रामलीला मैदान दिल्ली का वो ऐतिहासिक स्थल है जो ना केवल सांस्कृतिक परंपराओं का साक्षी रहा है, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक दौर तक जनआंदोलनों का केंद्र भी बना रहा है। रामायण की रामलीला से लेकर बड़े राजनीतिक और सामाजिक जमावड़ों तक, इस मैदान ने बीते सौ वर्षों में शहर की पहचान को आकार दिया है। ऐसे में आइए जानें इसके सफर को बेहद करीब से।
1930 से पहले यह क्षेत्र पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के बीच एक बड़ा तालाब था। इसे 1930 के दशक की शुरुआत में भर दिया गया ताकि वार्षिक रामलीला कार्यक्रमों को यमुना नदी और लाल किले के पास बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से यहां स्थानांतरित किया जा सके।
इसका नाम “रामलीला मैदान” इसलिए पड़ा क्योंकि यह रामलीला महोत्सव का मुख्य स्थल बन गया, जिसमें रामायण का नाट्य रूप में वार्षिक मंचन दशहरा से पहले नौ दिनों तक किया जाता है। इस स्थल पर उत्सवों का इतिहास 19वीं सदी तक जाता है और मुगल शासक बहादुर शाह जफर के शासनकाल में भी इसे समर्थन मिला था।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और दिल्ली गेट के नजदीक स्थित यह मैदान लगभग एक शताब्दी से सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, मनोरंजन और राजनीतिक कार्यक्रमों की मेजबानी करता रहा है।
स्वतंत्रता पूर्व काल में यह मैदान राजधानी का एक प्रमुख सार्वजनिक मंच बन गया था। यहां महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने बड़े राष्ट्रीयतावादी जमावड़ों को संबोधित किया। 1940 के दशक में मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्नाह ने भी यहां रैली की थी और भीड़ से संबोधित होते समय उन्होंने धार्मिक उपाधियों के बजाय अपनी राजनीतिक पहचान को महत्व दिया।
1963 में, भारत-चीन युद्ध के बाद प्रधानमंत्री नेहरू की मौजूदगी में यहां देशभक्ति गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों” गाया गया, जिसने भीड़ को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया। 1965 में, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मैदान से प्रसिद्ध नारा “जय जवान जय किसान” दिया। अंतरराष्ट्रीय आगमन का मंच: 1961 में नेहरू ने क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय का स्वागत करने के लिए यहां एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया।
25 जून 1975 को समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने 1,00,000 से अधिक लोगों की भीड़ को संबोधित किया और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से इस्तीफा देने की मांग की तथा सरकार की सत्ता को चुनौती दी। इस रैली में मोरारजी देसाई और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे विपक्षी नेता भी शामिल थे। यह कार्यक्रम आपातकाल की घोषणा से कुछ ही घंटे पहले आयोजित किया गया था और आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास में इसे एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
आपातकाल (1975–77) के दौरान यह मैदान प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। फरवरी 1977 में, आपातकाल के प्रतिबंधों के बावजूद विपक्षी दलों ने यहां एक विशाल रैली का आयोजन किया, जिसने शासक शासन के कमजोर होने और भारत की लोकतांत्रिक भावना की ताकत को प्रदर्शित किया।
रामलीला मैदान भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत आंदोलन का केंद्र बना, जिसे कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने नेतृत्व किया। उन्होंने यहां 12 दिन का उपवास किया और कड़े भ्रष्टाचार विरोधी कानून (जन लोकपाल बिल) की मांग की। इस आंदोलन ने पूरे देश में नागरिक समाज को सक्रिय किया। जून 2011 में योग गुरु बाबा रामदेव ने अपने भ्रष्टाचार विरोधी सत्याग्रह के दौरान यहां बड़ी भीड़ जुटाई; पुलिस की कार्रवाई के कारण विरोध प्रदर्शन में भगदड़ मची और इसमें एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई।
रामलीला मैदान आज भी समकालीन राजनीति में बड़े जनसमूहों और विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। 2024–2025 के दौरान राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने यहां कई रैलियां कीं, जिनमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की वे विशाल सभाएं भी शामिल थीं, जहां राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारी और “मतदान से जुड़ी चिंताओं” जैसे मुद्दों को उठाया गया। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी शपथ ग्रहण के समय इसी मैदान को मंच बनाया था। जब किसी कार्यक्रम में भारी भीड़ के आने की संभावना होती है और जंतर-मंतर की क्षमता कम पड़ती है, तब अक्सर रामलीला मैदान को ही चुना जाता है।
यह स्थल दिल्ली की सबसे पुरानी उत्सवी परंपराओं में से एक रामलीला के माध्यम से रामायण के नाटकीय प्रस्तुतीकरण को आज भी संजोए हुए है। स्वतंत्रता संग्राम की जन-सभा से लेकर आजादी के बाद नीति सुधार और नागरिक अधिकारों से जुड़े आंदोलनों तक, यह मैदान राजधानी का खुला सार्वजनिक मंच बना रहा। बीते कई दशकों में यह जगह एक ऐसे प्रतीक के रूप में उभरी है जो जनसमूह के एकत्र होने और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने के लोकतांत्रिक अधिकार को दर्शाती है चाहे वह आपातकाल-विरोधी आंदोलन हों, भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष हों या आधुनिक राजनीतिक।