने तकनीक से प्रदूषण घटाया

लॉस एंजिल्स ने तकनीक से प्रदूषण घटाया और इसके लिए वाहनों के उत्सर्जन पर सख्त नियम बनाए। 1970 के दशक में गंभीर स्मॉग की समस्या से जूझने वाले लॉस एंजिल्स ने वाहनों के उत्सर्जन पर सख्त मानक लागू किए। गाड़ियों में प्रदूषण नियंत्रित करने वाली तकनीक को अनिवार्य बनाया गया और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा दिया गया।

नतीजा: लंबे समय में ओजोन प्रदूषण के स्तर में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

दिल्ली-NCR क्या सीख सकता है?

दिल्ली को सिर्फ GRAP नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत है। यहां प्रदूषण पर काबू पाने के लिए कई नियम लागू करने होंगे। इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। न सिर्फ लोगों को जागरूक करना होगा, बल्कि सख्त नियम बनाकर उनका पालन भी सुनिश्चित करना होगा।

  • लंबी अवधि की योजना: GRAP के साथ पूरे साल लागू रहने वाला क्लीन एयर प्लान जरूरी है
  • लो एमिशन जोन: आनंद विहार, ITO और ओखला जैसे प्रदूषण हॉटस्पॉट में सख्त नियम लागू किए जाएं
  • NCR में तालमेल: दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को मिलकर प्रदूषण पर काम करना होगा
  • धूल पर नियंत्रण: सड़कों की नियमित सफाई और निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के उपाय जरूरी हैं
  • सार्वजनिक परिवहन: निजी वाहनों पर निर्भरता घटाकर बसों और मेट्रो नेटवर्क को मजबूत करना होगा

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने की 4 बड़ी वजहें

क्षेत्रीय समन्वय की कमी

दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों में प्रशासनिक तालमेल का अभाव है। जब तक पूरे एनसीआर क्षेत्र में एक साथ एक जैसी सख्त नीतियां लागू नहीं होतीं, तब तक एक राज्य के कदम दूसरे राज्य में बेअसर साबित होते हैं।

पराली और स्थानीय प्रदूषण का दोहरा वार

हालांकि सर्दियों में पराली जलाना एक बड़ा मुद्दा बनता है, लेकिन इसके साथ-साथ सड़कों की धूल, बेकाबू निर्माण गतिविधियां (C&D Waste), पुराने वाहन और औद्योगिक उत्सर्जन जैसी स्थानीय समस्याएं स्थिति को और गंभीर बना देती हैं।

प्रतिकूल भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियां

भौगोलिक रूप से सर्दियों के मौसम में हवा की गति धीमी हो जाती है और तापमान में गिरावट के कारण प्रदूषक कण जमीन के करीब आकर ट्रैप हो जाते हैं, जिससे स्मॉग की मोटी परत बन जाती है।

महंगे और सतही उपाय

जानकारों का मानना है कि सरकारें प्रदूषण के मूल कारणों को खत्म करने के बजाय अक्सर महंगे स्मॉग टॉवर जैसे सतही और सीमित असर वाले उपायों पर भारी बजट खर्च कर देती हैं, जिनका कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं निकलता।

दुनिया के शहरों ने कर दिखाया

दुनिया के शहरों ने दिखाया है कि मजबूत इच्छाशक्ति, सख्त नियम और सही योजना से जहरीली हवा को साफ किया जा सकता है। दिल्ली-NCR को भी स्थायी समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। विशेषज्ञों का साफ तौर पर कहना है कि अगर दिल्ली-एनसीआर को वाकई दुनिया के स्वच्छ शहरों की बराबरी करनी है, तो केवल मौसमी पाबंदियों (जैसे GRAP के चरण) पर निर्भर रहने के बजाय सालभर चलने वाली ठोस रणनीतियों पर काम करना होगा। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने, सार्वजनिक परिवहन को पूरी तरह से सुगम बनाने और उद्योगों पर सख्त निगरानी रखने से ही बात बन सकती है।

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