Aga Ruhullah Mehdi: जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) को 3 नवंबर 2026 को बड़ा राजनीतिक झटका लगा, जब श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने पार्टी और लोकसभा, दोनों से इस्तीफे का ऐलान कर दिया। अपने पिता आगा सैयद मेहदी की 26वीं पुण्यतिथि पर बडगाम की जनसभा में उन्होंने कहा कि दोपहर 2:40 बजे से वे NC का हिस्सा नहीं हैं। उथल-पुथल की वजह सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है। यह उस पुराने सवाल की वापसी है, जिससे 2019 के बाद से घाटी की राजनीति जूझ रही है: पहली लड़ाई अनुच्छेद 370 की हो या राज्य के दर्जे की, और केंद्र की भाजपा सरकार से टकराव का रास्ता चुना जाए या तालमेल का। सत्ता में आने के सिर्फ एक साल बाद NC इन्हीं सवालों पर भीतर से बंटी दिख रही है।
रूहुल्लाह ने NC क्यों छोड़ी?
सबसे बड़ा कारण वैचारिक है। उनका आरोप है कि NC ने अनुच्छेद 370 की बहाली, राजनीतिक बंदियों की रिहाई और लोगों के अधिकारों की सुरक्षा जैसे चुनावी वादों को सत्ता में आकर प्राथमिकता नहीं दी। यह मतभेद नया नहीं है। 2020 में वे NC के मुख्य प्रवक्ता पद से इसी बहस में हटे थे, जब उन्होंने कहा था कि पार्टी की पहली मांग विशेष दर्जा होनी चाहिए, राज्य का दर्जा सबसे आखिरी। इसके बाद टकराव की कड़ियां जुड़ती गईं। दिसंबर 2024 में आरक्षण के मुद्दे पर वे छात्रों के साथ मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन में शामिल हुए। फिर पार्टी की कार्य समिति की बैठक में उन्हें नहीं बुलाया गया, जो 2002 के बाद पहली बार हुआ। नवंबर 2025 के बडगाम उपचुनाव में उन्होंने NC उम्मीदवार का प्रचार नहीं किया। PDP के आगा सैयद मुंतजिर मेहदी 4,478 वोट से जीते, और बडगाम में 1977 के बाद NC की यह पहली हार थी।
आगा चाहते हैं कि उमर संसद जाएं
अगस्त 2026 में फारूक अब्दुल्ला ने उन्हें सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ने की चुनौती दी। रूहुल्लाह ने जवाब दिया कि इस्तीफा आएगा, पर पहले जवाबदेही चाहिए। उनका प्रस्ताव था कि उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री पद छोड़कर संसद जाएं और वहीं से 370 की लड़ाई लड़ें। उमर का रुख अलग है। द वायर के विश्लेषण के मुताबिक वे मानते हैं कि केंद्र की मौजूदा सरकार से 370 पर सीधा टकराव कोई नतीजा नहीं देगा, इसलिए उनकी प्राथमिकता राज्य के दर्जे की बहाली है।
Aga Ruhullah Mehdi
क्या रूहुल्लाह नई पार्टी बनाएंगे?
अभी तक किसी नई पार्टी की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, पर संकेत साफ हैं। टाइम्स नाउ नवभारत के मुताबिक अपने 80 मिनट के भाषण में उन्होंने नया राजनीतिक संगठन बनाने के संकेत दिए। जून 2025 में सोपोर की सभा में भी वे 'विश्वसनीयता, जवाबदेही और संरचनात्मक सुधार' पर आधारित नए मोर्चे की बात कर चुके थे, तब उनके करीबियों ने इसका खंडन किया था। बाद में उन्होंने कहा था कि नई पार्टी को लेकर मीडिया उनसे ज्यादा उत्सुक है। उनकी ताकत बडगाम-श्रीनगर का शिया आधार, आगा परिवार की धार्मिक-राजनीतिक विरासत और 2024 में 1.8 लाख वोट के अंतर की जीत है। चुनौती भी बड़ी है। कश्मीर में कई राजनीतिक प्रयोग हुए हैं, पर कम ही टिके। 2016 में PDP सांसद पद छोड़ने वाले तारिक कर्रा की मिसाल दी जाती है, और रूहुल्लाह के लिए भी वैसे ही हश्र की आशंका जताई गई है। फिर भी कुछ विश्लेषक उनकी 'सॉफ्ट सेपरेटिज्म' वाली राजनीति, यानी हथियार नहीं, नैतिक स्पष्टता के सहारे प्रतिरोध, को असर वाला मानते हैं। आगे की राह संगठन, गठबंधन या PDP जैसे दलों से तालमेल पर निर्भर करेगी।
