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जिस DON के डर से दाऊद इब्राहिम भागा था पाकिस्तान, वो बबलू श्रीवास्तव होने वाला है रिहा!

Bablu Srivastava Crime Story: एक वक्त ऐसा आया जब दाऊद इब्राहिम के शागिर्द रहे बबलू श्रीवास्तव ने उसी को गोली मारने की धमकी दे डाली। मुंबई बम धमाके के वक्त दोनों के बीच दरार बढ़ गई और दाऊद इस कदर खौफजदा हो गया कि वो पाकिस्तान भाग गया। अब बबलू को 25 साल बाद जेल से रिहाई मिलने के आसार दिख रहे हैं।

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जेल से रिहा हो सकता है माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव।

Crime News: अंडरवर्ल्ड में दाऊद इब्राहिम और बबलू श्रीवास्तव का नाम किसी से नहीं छिपा है। एक वक्त था जब दोनों एक दूसरे के खासमखास थे, मगर देखते हुए देखते कुछ ऐसा हुआ जो दोनों जानीदुश्मन बन गए। कहा जाता है कि बबलू श्रीवास्तव के नाम से दाऊद इब्राहिम थरथर कांपता था। यहां तक कि वो भारत छोड़कर पाकिस्तान भाग गया। बबलू फिलहाल 25 सालों से उत्तर प्रदेश के बरेली जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है, अब उसकी रिहाई के दरवाजे खुलते दिख रहे हैं।

जेल से बाहर आने वाला है डॉन बबलू श्रीवास्तव!

जरायम की दुनिया में बबलू श्रीवास्तव का अच्छा खासा नाम है। अब उसके अच्छे आचरण के आधार पर जेल प्रशासन ने सरकार से उसकी रिहाई की सिफारिश की है। दरअसल, पुणे में कस्टम विभाग के एक अधिकारी एलडी अरोड़ा की हत्या के मामले में करीब 25 साल पहले उसे मॉरीशस से गिरफ्तार किया गया था, तभी से वो बरेली जेल में बंद है। जेल के अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती कुछ दिनों तक बबलू के तेवर अपराधियों वाले थे, मगर 25 साल तक जेल में रहने के दौरान उसके व्यवहार में काफी बदलाव देखा गया है।

जेल में बबलू श्रीवास्तव ने लिखी तीन किताबें

उम्रकैद की सजा काट रहे बबलू श्रीवास्तव ने 25 सालों में दिन किताबें लिखी। 'अधूरी ख्वाहिश' नाम की पहली किताब साल 2004 में प्रकाशित हुई थी। वहीं 'बढ़ते कदम' नाम की दूसरी किताब साल 2018 में आई थी। उसकी तीसरी किताब जिसका नाम 'क्रिमिनल' है वो फिलहाल छपने के लिए गई है। जेल प्रशासन ने उसके अच्छे आचरण को देखते हुए उसे रिहा करना का फैसला किया और सरकार से सिफारिश की। बबलू ने इसी के आधार पर क्षमा याचिका भी लगाई थी। अगर सरकार से प्रशासन की सिफारिश को मंजूरी मिल जाती है, तो उसे जल्द ही रिहा किया जा सकता है।

पढ़ाकू बबलू श्रीवास्तव कैसे बना माफिया डॉन?

बबलू के पिता पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो यूपी के गाजीपुर के रहने वाले वाले थे। बबलू के बड़े भाई सेना में कर्नल थे। बबलू की ख्वाहिश थी कि वो पढ़ लिखकर सबसे बड़ा वकील बने। पिता कि चाहत थी कि बबलू अपने भईया की तरह सेना में जाए। मगर बबलू ने अपनी जिद मनवा ली और लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंच गया। एलयू में चाकूबाजी कांड में बबलू को जेल जाना पड़ा, वो ये कहता रहा कि मैं निर्दोष हूं मगर सबूत उसके खिलाफ थे और उसे सजा काटनी पड़ी। जेल से बाहर आने के बाद ही बबलू ने अपना नया मुकाम बनाया और अपराध को गले लगा लिया।

जब दाऊद को ही गोली मारने की धमकी दे डाली

वक्त बीतता गया और बबलू श्रीवास्तव खूंखार होता गया। एक के बाद एक जुर्म की कहानी लिखते हुए वो अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के संपर्क में आया। बबलू दाऊद का खास बन गया। देश के अलग-अलग राज्यों में बबलू के खिलाफ 60 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हैं। मगर एक वक्त ऐसा आया कि दाऊद का खास उसी का दुश्मन बन गया। कहा जाता है कि जब मुंबई बम धमाकों की प्लानिंग हो रही थी, तो बबलू ने इसका विरोध कर दिया। डी कंपनी का ये शागिर्द बागी बन गया और उसने खुलेआम दाऊद को गोली मारने की धमकी दे डाली। दाऊद ने इस धमाके के बाद देश छोड़कर भागने का फैसला लिया। अब देखना होगा कि दाऊद का ये जानी दुश्मन जेल से रिहा होता है या नहीं।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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