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2019 में हर सीट पर खर्च हुआ था 100 करोड़, प्रत्याशियों के लिए कैसे बोझ बनता जा रहा चुनाव? आंकड़ों से समझिए

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 13, 2024, 03:41 PM IST

Lok Sabha Elections: 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Chunav) में हर लोकसभा क्षेत्र (Election 2024) में करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। एक तरह से देखें तो 700 रुपये प्रति वोट खर्च किए गए। इसे चुनाव को दुनिया का अब तक का सबसे महंगा चुनाव बताया गया था। एक स्टडी के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में 55,000-60,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। वहीं, 2024 में यह खर्च बढ़कर 1.20 लाख करोड़ रुपये हो सकता है।

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2019 में हर सीट पर खर्च हुआ था 100 करोड़, प्रत्याशियों के लिए कैसे बोझ बनता जा रहा चुनाव? आंकड़ों से समझिए

Lok Sabha Elections: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में लोकसभा चुनाव लड़ने में असमर्थता जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि चुनाव लड़ने के लिए उनके पास पैसा नहीं है। कई लोगों को उनका यह बयान चौंका सकता है, लेकिन असलियत यह है कि निर्मला सीतारमण ने कुछ भी गलत नहीं कहा था। देश में चुनावी खर्च के आंकड़ों को देखें तो आंखे फटी की फटी रह जाएंगी। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों में 1.20 लाख करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।

पहले चुनाव से लेकर अबतक चुनावी खर्च कई गुना बढ़ चुका है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 1952 में हुए देश के पहले चुनाव में 10.5 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में यह खर्च बढ़कर 3,870.3 करोड़ रुपये पहुंच गया। गैर लाभकारी संगठन सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (CMS) की एक स्टडी के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में 55,000-60,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। वहीं, 2024 में यह खर्च बढ़कर 1.20 लाख करोड़ रुपये हो सकता है।

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देश के आम चुनावों में कैसे बढ़ता गया खर्च

2019 में हुआ था दुनिया का सबसे महंगा चुनाव

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की स्टडी के मुताबिक, 2019 के लोकसभा चुनाव में हर लोकसभा क्षेत्र में करीब 100 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। एक तरह से देखें तो 700 रुपये प्रति वोट खर्च किए गए। सीएमएस ने इस चुनाव को दुनिया का अब तक का सबसे महंगा चुनाव बताया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि यह खर्च और भी ज्यादा हो सकता था। दरअसल, यह स्टडी चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होने के बाद की गई थी, इससे पहले के खर्च को अंतिम आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया था।

1952 से अबतक कैसे बढ़ता गया चुनावी खर्च
चुनाव का वर्ष मतदाताओं की संख्या (करोड़ में)चुनावी खर्च (करोड़ में)
195217.3210.5
196719.375.9
196221.647.3
196725.0210.8
197127.4211.6
197732.1223.0
198035.6254.8
198440.0381.5
198949.89154.2
199151.15359.1
199659.26597.3
199860.59666.2
199961.95947.7
200467.151016.1
200971.701114.4
201483.403870.3
201990.00--
202497.00--

बढ़ती गई प्रत्याशियों के खर्च की सीमा

चुनाव आयोग के मुताबिक, 1952 से लेकर अबतक प्रत्याशियों के खर्च की सीमा भी बढ़ती गई है। 1952 में एक प्रत्याशी के लिए खर्च की सीमा 25,000 रुपये थी, जो 2014 में बढ़कर 70 लाख रुपये हो गई। वहीं, 2024 में यह सीमा बढ़कर 95 लाख रुपये कर दी गई है। विधानसभा चुनावों में एक प्रत्याशी 40 लाख रुपये खर्च कर सकता है। हालांकि, कुछ छोटे राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में लोकसभा चुनाव के लिए 75 लाख और विधानसभा चुनाव में 28 लाख रुपये की लिमिट रखी गई है। वहीं, बड़ी बात यह है कि राजनीतिक दलों के लिए खर्च की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई है।

कैसे तय होती है खर्च की सीमा?

किसी भी चुनाव में खर्च की सीमा उस राशि को कहा जाता है, जो एक प्रत्याशी अपने चुनाव अभियान के दौरान वैध रूप से खर्च कर सकता है। इसमें जनसभाएं, रैली, विज्ञापन, पोस्टर-बैनर, वाहन के खर्च शामिल होते हैं। चुनाव खत्म होने के 30 दिनों के अंदर किसी भी प्रत्याशी को खर्च का विवरत चुनाव आयोग को देना होता है। वहीं, सीएमएस के अनुसार कुल खर्च का आंकलन चुनाव पर हुए खर्च, लोगों की धारणा, अनुभव और अनुमान के आधार पर किया जाता है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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