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आखिर कहां से कहां तक चली थी देश की पहली पैसेंजर ट्रेन, जानें कब हुआ था इसका शुभारंभ और कितना था किराया?

भारत में पहली पैसेंजर ट्रेन की शुरुआत ने देश में एक नए युग की नींव रखी थी। यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि तकनीकी प्रगति की दिशा में बड़ा कदम था। रेल के पहिए जब पहली बार दौड़े तो वह दिन इतिहास में दर्ज हो गया। उस समय का किराया और यात्रा से जुड़ी बातें आज भी लोगों को आकर्षित करती हैं। ऐसे में जानिए भारत की पहली पैसेंजर ट्रेन से जुड़ी जानकारी यहां।

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पहली भारतीय पैसेंजर ट्रेन का इतिहास (फोटो: Canva)

First Indian Passenger Train: भारत में पहली पैसेंजर ट्रेन की शुरुआत ने न केवल परिवहन के क्षेत्र में बल्कि देश के विकास की गति में भी एक नया मोड़ ला दिया। यह महज एक यात्रा नहीं थी, बल्कि तकनीकी उन्नति और आधुनिकता की ओर भारत का पहला ठोस कदम था। जब पहली बार रेल पटरी पर चली, तो उस दिन का महत्व इतना बड़ा था कि इसे इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया गया।

उस समय यात्रा का अनुभव, ट्रेन का किराया और उस सफर में लोगों के उत्साह ने समाज में नई ऊर्जा का संचार किया। ट्रेन के संपर्क में आने वाले शहरों और गांवों की तस्वीरें बदल गईं और व्यापार, संचार और सामाजिक संपर्क के नए अवसर सामने आए। आज भी उस ऐतिहासिक सफर की यादें लोगों को रोमांचित करती हैं और भारतीय रेलवे की गौरवशाली विरासत का प्रतीक बनी हुई हैं। आइए, जानते हैं भारत की पहली पैसेंजर ट्रेन से जुड़े ऐसे रोचक तथ्य और कहानियां, जो उस समय की तकनीकी, सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों की झलक पेश करती हैं।

India First Passenger Train Starting (Photo: Canva)

भारत में पहली यात्री ट्रेन की शुरूआत (फोटो: Canva)

कब हुई थी पहली रेलवे यात्रा की शुरुआत?

भारत में रेलवे यात्रा की शुरुआत 16 अप्रैल 1853 को हुई थी, जब पहली पैसेंजर ट्रेन ने बोरी बंदर स्टेशन (जिसे अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के नाम से जाना जाता है) से ठाणे के लिए अपनी ऐतिहासिक यात्रा शुरू की। यह ट्रेन करीब 34 किलोमीटर की दूरी तय कर ठाणे पहुंची थी। यह सफर केवल दूरी नापने भर का नहीं था, बल्कि एक ऐसे युग का आरंभ था, जिसने देश में परिवहन व्यवस्था की तस्वीर ही बदल दी। तीन भाप इंजनों द्वारा खींची गई इस ट्रेन में 13 डिब्बे थे और करीब 400 यात्रियों ने इसमें सफर किया था। इस ऐतिहासिक घटना की याद में हर साल 16 अप्रैल को भारत में "रेल परिवहन दिवस" मनाया जाता है, जो भारतीय रेलवे की गौरवशाली विरासत और उसके तकनीकी विकास का प्रतीक बन चुका है।

The first proposal to run a railway in India was in 1832 (Photo: Canva)

1832 में पहली बार भारत में रेलवे चलाने का प्रस्ताव (फोटो: Canva)

भारतीय रेलवे में किसकी थी अहम भूमिका?

