दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर (DDEC) का कल यानी मंगलवार 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने उद्घाटन कर दिया। अब दिल्ली से देहरादून तक फर्राटा मारते हुए 210 किमी की दूरी को आप मात्र ढाई घंटे में तय कर सकते हैं। इस इकोनॉमिक कॉरिडोर को Delhi Dehradun Expressway भी कहा जाता है। इस एक्सप्रेसवे के खुलने का इंतजार लोगों को लंबे समय से बड़ी ही बेसब्री से था। आखिर आज जब ये एक्सप्रेसवे खुल गया है तो एक बार उस घर की भी बात कर लेते हैं, जिसके चलते एक्सप्रेसवे लंबे समय तक उद्घाटन के लिए इंतजार करता रहा। चलिए जानते हैं -
कहां है दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे को रोकने वाला घर
Delhi Dehradun Economic Corridor की रफ्तार को जिस एक घर ने ब्रेक लगाकर रखा हुआ था, वह गाजियाबाद जिले में लोनी के पास मंडोला गांव में है। इस एक घर के कारण दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट काफी लेट हुआ। जिस जमीन पर यह घर है उसके लिए लंबी कानूनी लड़ाई चली है। स्थानीय तौर पर इस घर को 'स्वाभिमान' घर कहा जाने लगा है और इसको लेकर विवाद आज का नहीं बल्कि लगभग तीन दशक से चला आ रहा है।
घर के कारण एक्सप्रेसवे का एग्जिट रुक गया
मंडोला के इस घर में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के बहुत ही महत्वपूर्ण एग्जिट रैंप का निर्माण रोक दिया। यह घर अब भी अपनी जगह पर खड़ा है। अब एक्सप्रेसवे का उद्घाटन भी हो चुका है। इस घर की वजह से एक्सप्रेसवे के रैंप के जरिए गुजरने वाली गाड़ियों को दिक्कत हो सकती है। NHAI ने इस घर के पीछे आवास विकास की रोड को डेवलप किया है।
किसका है यह घर और क्या है विवाद?
अब आपके जेहन में भी प्रश्न होगा कि दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की रफ्तार रोकने वाला यह घर किसका है? तो बता दें कि यह घर स्वर्गीय वीरसेन सरोहा के परिवार का है। पिछले 28 वर्षों से यह परिवार कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। विवाद साल 1998 में शुरू हुआ था और तब से ही मामला कोर्ट में लटका पड़ा है। NHAI को दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के एग्जिट रैंप को पूरा करने के लिए 1600 स्क्वायर मीटर की जरूरत है। लेकिन इस भूमि विवाद के चलते उसे यह जमीन नहीं मिली। घर की बिल्डिंग करीब 1000 स्क्वायर मीटर में बनी है और 600 स्क्वायर मीटर जमीन अतिरिक्त पड़ी है।
आज के मुताबिक मुआवजे की डिमांड
दरअसल साल 1998 में उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने मंडोला हाउसिंग स्कीम के लिए 6 गांवों की करीब 2614 एकड़ जमीन के अधिग्रहण का नोटिस भेजा था। उस समय सरकार ने 1000 रुपये प्रति स्क्वायर मीटर का मुआवजा तय किया। उस समय ज्यादातर किसान तैयार हो गए, लेकिन वीरसेन सरोहा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। कोर्ट ने उनके घर के अधिग्रहण पर रोक लगा दी। इस बीच दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की योजना बनी। आवास विकास परिषद ने यह विवादित जमीन NHAI को दे दी। जब एक्सप्रेसवे का काम अपने अंतिम चरण में पहुंचा, तब पता चला कि यह घर ठीक उस जगह पर मौजूद है, जहां एग्जिट रैंप का निर्माण होना है। अब परिवार की मांग है कि उन्हें वर्तमान रेट के हिसाब से मुआवजा दिया जाए, तभी वह अपनी जमीन देंगे।
इस विवाद के चलते भले ही दिल्ली से देहरादून तक पूरा इकोनॉमिक कॉरिडोर आम जनता के लिए खुल गया हो। लेकिन यह छोटा सा हिस्सा आज भी नहीं बन पाया है। एग्जिट रैंप के रास्ते में यह घर जस का तस खड़ा है।
