Kolar Gold Fields History: हजारों सालों से भारतीय सरजमीन को सोने की चिड़िया इसलिए कहा जाता था क्योंकि उस दौर में भारत सोना, रत्न, मसाले और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से अत्यंत समृद्ध था। वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी इतनी अधिक थी कि उसकी GDP ब्रिटेन, जापान और अमेरिका जैसे देशों से भी कहीं ऊपर मानी जाती थी। यही समृद्धि कई विदेशी आक्रमणों का मुख्य कारण बनी। महमूद गजनवी और नादिर शाह जैसे आक्रमणकारियों ने बार-बार भारत पर हमले किए और इसकी अपार संपत्ति को लूटा। बाद में अंग्रेजों के शासन काल में भी भारत की आर्थिक रीढ़ को कमजोर किया गया।
वर्षों की मेहनत से अर्जित धन-संपत्ति विदेशी तिजोरियों में चली गई। हालांकि, भारत की भूमि आज भी अपनी कोख में ऐतिहासिक खजाने समेटे हुए है। ऐसा ही एक नाम है कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) का है, जो कि कर्नाटक के कोलार शहर में स्थित है। यह क्षेत्र भारत की सबसे पुरानी और सबसे गहरी सोने की खदानों में से एक माना जाता है। KGF की चर्चा सबसे अधिक उस समय में हुई जब 2018 में कन्नड़ भाषा की ब्लॉकबस्टर फिल्म “केजीएफ” रिलीज हुई। हालांकि फिल्म ने इस जगह को फिक्शनल रूप में दर्शाया लेकिन असलियत में यह जगह वर्षों से भारत के स्वर्ण इतिहास का प्रतीक रही। तो अगर आप भी इस शहर को केवल एक फिल्मी कल्पना मानते हैं तो जान लीजिए केजीएफ एक हकीकत है, जहां से देश को वर्षों तक बड़ी मात्रा में सोना प्राप्त होता रहा है। आइए, आगे जानते हैं कोलार गोल्ड फील्ड्स से जुड़ी कुछ रोचक और ऐतिहासिक जानकारियां।

कोलार गोल्ड फील्ड्स का इतिहास (फोटो: Canva)
केजीएफ (कोलार गोल्ड फील्ड्स) का सुनहरा इतिहास
केजीएफ, यानी कोलार गोल्ड फील्ड्स, दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित है। यह खदान रोबर्ट्सनपेट तहसील में है, जो कोलार जिले के मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर और बेंगलुरु से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर बैंगलोर-चेन्नई एक्सप्रेसवे पर स्थित केजीएफ टाउनशिप में आती है। अगर इसके इतिहास की बात करें तो BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रिटिश काल में केजीएफ की खोज एक दिलचस्प घटनाक्रम के तहत हुई। वर्ष 1871 में न्यूज़ीलैंड से भारत आए ब्रिटिश सैनिक माइकल फिट्ज़गेराल्ड लेवेली ने बेंगलुरु को अपना निवास स्थान बनाया। अध्ययन में रुचि रखने वाले लेवेली को एक पुराना लेख मिला, जो 1804 में ‘एशियाटिक जर्नल’ में प्रकाशित हुआ था और कोलार में सोने की उपस्थिति का उल्लेख करता था। इस लेख ने उनकी रुचि और भी बढ़ा दी। आगे पढ़ते-पढ़ते उन्हें ब्रिटिश सरकार के लेफ्टिनेंट जॉन वॉरेन द्वारा लिखित एक दस्तावेज मिला, जिसमें श्रीरंगपट्टनम की 1799 की लड़ाई के बाद अंग्रेजों द्वारा कोलार क्षेत्र पर कब्जा और फिर इसे मैसूर राज्य को सौंपने का जिक्र था। हालांकि अंग्रेजों ने खनिज सर्वेक्षण का अधिकार अपने पास रखा था।

कोलार शहर की सोने की खान की हकीकत (फोटो: Canva)
चोल साम्राज्य के अधीन था KGF
कोलार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भी समृद्ध है। इतिहासकारों के अनुसार, 1004 ईस्वी में यह क्षेत्र चोल साम्राज्य के अधीन आया और इसे 'निकारिलिचोला-मंडला' के नाम से जाना गया। बाद में यह होयसल साम्राज्य का हिस्सा बन गया। चोलों ने 9वीं से लेकर 13वीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में अपनी गहरी छाप छोड़ी, खासकर राजराजा चोल और राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में। उनकी राजधानी तंजावुर थी, जो उस समय सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र था। ब्रिटिश शासन के दौरान 1880 के दशक में कोलार में सोने की खुदाई शुरू हुई। कई दशकों तक यह खदान सोना उगलती रही। परंतु जैसे-जैसे समय बीता, खनन की लागत बढ़ती गई और उत्पादन में गिरावट आने लगी।

इस तरह बंद हुआ केजीएफ (फोटो: Canva)
2001 में बंद हो गया केजीएफ
केजीएफ को कभी एशिया की सबसे बड़ी और सबसे गहरी सोने की खदान माना जाता था। बताया जाता है कि यह खदान लगभग 3 किलोमीटर गहराई तक जाती थी। ब्रिटिश काल में यहां अंग्रेज अफसरों के लिए एक कॉलोनी बसाई गई थी, जिसे अंग्रेजी जीवनशैली के आधार पर डिजाइन किया गया था। इसी वजह से केजीएफ को 'लिटिल इंग्लैंड' भी कहा जाता था। साल 2001 में सरकार ने खदान को पूरी तरह बंद कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 120 वर्षों तक चले खनन कार्य में यहां से 800 से 900 टन सोना निकाला गया जो भारत की सोने की खपत के लिहाज़ से एक बेहद बड़ा आंकड़ा है। लेकिन समय-समय पर इसे फिर से शुरू करने की चर्चाएं होती रहीं। अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। फिर भी, केजीएफ का नाम आज भी भारतीय इतिहास में एक सुनहरे अध्याय के रूप में दर्ज है।
