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पटना : लालू यादव के इस बंगले पर विवाद, जांच कराने की तैयारी में सरकार; जानें क्या है माजरा

  • Reported by: Saket Kumar
  • Updated Jan 6, 2026, 10:46 PM IST

जेडीयू ने आरोप लगाया है कि लालू यादव ने नियमों का उल्लंघन कर सरकार की तरफ से विधायकों-सांसदों के लिए कोऑपरेटिव सोसाइटी को दी गई जमीन में से अपनी पार्टी के करीबी विधायकों/पार्षदों के नाम आवंटित जमीन को अपने नाम ट्रांसफर या खरीद लिया. जबकि नियम के अनुसार कोऑपरेटिव सोसाइटी में एक विधायक को सिर्फ एक ही प्लॉट मिलना था.

पटना : लालू यादव के इस बंगले पर विवाद, जांच कराने की तैयारी में सरकार; जानें क्या है माजरा

पटना : लालू यादव के इस बंगले पर विवाद, जांच कराने की तैयारी में सरकार; जानें क्या है माजरा

पटना : लालू यादव का पटना के कौटिल्य नगर वाला बंगला विवादों में आ गया है। जेडीयू ने आरोप लगाया है कि लालू यादव ने नियमों का उल्लंघन कर सरकार की तरफ से विधायकों-सांसदों के लिए कोऑपरेटिव सोसाइटी को दी गई जमीन में से अपनी पार्टी के करीबी विधायकों/पार्षदों के नाम आवंटित जमीन को अपने नाम ट्रांसफर या खरीद लिया, जबकि नियम के अनुसार कोऑपरेटिव सोसाइटी में एक विधायक को सिर्फ एक ही प्लॉट मिलना था, लेकिन लालू यादव ने अपने आसपास के पांच प्लॉट को लेकर अपने प्लॉट से मिला लिया और अभी इसी जमीन पर लालू का बंगला बन रहा है।

जेडीयू के अलावा एक सामाजिक कार्यकर्ता विकास चंद्र उर्फ़ गुड्डू बाबा ने भी इस मामले की जांच की मांग डिप्टी सीएम और मुख्य सचिव को पत्र लिखकर की है. गुड्डू बाबा ने ही 2016 में जनप्रतिनिधियों को हुए जमीन आवंटन पर कोर्ट में याचिका दाखिल कर सवाल उठाया था जिसकी सुनवाई अभी जारी है। लालू-राबड़ी की इस जमीन पर पूर्व डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने अपनी किताब लालू लीला में भी विस्तार से लिखा है. इस किताब में भी सुशील मोदी (जिनकी कल जयंती मनाई गयी) उन्होने जांच पड़ताल के बाद ये लिखा था कि लालू यादव को एक प्लॉट अलॉट हुआ था और चार मंत्री-विधायकों को आवंटित जमीन भी काफी कम क़ीमत पर लालू यादव ने अपने नाम लिखवा लिया।

दरअसल 1987 में बिहार सांसद एवं विधान मंडलीय सदस्य सहकारी समिति को 15 एकड़ सरकारी जमीन दी गई थी। यह जमीन वेटनरी कॉलेज की थी। तब इस को-ऑपरेटिव को जमीन देने का उद्देश्य यह था कि जिन पूर्व या वर्तमान विधायकों, सांसदों या पार्षदों का निजी आवास पटना में नहीं है, उन्हें जमीन उपलब्ध कराया जाए। अलॉटमेंट को लेकर कुछ कड़े नियम भी बनाए गए, ताकि विधायक सांसद कोई गड़बड़ी न कर सकें।

यह जमीन 30 साल की लीज पर दी गई थी। इसका लीज 31 दिसंबर 2017 को ही खत्म हो गया था। लेकिन पिछले साल 2025 में चुनाव से ठीक पहले इसका रिन्युअल कर दिया गया। लालू प्रसाद को 1992 में जमीन अलॉट हुआ ज़ब वे मुख्यमंत्री थे। लालू प्रसाद के करीबी नेता जयप्रकाश नारायण यादव इस को-ऑपरेटिव के चेयरमैन थे। सहकारी समिति के बायलॉज की कंडिका 45 (2) में स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी सदस्य को एक से अधिक प्लॉट लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी। साथ ही सहकारी समिति को एक से अधिक प्लॉट किसी को आवंटित या स्थानांतरित करने का अधिकार भी नहीं है।

जेडीयू ने आरोप लगाया है कि-

प्लाट-1: लालू प्रसाद को 1992 में प्लाट संख्या 208 आवंटित किया गया था। बादशाह प्रसाद आजाद को दूसरी बार MLC बनाने के एवज में 29 जनवरी 2010 को लालू प्रसाद ने आजाद से एक और प्लॉट संख्या 207 अपने नाम लिखवा लिया।

