स में शिक्षा व्यवस्था के सुधार की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे स्कूली छात्रों का आंदोलन अब व्यापक हिंसा, पुलिसिया झड़पों और राजनीतिक घमासान में बदल चुका है। सितंबर में सत्र की शुरुआत के साथ शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब 560 से अधिक स्कूलों को प्रभावित कर चुका है, जिसमें 1,900 से अधिक गिरफ्तारियां और सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। जर्जर इमारतों और शिक्षकों की कमी से भड़का यह असंतोष न सिर्फ फ्रांस की गिरती शिक्षा प्रणाली के संकट को उजागर कर रहा है, बल्कि 2027 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले देश की पूरी राजनीति को झकझोर रहा है।
अचानक कैसे भड़का आंदोलन?
फ्रांस में गर्मियों की छुट्टियां खत्म होने और नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के ठीक एक महीने बाद देश भर के हाई स्कूल अचानक उग्र प्रदर्शनों और अशांति की चपेट में आ गए। शुरुआत में पेरिस क्षेत्र से शुरू हुआ यह छात्र आंदोलन जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गया। छोटे शहरों से लेकर बड़े महानगरों तक छात्र सड़कों पर उतर आए। शुक्रवार दोपहर तक फ्रांस के शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक देश भर के कम से कम 560 हाई स्कूलों में विरोध प्रदर्शनों के कारण कामकाज और कक्षाएं पूरी तरह प्रभावित हुईं।
फ्रांस में फिर इतिहास दोहराया गया
फ्रांस में सड़कों पर उतरकर विरोध जताना 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के समय से ही परंपरा रही है। 1968 के ऐतिहासिक छात्र प्रदर्शन, 2005 के उपनगरीय दंगे और 2023 के पेंशन सुधार विरोधी आंदोलन इसके बड़े उदाहरण रहे हैं। स्कूल के मुख्य द्वारों पर बैरिकेडिंग कर रहे स्कूली छात्रों ने बिल्कुल पेशेवर प्रदर्शनकारियों जैसा तरीका अपनाया, वे पुलिस के आंसू गैस के गोलों से बचने के लिए मास्क और गॉगल्स पहनकर सड़कों पर उतरे।
छात्र सड़कों पर क्यों हैं?
फ्रांसीसी छात्र किसी एक मुद्दे पर नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली को लेकर अपनी कई बुनियादी शिकायतों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। जर्जर और खस्ताहाल इमारतें, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और शिक्षकों व कर्मचारियों की भारी कमी। सरकार ने अगले साल के राज्य बजट में शिक्षा के लिए 65.5 अरब यूरो (लगभग 74 अरब अमेरिकी डॉलर) आवंटित किए हैं, जो कि रक्षा बजट (63.4 अरब यूरो) से भी अधिक है। इसके बावजूद छात्रों का आरोप है कि जमीनी स्तर पर स्कूलों की हालत में कोई सुधार नहीं दिख रहा है।
'शांतिपूर्ण प्रदर्शन' से 'हिंसा और दंगों' में कैसे बदला?
सुबह 8 बजे से शुरू होने वाली पढ़ाई के लंबे घंटे छात्रों के लिए काफी थकाऊ हैं। साथ ही, यूनिवर्सिटी में दाखिले की प्रवेश प्रणाली बेहद जटिल और तनावपूर्ण है। इस हफ्ते से कई यूनिवर्सिटी के छात्र भी हाई स्कूल के छात्रों के समर्थन में आंदोलन में शामिल हो गए हैं। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार का कहना है कि वे शांतिपूर्ण विरोध का सम्मान करते हैं, लेकिन अब यह आंदोलन वैध मांगों से हटकर असामाजिक तत्वों और दंगाइयों के हाथ में चला गया है। दंगा रोधी पुलिस ने स्कूल के रास्ते रोकने वाले प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए आंसू गैस, लाठीचार्ज और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का सहारा लिया।
घातक हमले और तेजाब, एसिड का इस्तेमाल
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस और स्कूल स्टाफ पर आतिशबाजी वाले पटाखे और खतरनाक हथियार फेंके। गृह मंत्रालय के अनुसार, कुछ मामलों में पुलिस पर तेजाब भी फेंका गया। सरकार के मुताबिक, लूटपाट और तोड़फोड़ करने की नीयत से आए उपद्रवियों ने खुद को छात्रों के आंदोलन से जोड़ लिया है। वे वैध मांगों वाले युवाओं की तरह नहीं, बल्कि अपराधियों और दंगाइयों की तरह बर्ताव कर रहे हैं।
भारी नुकसान और गिरफ्तारियां
गुरुवार को ही पुलिस ने 1,900 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। हिंसा में 305 पुलिसकर्मी घायल हुए। यह अशांति फ्रांस की सीमा पार कर पड़ोसी देश बेल्जियम तक पहुंच गई। लीज शहर (Liege city) में हिंसा और 6 लोगों की गिरफ्तारी के बाद करीब एक दर्जन स्कूलों को बंद करना पड़ा। यह आंदोलन केवल नई मांगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह फ्रांस की शिक्षा प्रणाली में आ रही गिरावट की गहरी चिंता को उजागर करता है।
अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में गिरावट, PISA रिपोर्ट
दुनिया भर के छात्रों का मूल्यांकन करने वाली ताजा PISA रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस में छात्रों का गणित और रीडिंग कॉम्प्रिहेंशन (पढ़ने-समझने की क्षमता) का स्कोर तेजी से गिरा है। अमीर और वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। शिक्षा प्रणाली गरीब तबके के बच्चों को सामाजिक रूप से ऊपर उठाने में नाकाम साबित हो रही है। सितंबर से सत्र शुरू होते ही सरकार ने सीखने के स्तर को सुधारने के तर्क के साथ हाई स्कूलों में स्मार्टफोन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। फ्रांस ने इस साल 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने वाला यूरोपीय संघ का पहला देश बनने की कोशिश की थी, लेकिन देश की शीर्ष अदालत ने इस कानून को रद्द कर दिया।
2027 के राष्ट्रपति चुनाव पर असर
इस छात्र अशांति ने फ्रांस की राजनीति और राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार को पूरी तरह गरमा दिया है। मैक्रों संविधान के तहत लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन आगामी मई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों ने इसे मुख्य राजनीतिक मुद्दा बना लिया है। मैक्रों खुद इस राजनीतिक जंग में कूद पड़े हैं। उन्होंने प्रदर्शनों में हो रही हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा की है और आरोप लगाया है कि युवाओं का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
दंगों पर शीर्ष नेताओं ने क्या कहा?
- वामपंथी नेता ज्यां-लुस मेलोंशों (Jean-Luc Melenchon) खुलकर छात्रों के समर्थन में आए हैं। उन्होंने पुलिसिया कार्रवाई को बर्बरता और दमनकारी बताया है। आलोचकों का आरोप है कि मेलोंशों की पार्टी 'फ्रांस अनबोव्ड' (France Unbowed) राजनीतिक लाभ लेने के लिए हिंसा को भड़का रही है।
- दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन (Marine Le Pen) ने दंगाइयों और उपद्रवियों से निपटने के लिए पुलिस को और अधिक अधिकार देने की मांग की है।
- ले पेन के मुख्य प्रतिद्वंद्वियों में शामिल कंजर्वेटिव नेता व पूर्व प्रधानमंत्री एडुआर्ड फिलिप (Edouard Philippe) एडुआर्ड फिलिप ने हिंसा की निंदा करते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को तोड़ने, जलाने और लोगों पर हमला करने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।