Robotic Surgery: कैंसर की जटिल सर्जरी से शुरू हुई रोबोटिक सर्जरी अब इलाज के कई क्षेत्रों में तेजी से अपनी जगह बना रही है। खासतौर पर प्रोस्टेट कैंसर जैसी सर्जरी में रोबोटिक तकनीक डॉक्टरों को शरीर के बेहद मुश्किल और संकरे हिस्सों तक ज्यादा सटीक तरीके से पहुंचने में मदद करती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, छोटे चीरे, कम ब्लड लॉस और तेजी से रिकवरी जैसे कारणों से मरीजों और डॉक्टरों के बीच इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। भारत में रोबोटिक सर्जरी का सफर 2005 में AIIMS दिल्ली से शुरू हुआ, जब देश का पहला रोबोटिक सिस्टम इंस्टॉल किया गया। डॉ. अनुप, एचओडी, यूरोलॉजी विभाग, सफदरजंग अस्पताल, के मुताबिक़ उस समय वे देश की पहली रोबोटिक टीम का हिस्सा थे। 2005 से 2026 तक करीब 21 वर्षों में भारत में रोबोटिक सिस्टम की संख्या बढ़कर लगभग 700 हो चुकी है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि 140 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले देश में अभी इस तकनीक को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है।
दिल्ली-NCR में 4 साल में करीब तीन गुना बढ़े रोबोटिक ऑपरेशन
SRS इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली-NCR के 39 अस्पतालों में रोबोटिक सर्जरी सिस्टम मौजूद हैं। इनमें 11 अस्पतालों में एक से ज्यादा रोबोटिक सिस्टम लगे हैं। NCR में 2022 में करीब 3,594 रोबोटिक प्रोसीजर हुए थे, जो 2023 में 5,024, 2024 में 7,595 और 2025 में बढ़कर 10,937 हो गए। यानी चार साल में इनकी संख्या करीब तीन गुना बढ़ी है। 2025 में करीब 33 फीसदी रोबोटिक प्रोसीजर जनरल सर्जरी, 30.2 फीसदी यूरोलॉजी और 22.1 फीसदी गायनेकोलॉजी से जुड़े थे। कैंसर सर्जरी में भी इसका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।
प्रोस्टेट कैंसर से हुई थी रोबोटिक सर्जरी की शुरुआत
विशेषज्ञ के मुताबिक, रोबोटिक सर्जरी की शुरुआत ही प्रोस्टेट कैंसर की सर्जरी को बेहतर तरीके से करने के उद्देश्य से हुई थी। प्रोस्टेट शरीर के पेल्विस के एक अपेक्षाकृत संकरे हिस्से में होता है, जहां ओपन या लैप्रोस्कोपिक सर्जरी में काम करना मुश्किल हो सकता है। रोबोटिक सिस्टम की मदद से सर्जन इस हिस्से तक बेहतर तरीके से पहुंचकर बारीकी से सर्जरी कर सकते हैं। इसके अलावा किडनी, ब्लैडर, टेस्टिकुलर और पेनाइल कैंसर के साथ-साथ गायनेकोलॉजिकल, GI और ENT से जुड़े कैंसर में भी रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल हो रहा है।
छोटे चीरे, कम ब्लड लॉस और तेजी से रिकवरी
रोबोटिक सर्जरी में आमतौर पर छोटे-छोटे चीरे लगाए जाते हैं। इससे कई मामलों में ब्लड लॉस और ऑपरेशन के बाद दर्द कम हो सकता है। कुछ सर्जरी में मरीज जल्दी चलना-फिरना शुरू कर सकता है और रिकवरी भी अपेक्षाकृत तेज हो सकती है। हालांकि, इसका फायदा बीमारी, सर्जरी और मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोबोट खुद ऑपरेशन नहीं करता। पूरी सर्जरी सर्जन नियंत्रित करता है और रोबोटिक सिस्टम उसके हाथों की गतिविधियों को बेहद सटीक तरीके से ऑपरेशन करने में मदद करता है।
क्या लैप्रोस्कोपिक सर्जरी खत्म हो जाएगी?
विशेषज्ञों का कहना है कि रोबोटिक सर्जरी बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि लैप्रोस्कोपिक सर्जरी खत्म हो जाएगी। लैप्रोस्कोपी और एंडोस्कोपी पहले ही कई ओपन सर्जरी की जगह ले चुके हैं, लेकिन आने वाले समय में दोनों तकनीकों का इस्तेमाल साथ-साथ होगा। खासकर ऐसे जटिल मामलों में, जहां लैप्रोस्कोपिक सर्जरी करना मुश्किल है, वहां रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ सकता है। यानी भविष्य में सर्जरी का फोकस किसी एक तकनीक को खत्म करने के बजाय मरीज और बीमारी के हिसाब से सही तकनीक चुनने पर रहेगा।
सबसे बड़ी चुनौती महंगी तकनीक और प्रशिक्षित डॉक्टर
रोबोटिक सर्जरी को बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराने में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी लागत और प्रशिक्षित मैनपावर शामिल हैं। एक रोबोटिक सिस्टम को स्थापित करने में बड़ी लागत आती है और इसके रखरखाव के लिए भी विशेष तकनीकी विशेषज्ञता चाहिए। इसके साथ ही रोबोटिक सर्जरी करने वाले प्रशिक्षित सर्जनों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में Standardized Robotic Surgery Fellowship और ज्यादा Training Opportunities शुरू करने की जरूरत है, ताकि देश में बड़ी संख्या में प्रशिक्षित सर्जन तैयार किए जा सकें।
2030 तक ग्लोबल लीडर बनने की तैयारी
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रोबोटिक सर्जरी की लागत कम होती है, अस्पतालों में इसकी उपलब्धता बढ़ती है और पर्याप्त प्रशिक्षित मैनपावर तैयार होती है, तो भारत इस क्षेत्र में बड़ा मेडिकल हब बन सकता है। इससे भारत में देश के मरीजों के साथ-साथ दूसरे देशों से आने वाले मरीजों को भी अपेक्षाकृत Cost-Effective Robotic Surgery उपलब्ध कराने की संभावना बढ़ेगी। रोबोटिक सर्जरी का अगला चरण सिर्फ मशीनों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि कम लागत, ज्यादा उपलब्धता और ज्यादा प्रशिक्षित सर्जनों के जरिए इस तकनीक को ज्यादा से ज्यादा मरीजों तक पहुंचाना होगा।