प्लाट-2: राबड़ी देवी जब मुख्यमंत्री थीं, तब पूर्व मंत्री सुधा श्रीवास्तव से 7 नवंबर 2002 को 2,422 वर्ग फीट का प्लॉट नंबर 151 बाउंड्री वॉल और बोरिंग सहित लाखों की जमीन महज 72 हजार रुपए में अपने नाम लिखवा ली।

प्लाट-3:

1 सितंबर, 2003 को मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए राबड़ी देवी ने तब मंत्री पद पर रहे अब्दुल बारी सिद्दीकी को प्लॉट नंबर 151 देकर उनसे अपने प्लॉट के पास स्थित प्लॉट नंबर 209 महज 37 हजार रुपए में लिखवा लिया।

प्लाट - 4:

सहकारी समिति ने RJD के तत्कालीन कोषाध्यक्ष और सांसद प्रेमचंद गुप्ता को प्लॉट संख्या -211 के आवंटन की स्वीकृति 8 अप्रैल, 2006 को दी। जबकि, इससे पूर्व ही डीड निबंधित कर दिया गया और उन्होंने उस पर निर्माण कार्य भी करवा लिया।

प्लाट-5:

राबड़ी देवी के प्लॉट के बगल का प्लॉट संख्या 210 सामुदायिक भवन के लिए चिह्नित था, लेकिन अपनी सुविधा को देखते हुए उसे साधु यादव को आवंटित कर दिया गया ताकि लालू यादव इस्तेमाल कर सकें।

लालू जब रेल मंत्री थे उस समय आवास एसएसबी के जोनल ऑफिस को दिया गया था. सुशील मोदी ने अपनी किताब में कहा है कि यह लीज की शर्तों का उल्लंघन है। शर्त थी कि व्यवसायिक इस्तेमाल नहीं करना है. लालू प्रसाद जब केन्द्र में रेल मंत्री थे, तब उनके प्लॉट नंबर -208 में गृह मंत्रालय के सशस्त्र सीमा बल यानी एसएसबी का जोनल पे एंड एकाउंट ऑफिस खुला था। लम्बे समय तक यह यहां चलता रहा।

कोआपरेटिव कमिटी के चेयरमैन रहे जयप्रकाश नारायण यादव को पहले से प्लॉट संख्या 222 था फिर अवैध रूप से प्लॉट संख्या 223 ट्रांसफर किया गया।

जेडीयू ने सवाल उठाया है कि

1. जब सैकड़ों सदस्य प्रतीक्षा सूची में थे, तब इन नेताओं को दूसरा प्लॉट किस नियम के तहत दिया गया?

2. कुछ प्लॉट 2006 तक खाली क्यों रखा गया जबकि प्रतीक्षा सूची लंबी थी ?

3. आवंटन से पहले रजिस्ट्री किस नियम के तहत हुई ?

4. प्लॉट आवंटन के मापदंड क्या थे ?

5. सामुदायिक भवन की जमीन भी कैसे साधु यादव को सौंप दी गई

6. 1992 में ₹37,000 कीमत वाला प्लॉट 20 वर्ष बाद भी उसी कीमत पर ट्रांसफर क्यों किया गया जबकि बाजार मूल्य लाखों में था। यह स्पष्ट संकेत है कि रजिस्ट्री में कम मूल्य और अघोषित (काले) धन का लेन-देन हुआ।

7. आवासीय भवनों का व्यावसायिक उपयोग किया गया जबकि सरकार ने जमीन केवल आवासीय उपयोग हेतु दी थी

सहकारिता मंत्री प्रमोद चंद्रवंशी ने इस पूरे मामले की जांच की बात कही है। उन्होंने कहा कि लालू यादव के लिए यह सब कोई नई बात नहीं है। जब भी किसी संवैधानिक पद पर वे रहे हैं उन्होंने अपने पद का भरपूर दुरुपयोग किया है. कोऑपरेटिव कमेटी के बायलॉज का उल्लंघन किस तरह से किया गया है इस पूरे मामले की जांच की जाएगी। नियम के अनुसार एक विधायक को एक ही प्लॉट मिलना था।

विधायकों को जमीन आवंटन से जुडा एक मामला पटना हाईकोर्ट में भी लंबित है। एक सामाजिक कार्यकर्ता विकास चंद्र उर्फ गुड्डू बाबा ने 2016 में एक जनहित याचिका दायर की थी जिसमें विधायकों को आवंटित पूरी जमीन पर ही सवाल उठाया गया कि पब्लिक लैंड को इस तरह से विधायकों को क्यों बांटा गया, गुड्डू बाबा ने लालू मामले को लेकर चर्चा में आये इस मामले को लेकर डिप्टी CM और मुख्य सचिव को पत्र भी लिखा है।

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