Pooja Meri Jaan Movie Review: मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की ‘पूजा मेरी जान’ प्यार, इनकार और समाज की सोच पर सवाल उठाती है। एक लड़के के सुसाइड के बाद पूजा पर सवाल खड़े होते हैं और उसकी दोस्त सना उसके लिए लड़ती है। क्या सच सामने आएगा?
फिल्म पूजा मेरी जान देखने से पहले पढ़ें ये रिव्यू (Image Source: Pooja Meri Jaan Movie)
Pooja Meri Jaan Movie Review: मृणाल ठाकुर (Mrunal Thakur) और हुमा कुरैशी (Huma Qureshi) की फिल्म ‘पूजा मेरी जान’ (Pooja Meri Jaan) प्यार, इनकार और उसके बाद पैदा होने वाले सवालों की कहानी है। फिल्म की शुरुआत एक लड़की पूजा से होती है, जिसकी जिंदगी एक लड़के के सुसाइड के बाद पूरी तरह बदल जाती है। पूजा को लोग उसकी मौत के लिए जिम्मेदार मानने लगते हैं और मामला कोर्ट तक पहुंच जाता है। फिल्म इसी सवाल के आसपास घूमती है कि किसी को प्यार के लिए मना करना क्या इतना बड़ा अपराध है कि उसके लिए एक लड़की को पूरी जिंदगी दोष दिया जाए? फिल्म 2 अक्टूबर को ZEE5 पर रिलीज हुई है।
फिल्म की कहानी पूजा डोगरा यानी मृणाल ठाकुर से शुरू होती है। पूजा एक आजाद सोच रखने वाली लड़की है, जो अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहती है। वो थिएटर से जुड़ी हुई है और उसके दोस्तों का भी अपना एक ग्रुप है। इसी ग्रुप में अनिकेत यानी विक्रम सिंह चौहान भी है। अनिकेत पूजा को पसंद करता है और उसके साथ रिश्ते में आना चाहता है। अनिकेत पूजा को प्रपोज करता है, लेकिन पूजा उसके प्यार को स्वीकार नहीं करती। यहां तक कि एक मौके पर वो सबके सामने उसके प्रपोजल को ठुकरा देती है। इसके बाद अनिकेत सुसाइड कर लेता है। मरने से पहले छोड़े गए एक वॉइस नोट की वजह से पूरा मामला और ज्यादा उलझ जाता है। अचानक पूजा पर ही सवाल उठने लगते हैं कि क्या उसकी वजह से अनिकेत ने ये कदम उठाया?
इसके बाद पूजा की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। जो लोग पहले उसके दोस्त थे, उनमें से कई लोग भी उसे ही गलत मानने लगते हैं। उसके कैरेक्टर पर सवाल उठते हैं और उसे अनिकेत की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है। मामला इतना बढ़ जाता है कि पूजा को पुलिस हिरासत तक जाना पड़ता है। यहीं फिल्म में हुमा कुरैशी की एंट्री होती है। वो सना का किरदार निभा रही हैं, जो पूजा की दोस्त और कॉरपोरेट वकील है। सना पूजा की मदद करने का फैसला करती है। इसके बाद कहानी कोर्ट और फ्लैशबैक के बीच चलती है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका टॉपिक है। पूजा की कहानी के जरिए फिल्म एक ऐसे सवाल को उठाती है, जिस पर बात करना जरूरी है। अगर कोई लड़की किसी लड़के को रिश्ते के लिए मना करती है, तो क्या उसके बाद होने वाली हर घटना के लिए उसे जिम्मेदार माना जा सकता है? फिल्म इस सवाल को सीधे कहानी के बीच रखती है। मृणाल ठाकुर ने पूजा के किरदार को काफी अच्छे तरीके से निभाया है। उनके किरदार में डर भी है, गुस्सा भी है और अपने ऊपर लग रहे आरोपों को लेकर परेशानी भी। मृणाल ने पूजा को पूरी तरह बेचारी लड़की बनाने की कोशिश नहीं की है। वह एक ऐसी महिला नजर आती हैं जो अपनी गलतियों को भी समझती है, लेकिन सिर्फ इसलिए खुद को दोषी मानने को तैयार नहीं है क्योंकि समाज उसे दोषी मान रहा है। कई समीक्षाओं ने भी मृणाल की परफॉर्मेंस को फिल्म की मजबूत कड़ी माना है।
हुमा कुरैशी भी सना के रोल में काफी नेचुरल लगती हैं। उनका किरदार पूजा का साथ देता है, लेकिन आंख बंद करके नहीं। सना सवाल पूछती है, बहस करती है और केस को समझने की कोशिश करती है। इस वजह से उनका किरदार फिल्म में सिर्फ सपोर्टिंग दोस्त बनकर नहीं रह जाता। विक्रम सिंह चौहान भी अनिकेत के किरदार में ठीक लगते हैं। विजय राज भी फिल्म में अपनी छाप छोड़ते हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इतना अच्छा टॉपिक होने के बावजूद कहानी उसे पूरी ताकत से इस्तेमाल नहीं कर पाती। शुरुआत में लगता है कि ये एक शानदार कोर्टरूम ड्रामा बन सकता है, लेकिन कोर्ट वाले हिस्से में वो सस्पेंस नहीं आता जिसकी उम्मीद होती है। बहस कई जगह कहानी के हिसाब से चलने के बजाय फिल्म का संदेश बताने का तरीका लगने लगती है।
दूसरी कमी है कि फिल्म कई जगह अपनी बात बहुत सीधे समझाने लगती है। कुछ सीन थोड़े भाषण जैसे लग सकते हैं। अनिकेत का किरदार भी थोड़ा और मजबूत लिखा जा सकता था। हुमा कुरैशी का किरदार अच्छा है, लेकिन उनकी वकील से क्रिमिनल केस लड़ने वाली वकील बनने की जर्नी थोड़ी जल्दी दिखाई गई है। फिल्म की कहानी भी कुछ जगह अनुमान लगाने लायक हो जाती है। शुरुआत में जो रहस्य बना रहता है, वो धीरे-धीरे काफी साफ होने लगता है। ऐसे में अगर आप कोर्टरूम थ्रिलर में लगातार बड़े ट्विस्ट की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म आपको हर जगह चौंकाएगी नहीं।
अगर आपको क्राइम, कोर्टरूम ड्रामा और रिश्तों से जुड़े गंभीर सवालों वाली फिल्में पसंद हैं, तो ‘पूजा मेरी जान’ को एक बार देखा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की एक्टिंग और फिल्म का टॉपिक है। कहानी आपको ये सोचने पर मजबूर करती है कि प्यार में किसी का इनकार स्वीकार करना क्यों जरूरी है और किसी की मौत के बाद सिर्फ एक इंसान को दोषी मान लेना कितना सही है। लेकिन अगर आप एक बहुत दमदार कोर्टरूम थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, जिसमें हर बहस और हर ट्विस्ट आपको सीट से बांधकर रखे, तो फिल्म थोड़ी कमजोर लग सकती है।