What is Grace Marks: दो हफ्ते की फजीहत के बाद आखिरकार सरकार ने यह मान लिया है कि CBSE के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में कुछ गड़बड़ियां हैं। सीबीएसई के नए और डिजिटल मार्किंग सिस्टम OSM में कुछ खामियां हैं, यह बात अब साफ हो गई है। सिस्टम की तकनीकी गड़बड़ियों और मूल्यांकन में विसंगतियों को लेकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने गुरुवार को CBSE के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की और उसके बाद यह माना कि चूक तो हुई है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि इस नए सिस्टम के चलते छात्रों को समस्या का सामना करना पड़ा है, हम इसकी जिम्मेदारी लेते हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि जल्द समाधान निकाला जाएगा, व्यवस्था को सुधारा जाएगा और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय की जाएगी। शिक्षा मंत्री ने इस पूरे विवाद की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए छात्रों को भरोसा दिलाया है कि इस गड़बड़ी में शामिल किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में आई भारी गड़बड़ी और छात्रों के टूटते भरोसे के बीच सीबीएसई ने फिर से री-चेकिंग और वेरिफिकेशन पोर्टल 1 जून से फंक्शनल करने की बात कही है। सोशल मीडिया पर छात्रों को ग्रेस मार्क्स देने की मांग प्रबलता से उठाई जा रही है। छात्रों का दावा है कि इस बार उन्हें अपेक्षा से बहुत कम अंक दिए गए, जबकि कुछ परीक्षकों ने भी मूल्यांकन प्रणाली में तकनीकी खामियों की ओर इशारा किया है। इसी वजह से अब छात्रों को 15 से 20 ग्रेस मार्क्स देने की मांग तेज हो गई है। कई परीक्षकों ने नाम ना चलाने की शर्त पर बताया कि कॉपियां जांचते वक्त सीबीएसई का OSM सिस्टम बार-बार हैंग हो रहा था, उत्तर पुस्तिकाओं के पेज ठीक से खुल नहीं रहे थे और कई बार उत्तर अधूरे दिखाई दे रहे थे। इसके अलावा, लंबे उत्तरों को स्क्रीन पर पढ़ना कठिन होने के कारण भी सही मूल्यांकन प्रभावित होने की आशंका जताई गई।
दरअसल, CBSE ने इस वर्ष 12वीं कक्षा में कॉपियों की जांच प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए “ऑन स्क्रीन मार्किंग” सिस्टम लागू किया है। इसमें परीक्षक छात्रों की उत्तर पुस्तिकाएं कंप्यूटर स्क्रीन पर देखकर अंक देते हैं। इसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और मूल्यांकन को तेज करना था, लेकिन इस बार कई समस्याएं सामने आईं। इस पूरे विवाद के बीच अब 15 से 20 ग्रेस मार्क्स देने की मांग उठ रही है। ग्रेस मार्क्स वे अतिरिक्त अंक होते हैं जो बोर्ड विशेष परिस्थितियों में छात्रों को राहत देने के लिए देता है। यानी अगर प्रश्नपत्र कठिन हो, प्रश्न गलत हो, परीक्षा या मूल्यांकन प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ी हो जाए या बड़ी संख्या में छात्रों के प्रभावित होने की आशंका हो, तक ग्रेस मार्क्स दिए जाते हैं। भारत में पहले कई प्रतियोगी परीक्षाओं में ग्रेस मार्क्स दिए जा चुके हैं। इस बार करीब 18 लाख छात्रों ने 12वीं की परीक्षा में हिस्सा लिया था। इनकी लगभग 98 लाख उत्तर पुस्तिकाएं थीं जिनके कुल मिलाकर करीब 40 करोड़ पेज OSM के तहत स्कैन किए गए। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस बात को माना है कि पहली बार यह मूल्यांकन प्रणाली लागू की गई और 40 करोड़ पेज स्कैन करने में गड़बड़ी हुई।
अब सवाल है कि क्या ग्रेस मार्क्स देकर CBSE बच्चों का भविष्य बचा सकता है? दरअसल, इसे लेकर विशेषज्ञों की राय दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक पक्ष का मानना है कि यदि मूल्यांकन प्रक्रिया में तकनीकी खामियां थीं और लाखों छात्रों के अंक प्रभावित हुए हैं, तो ग्रेस मार्क्स दिए जाने चाहिए। इससे छात्रों का एक साल बच सकता है, उनका मानसिक तनाव कम किया जा सकता है और बोर्ड के खिलाफ बढ़ता आक्रोश शांत किया जा सकता है। दूसरी ओर कुछ जानकारों का कहना है कि सभी छात्रों को समान रूप से 15-20 अंक देना निष्पक्ष नहीं होगा। इससे मेरिट सिस्टम प्रभावित हो सकता है और उन छात्रों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने वास्तव में बेहतर प्रदर्शन किया है। उनकी राय में बोर्ड को पहले शिकायतों की विस्तृत जांच करनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर केवल प्रभावित छात्रों को ग्रेस मार्क्स देकर राहत देनी चाहिए।
बता दें कि सीबीएसई के रीचेकिंग प्रोसेस को लेकर शिकायतों का अंबार लग चुका है। एक के बाद एक नया विवाद इसे लेकर सामने आ रहा है। सर्वर डाउन, पेमेंट फेल्ड, धुंधली कॉपियां, आंसर शीट्स की हेराफेरी और सप्लीमेंट्री आंसर शीट गायब होने के बाद OSM सिस्टम के हैक होने तक का दावा किया जा चुका है। शिक्षा मंत्रालय इस पूरे मामले की जांच में जुटा है, IIT मद्रास और IIT कानपुर की टीमें खामियों को दूर करने में लगी हैं। अब सीबीएसई ने दावा किया है कि री-चेकिंग और वेरिफिकेशन पोर्टल की सभी खामियों को दूर किया जा रहा है और 1 जून से पोर्टल चालू कर दिया जाएगा।
दरअसल, यह विवाद केवल अंकों का नहीं बल्कि छात्रों के भविष्य और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता का मुद्दा बन चुका है। यदि CBSE ने समय रहते पारदर्शी तरीके से समाधान नहीं निकाला, तो लाखों छात्रों और पैरेंट्स का भरोसा कमजोर हो सकता है। ऐसे में ग्रेस मार्क्स, पुनर्मूल्यांकन या विशेष मॉडरेशन जैसे विकल्प इस विवाद को शांत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
