पिछले कुछ सालों में इंजीनियरिंग और हायर एजुकेशन का पूरा माहौल बदल गया है। एक दौर था जब ज्यादातर स्टूडेंट्स का फोकस सिर्फ कंप्यूटर साइंस और आईटी पर होता था। लेकिन अब मार्केट की जरूरतें और कंपनियों की हायरिंग स्ट्रेटेजी दोनों बदल रही हैं। आने वाले प्लेसमेंट सीजन में साफ दिख रहा है कि कोर इंजीनियरिंग यानी मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, सिविल और इलेक्ट्रॉनिक्स ब्रांच के छात्रों को बड़ा फायदा मिलने वाला है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह आईटी सेक्टर में आई सुस्ती है। ग्लोबल इकोनॉमी के असर से बड़ी टेक कंपनियां अब पहले जैसी तेजी से भर्ती नहीं कर रही हैं। वहीं दूसरी तरफ भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी सेक्टर में सरकार और प्राइवेट कंपनियां लगातार निवेश कर रही हैं। इसी कारण मैकेनिकल, सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियर्स की मांग तेजी से बढ़ी है। खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के स्टूडेंट्स को EV और सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में मौके मिल रहे हैं।
भारत सरकार सेमीकंडक्टर को ग्लोबल हब बनाने की दिशा में काम कर रही है और टाटा जैसी कंपनियां चिप मैन्युफैक्चरिंग में भारी निवेश कर रही हैं।
मेक इन इंडिया और ऑटोमेशन के चलते मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्रों की वैल्यू भी बढ़ी है। कंपनियों को अब ऐसे प्रोफेशनल्स चाहिए जो रोबोटिक्स, 3D प्रिंटिंग और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग को समझते हों। वहीं बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स के कारण सिविल इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए भी प्लेसमेंट के नए दरवाजे खुल रहे हैं।
कंपनियों का फोकस
इस बार कंपनियों का फोकस हाइब्रिड स्किल्स पर है। सिर्फ कोर सब्जेक्ट जानना काफी नहीं है, बल्कि थोड़ी कोडिंग, डेटा एनालिस और AI की समझ रखने वाले छात्रों को ज्यादा प्राथमिकता मिल रही है। ऐसे में स्टूडेंट्स को चाहिए कि वे अपनी कोर थ्योरी मजबूत करें, नई टेक्नोलॉजी सीखें और प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स पर काम करें, ताकि प्लेसमेंट में बेहतर मौके हासिल कर सकें।
