नई दिल्ली: तुर्कमान गेट हिंसा मामले में दिल्ली की सत्र अदालत ने अहम टिप्पणी करते हुए सभी 12 आरोपियों को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि उपलब्ध वीडियो फुटेज और रिकॉर्ड के आधार पर इस चरण पर आरोपियों की स्पष्ट और निर्विवाद पहचान स्थापित नहीं हो पाई है, इसलिए उनकी निरंतर हिरासत को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता।
कब का है मामला
यह मामला छह-सात जनवरी की दरमियानी रात रामलीला मैदान क्षेत्र में एक मस्जिद के पास अतिक्रमण-विरोधी अभियान के दौरान भड़की हिंसा से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर मस्जिद गिराए जाने की अफवाह फैलने के बाद इलाके में भीड़ जमा हो गई थी। पुलिस के अनुसार 150-200 लोगों की भीड़ ने पुलिस और एमसीडी कर्मचारियों पर पथराव किया और कांच की बोतलें फेंकीं,जिससे एक एसएचओ सहित छह पुलिसकर्मी घायल हो गए।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह ने इस आधार पर दी जमानत
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भूपिंदर सिंह ने कहा कि जमानत पर विचार करते समय साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण नहीं किया जाता, लेकिन यह देखना आवश्यक है कि आगे की हिरासत वाकई जरूरी है या नहीं। अदालत ने कहा कि सुनवाई के दौरान ऐसा कोई विशिष्ट फुटेज प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे प्रथम दृष्टया यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता पथराव में सक्रिय रूप से शामिल थे या कोई विशेष आपराधिक कृत्य कर रहे थे।
भरना होगा 50-50 हजार रुपये का मुचलके
अदालत ने मोहम्मद काशिफ, मोहम्मद कैफ, मोहम्मद उबैदुल्लाह, मोहम्मद इमरान, मोहम्मद अदनान, समीर हुसैन, मोहम्मद नावेद, मोहम्मद अतहर, मोहम्मद अरीब, आमिर हमजा, मोहम्मद आदिल और अदनान को 50-50 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत दी।
इन शर्तों का करना होगा पालन
जमानत की शर्तों में प्रत्येक सुनवाई पर अदालत में उपस्थित रहना, जांच में सहयोग करना, साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करना, गवाहों को प्रभावित न करना, मोबाइल फोन चालू रखना और लोकेशन सर्विस सक्रिय रखना तथा मामले से संबंधित सामग्री सोशल मीडिया पर साझा न करना शामिल है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 109(1) (हत्या का प्रयास) के तहत गंभीर सजा का प्रावधान है, लेकिन उपलब्ध चिकित्सीय रिपोर्ट के अनुसार पुलिसकर्मियों की चोटें गंभीर प्रकृति की नहीं थीं। केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर जमानत खारिज नहीं की जा सकती, क्योंकि मुकदमे से पूर्व की हिरासत सजा का विकल्प नहीं हो सकती।
न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हुए कहा कि आरोपों की गंभीरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे संवेदनशील अभियानों में उच्च गुणवत्ता वाले बॉडी-कैमरे और सीसीटीवी का उपयोग पारदर्शिता और सटीक पहचान सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता है।अदालत ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां केवल जमानत याचिका तक सीमित हैं और मुकदमे के अंतिम निर्णय पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
(भाषा का इनपुट)
