दिल्ली का इतिहास काफी पुराना है। द्वापर युग में पांडवों से लेकर चौहान, तोमर, गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, मुगल वंश और अंग्रेजों तक ने दिल्ली और आसपास के इलाकों पर राज किया। हर राजवंश ने अपने-अपने दौर में दिल्ली-एनसीआर में निर्माण कार्य करवाया। आज भी उनके निर्माण के कई अवशेष शान से खड़े हैं। हालांकि, कुछ अब बेहद खराब स्थिति में हैं। आम लोग ही नहीं, सरकार का भी ध्यान उन विरासतों को बचाने की ओर नहीं है। ऐसा ही एक निर्माण 1100 साल पुराना बांध है। जो दिल्ली और आसपास के इलाकों में जल संरक्षण की पुरानी विरासत को दर्शाता है, लेकिन आम लोगों और सरकार की उदासीनता के चलते खराब स्थिति में है। दिल्ली के बीच से यमुना नदी बहती है, जिसमें लगभग हर साल मानसून के मौसम में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। लेकिन जिस बांध की हम बात कर रहे हैं वह यमुना नदी पर नहीं है। चलिए जानते हैं यह बांध कहां है? इसका निर्माण कार्य किस राजा ने और क्यों करवाया?
कहां है दिल्ली का सबसे पुराना बांध और उसका नाम क्या है?
दिल्ली के दक्षिणी छोर पर हरियाणा में अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित मौजूद 1100 साल पुराना 'अनंगपुर बांध' (Anangpur Dam) आज भी इतिहास और इंजीनियरिंग का अनोखा उदाहरण बनकर खड़ा है। यह प्राचीन जल संरचना सिर्फ एक बांध नहीं, बल्कि दिल्ली के शुरुआती मध्यकालीन इतिहास की जीती-जागती विरासत है, जिसे तोमर वंश के शासकों ने 10वीं शताब्दी में बनवाया था।
किसने करवाया दिल्ली के सबसे पुराने बांध का निर्माण?
इस बांध को अरावली की कठोर और पथरीली जमीन के बीच इस तरह बनाया गया है कि बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से इसमें इकट्ठा हो सके। माना जाता है कि इसका निर्माण तोमर वंश के शासक 'अनंगपाल तोमर द्वितीय' ने करवाया था, जिनका नाम दिल्ली के शुरुआती इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। बता दें कि तोमर वंश ने करीब चार शताब्दियों तक इस पूरे क्षेत्र पर शासन किया और दिल्ली को एक मजबूत रणनीतिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
कितना लंबा और ऊंचा है दिल्ली का सबसे पुराना बांध?
करीब 101 मीटर लंबा और 10 मीटर से ज्यादा ऊंचा यह बांध बड़े पत्थरों से बना है। इसकी बनावट ऐसी है कि यह सिर्फ पानी रोकने का काम नहीं करता, बल्कि नियंत्रित तरीके से जल प्रवाह को आगे बढ़ाता है। बांध में बने कई आउटलेट और स्लिट चैनल इस बात का प्रमाण हैं कि उस समय जल प्रबंधन की उन्नत तकनीक मौजूद थी। माना जाता है कि यह बांध पास में मौजूद 'सूरजकुंड झील' से भी जुड़ा है।
मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है यह क्षेत्र
इतिहासकारों के अनुसार, अनंगपुर क्षेत्र में 6वीं शताब्दी से ही मानव बसावट के संकेत मिलते हैं। यहां से मिले पुरातात्विक अवशेषों के अनुसार यह इलाका हजारों वर्षों से मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है। अरावली पर्वतमाला, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है, इस क्षेत्र को प्राकृतिक सुरक्षा और जल संरक्षण का आधार देती रही है।
आज किस स्थिति में है दिल्ली का सबसे पुराना बांध?
हालांकि, आज इस ऐतिहासिक धरोहर की स्थिति बेहद चिंताजनक है। इस स्थल पर लगा 'भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण' (ASI) का सूचना बोर्ड भी क्षतिग्रस्त स्थिति में है। ASI के बोर्ड पर से इतिहास से जुड़ी कई जानकारियां मिटा दी गई हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह जानबूझकर किया गया है। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि न तो सरकारों का ध्यान इस तरफ है और न ही जनता अपनी पुरातात्विक धरोहरों को लेकर सचेत है।

आज हरियाणा में सूरजकुंड के पास है यह बांध
अवैध निर्माण से खतरे में पुरातात्विक विरासत
बांध के आसपास अतिक्रमण और अवैध निर्माण का खतरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है। यहां से अक्सर अतिक्रमण की खबरें आती रहती हैं। अरावली का यह क्षेत्र संवेदनशील क्षेत्रों में आता है, लेकिन अवैध निर्माण पूरे अरावली क्षेत्र में तेजी से बढ़ा है। बावजूद इसके कि सुप्रीम कोर्ट ने कई बार संज्ञान लेकर यहां से अवैध निर्माण को ढहाए जाने के निर्देश दिए हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक कुछ दशक पहले तक इस बांध में भी साल भर पानी रहता था और आसपास का इलाका वन्यजीवों से समृद्ध था। लेकिन आज हालात ऐसे हो गए हैं कि जल स्रोत सूखते जा रहे हैं और क्षेत्र का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है।
1400 साल पुराना गांव भी ऐतिहासिक धरोहर
इस बांध के पास ही मौजूद अनंगपुर गांव भी एक ऐतिहासिक बसावट माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह गांव करीब 1400 साल से भी ज्यादा पुराना है। विशेषज्ञों के अनुसार अनंगपुर बांध जैसे प्राचीन जल प्रबंधन सिस्टम आज के जल संकट के दौर में बेहद प्रासंगिक हैं। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं, बल्कि एक ऐसा मॉडल है, जिससे आधुनिक शहर भी सीख ले सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि संरक्षण के अभाव में यह धरोहर धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हम सिर्फ एक ऐतिहासिक संरचना ही नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की प्राचीन समझ भी खो देंगे। फिर सिर्फ इतिहास के पन्नों में ही इस बांध के बारे में पढ़ने को मिलेगा।
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