भारत में रेलवे व्यवस्था की नींव 1830 के दशक की शुरुआत में पड़ी थी, जिसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य के लिए कच्चे माल और वस्तुओं के परिवहन को आसान बनाना था। 1832 में पहली बार भारत में रेलवे चलाने का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन इस योजना को वास्तविक आकार 1845 में मिला, जब ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे और ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी का गठन हुआ। इसके बाद नवंबर 1852 में रेलवे का पहला परीक्षण रन सफल रहा, और अंततः अप्रैल 1853 में देश में पहली आधिकारिक ट्रेन सेवा शुरू की गई। इस पूरे प्रयास में तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जबकि भारतीय व्यापारी सर जमशेदजी जीजीभॉय और नाना शंकरशेठ ने भी योजना के क्रियान्वयन में सक्रिय सहयोग प्रदान किया। इस रेलवे लाइन के निर्माण में लगभग 10,000 मजदूरों ने कड़ी मेहनत की और इसके लिए लगभग £10,000 का खर्च आया।

आखिर कैसी थी पहली रेल यात्रा?

भारतीय रेल की पहली यात्रा अपने समय की एक ऐतिहासिक घटना थी। यह ट्रेन तीन भाप इंजनों- साहिब, सिंध और सुल्तान द्वारा खींची गई थी और इसमें 13 डिब्बे जुड़े थे, जिनमें लगभग 400 यात्री सवार थे। इस अवसर को यादगार बनाने के लिए उस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया और ट्रेन के रवाना होने पर 21 तोपों की सलामी दी गई। दोपहर 3:30 बजे बोरी बंदर स्टेशन से चलकर यह ट्रेन केवल 55 मिनट में 34 किलोमीटर की दूरी तय कर ठाणे पहुंच गई। मार्ग में सायन स्टेशन पर इंजन को पानी और तेल देने के लिए थोड़ी देर रुकना पड़ा। औसतन 30–35 मील प्रति घंटे की रफ्तार से चली यह ऐतिहासिक ट्रेन उसी दिन शाम को वापस मुंबई लौट गई, जिसने भारतीय रेलवे के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

Bori Bunder Station, now called Chhatrapati Shivaji Maharaj Terminus (Photo: Canva)

बोरी बंदर स्टेशन, जो अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस कहलाता है (फोटो: Canva)

कितना था उस जमाने में रेलवे का किराया?

भारत की पहली ट्रेन के लिए 1853 में निर्धारित रेलवे किराया उस समय के हिसाब से इस तरह था जहां प्रथम श्रेणी (1st Class) का किराया ₹2 और 10 आने, द्वितीय श्रेणी (2nd Class) का किराया ₹1 और 1 आना और तृतीय श्रेणी (3rd Class) का किराया 5 आने 3 पैसे था, जो लगभग 3 पाई प्रति मील के बराबर था। उस समय यह यात्रा केवल मुंबई से ठाणे तक ही सीमित थी, लेकिन यह छोटा सा सफर भारतीय रेलवे की शुरुआत के रूप में बेहद महत्वपूर्ण था। भारतीय रेलवे आज दुनिया के चौथे सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क के रूप में जाना जाता है, जिसका कुल ट्रैक 1,35,207 किलोमीटर तक फैला हुआ है (2024 तक)। यह भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अंतर्गत संचालित होता है और 18 जोन तथा 70 डिवीजनों में विभाजित है। भारतीय रेलवे न केवल यातायात की सुविधा प्रदान करता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है; वित्तीय वर्ष 2024 में इसका राजस्व 2.40 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया। रेलवे लगातार अपने बुनियादी ढांचे का विस्तार कर रहा है, नई ट्रैक लाइनें बिछा रहा है और यात्री एवं माल ढुलाई दोनों क्षेत्रों में निरंतर वृद्धि दर्ज कर रहा है।

Nilesh DwivedI
निलेश द्विवेदीauthor

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अपडेट्स पर लगातार काम करते हैं। निलेश महत्वपूर्ण विवरणों को चुनने और पाठकों की रुचि के हिसाब से कंटेंट को प्रभावी तरीके से पेश करने के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल न्यूजरूम के रफ्तार भरे माहौल में वे हर खबर को सटीक एंगल, आसान भाषा और उपयोगी जानकारी के साथ पेश करने पर फोकस करते हैं और अबतक 2,000 से अधिक खबरें लिख चुके हैं।

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