NC और उमर अब्दुल्ला के लिए कितना संकट
विधानसभा के अंकगणित से सरकार को तत्काल खतरा नहीं दिखता। बडगाम नतीजे के बाद मेहबूबा मुफ्ती ने खुद सरकार के '50 विधायकों' का जिक्र किया था। संकट असली तौर पर साख और संगठन का है। पहला असर संसद में दिखेगा। रूहुल्लाह के इस्तीफे के बाद लोकसभा में NC के पास सिर्फ मियाँ अल्ताफ अहमद रह जाएंगे। दूसरा, औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने पर श्रीनगर सीट का उपचुनाव उमर के लिए बडगाम के बाद दूसरी बड़ी परीक्षा होगा। तीसरा, 'वादे बनाम अमल' की बहस अब विपक्ष के हाथ में एक ठोस उदाहरण के रूप में है। रूहुल्लाह यह भी कह चुके हैं कि फारूक अब्दुल्ला के बाद उमर पार्टी को नहीं संभाल पाएंगे, यानी उत्तराधिकार का सवाल भी खुल गया है।
राज्य के दर्जे पर उमर को ठोस नतीजा निकालना होगा
NC की प्रतिक्रिया दो सुरों में है। एक तरफ पार्टी ने इस्तीफे को 'राजनीतिक नौटंकी' कहकर पूछा कि विशेष दर्जे के लिए संसद में उन्होंने क्या किया। दूसरी तरफ प्रवक्ता इमरान नबी डार ने उन्हें वरिष्ठ नेता और अहम धार्मिक व्यक्तित्व बताते हुए सुलह की उम्मीद जताई। एक विश्लेषक की राय है कि अगर राज्य का दर्जा बहाल हो जाए और NC कार्यकाल के अंत तक अच्छा प्रदर्शन करे, तो इस विद्रोह का दीर्घकालिक असर सीमित रह सकता है। यानी उमर के लिए सबसे बड़ी कसौटी केंद्र से राज्य के दर्जे पर ठोस नतीजा हासिल करना है।
क्या भाजपा को फायदा होगा?
घाटी में भाजपा को सीधा चुनावी लाभ सीमित है, पर अप्रत्यक्ष फायदे की गुंजाइश है। बडगाम उपचुनाव में निर्दलीय जिब्रान डार को 7,152 वोट मिले, जो PDP की जीत के अंतर 4,478 से ज्यादा थे। यानी NC-विरोधी और NC-समर्थक, दोनों तरह के वोट बिखर रहे हैं। बहुकोणीय मुक़ाबले में बंटे वोट का लाभ अक्सर उसे मिलता है जिसका आधार संगठित है। 2024 में खुद रूहुल्लाह ने भाजपा पर वोट बंटवाकर 2014 जैसी स्थिति बनाने की कोशिश का आरोप लगाया था।
omar abdullah
नैरेटिव के स्तर पर भी भाजपा को सहूलियत है। दिसंबर 2024 में पार्टी ने दावा किया था कि NC बिखराव की ओर है, और बडगाम की हार को नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने 'अब्दुल्ला परिवार की हार' बताया। कमजोर और अंदरूनी खींचतान वाली NC सरकार केंद्र से सौदेबाजी में भी कमजोर पड़ती है।
विपक्षी वोट बंटने पर BJP का हो सकता है फायदा
पर इसकी सीमाएं भी हैं। रूहुल्लाह की राजनीति 370 पर भाजपा-विरोधी है, इसलिए उनका उभार भाजपा के वोट में नहीं बदलता। घाटी में अभी सबसे ज्यादा फायदा PDP को दिखता है, जिसने 2024 में सिर्फ तीन सीटें जीती थीं और बडगाम से वापसी की। NC के एक वरिष्ठ नेता यह भी कह चुके हैं कि भाजपा से गठजोड़ पार्टी को दफ्न कर सकता है। रूहुल्लाह का जाना NC के लिए सरकार गिरने का संकट नहीं, बल्कि भरोसे का संकट है। भाजपा को फायदा तभी होगा जब घाटी का विपक्षी वोट कई टुकड़ों में बंटे। इसकी असली परीक्षा श्रीनगर का संभावित उपचुनाव और राज्य के दर्जे पर केंद्र का रुख तय करेंगे।
