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एक्सीडेंट के बाद 5 घंटे तक अस्पताल-अस्पताल घुमाते रहे, नहीं मिला इलाज, युवक की लापरवाही ने ली जान

गाजियाबाद में सड़क हादसे में घायल 24 वर्षीय तुषार की दो अस्पतालों की घोर संवेदनहीनता और इलाज में हुई देरी के कारण मौत हो गई। एक अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिला तो दूसरे ने 5 घंटे तक पैसों के लिए रोके रखा।

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गाजियाबाद में अस्पतालों की संवेदनहीनता का मामला (सांकेतिक चित्र)

Photo : iStock

Ghaziabad News: राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में स्वास्थ्य व्यवस्था और निजी अस्पतालों की संवेदनहीनता ने एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियां छीन लीं। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल 24 वर्षीय युवक तुषार कुमार की समय पर इलाज न मिलने और दो अस्पतालों के चक्कर काटने के दौरान मौत हो गई। हादसों में जिंदगी बचाने के लिए बेहद अहम माने जाने वाले 'गोल्डन आवर' में तुषार को इलाज के बजाय अस्पताल की शर्तों और पैसों की मांग का सामना करना पड़ा। यह दर्दनाक घटना ऐसे समय में सामने आई है जब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के ही एक मामले में गंभीर मरीजों और पीड़ितों को इलाज न देने वाले अस्पतालों को लेकर सख्त टिप्पणी की थी।

देर रात काम से घर लौटते समय हुआ हादसा

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वसुंधरा के प्रहलादगढ़ी निवासी तुषार कुमार एक होटल में वेटर का काम करते थे। 20 सितंबर को तड़के करीब 2:30 बजे वह अपना काम निपटाकर बाइक से घर लौट रहे थे। नमो भारत साहिबाबाद स्टेशन से महज 100 मीटर दूर लिंक रोड पर किसी अज्ञात वाहन ने उनकी बाइक को जोरदार टक्कर मार दी। राहगीरों की सूचना पर 112 डायल कर पहुंची पुलिस वैन तुषार को गंभीर हालत में तुरंत पास के अटलांटा अस्पताल ले गई।

एक अस्पताल में नहीं मिले डॉक्टर, दूसरे ने पैसों के लिए 5 घंटे रोके रखा

तुषार के पिता शिव ने अस्पतालों की लापरवाही की जो कहानी सुनाई, वह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस तुषार को सबसे पहले अटलांटा अस्पताल ले गई, जो केंद्र सरकार की PM-RAHAT (प्रधानमंत्री सड़क दुर्घटना पीड़ित अस्पताल में भर्ती और सुनिश्चित इलाज) योजना के तहत सूचीबद्ध है। नियमों के मुताबिक यहां 1.5 लाख तक का नि:शुल्क इलाज मिलना चाहिए था। हालांकि, अस्पताल के सीओओ डॉ. महेश चौधरी के अनुसार, तुषार के हाथ-पैर में गंभीर चोटें थीं और उस समय अस्पताल में वेस्कुलर सर्जन उपलब्ध नहीं था, इसलिए उसे रेफर कर दिया गया। अटलांटा के डॉक्टरों के सुझाव पर पुलिस तुषार को सुबह 3 बजे यशोदा मेडिसिटी ले गई। तुषार के पिता का आरोप है कि यशोदा अस्पताल ने भर्ती फीस की मांग की।

पिता शिव ने बताया कि फीस बहुत ज्यादा थी, इसलिए हमने बेटे को सरकारी अस्पताल ले जाने का फैसला किया। हमने एम्बुलेंस मांगी तो उन्होंने पहले 6,000 जमा करने को कहा। जब मैं पैसे लेकर आया, तो उन्होंने इलाज के नाम पर 48,000 रुपये का और बिल थमा दिया और कहा कि जब तक बिल नहीं भरा जाएगा, मरीज को नहीं जाने देंगे। मैंने कर्ज लेकर बिल चुकाया। लेकिन मुझे नहीं पता कि जब उन्होंने मेरे बेटे का कोई बड़ा इलाज ही नहीं किया, तो 48 हजार रुपये किस बात के लिए गए? सुबह 3 बजे पहुंचे तुषार को सुबह 8 बजे डिस्चार्ज किया गया। इसके बाद उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।

अस्पतालों और पुलिस का पक्ष

अटलांटा अस्पताल के सीओओ डॉ. महेश चौधरी ने कहा कि पुलिस द्वारा लाए जाने के बाद प्राथमिक इलाज दिया गया था, लेकिन स्थिति नाजुक होने और वैस्कुलर सर्जन न होने के कारण बड़े अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई। यशोदा मेडिसिटी अस्पताल प्रशासन ने बयान जारी कर कहा कि मरीज के पहुंचते ही मेडिकल टीम ने प्राथमिकता के आधार पर जीवनरक्षक इलाज शुरू किया था। परिजनों को आगे के इलाज की सलाह दी गई थी और बिल में छूट भी दी गई थी। इंदिरापुरम एसीपी सूर्यबली मौर्य ने बताया कि अज्ञात वाहन चालक के खिलाफ BNS की धारा 106 (लापरवाही से मौत) और 281 (तेज गति से वाहन चलाना) के तहत मामला दर्ज कर जांच की जा रही है।

Nishant Tiwari
निशांत तिवारीauthor

निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृष्टि उन्हें इस बीट का एक भरोसेमंद और प्रभावी कंटेंट राइटर बनाती है। वे जटिल लोकल इश्यूज को सहज, स्पष्ट और असरदार अंदाज में पेश करने में दक्ष हैं और अबतक 2,000 से अधिक न्यूज रिपोर्ट लिख चुके हैं। उनकी लेखन शैली शहर की नब्ज पकड़ते हुए ऐसे कंटेंट पर केंद्रित रहती है, जो सीधे पाठकों के जीवन और उनकी रोजमर्रा की चिंताओं से जुड़ा होता है।

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