भोपाल

अफीम का नशा कर रहे तोते, बन गए नशेड़ी! किसान भी हैरान

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Mar 22, 2023, 01:11 PM IST

मंदसौर में तोते बड़ी मात्रा में अफीम की फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसानों ने तोतों के आतंक से बचने के लिए खेतों में प्लास्टिक की जाली लगाई है।

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तोते चट कर रहे अफीम की उपज (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Photo : IANS

भोपाल/ मंदसौर: अभी तक आपने सुना होगा कि इंसान ही नशा करते हैं। अब ये नशा किसी भी चीज का हो सकता है, जैसे- शराब, सिगरेट,अफीम, चरस और गांजा...। लेकिन क्या आपने सुना है कि तोते भी नशा करते हैं? बात भले ही चौंकाने वाली हो, लेकिन ऐसा सच में हो रहा है और किसान से लेकर विशेषज्ञ भी इससे हैरान हैं।

दरअसल, मध्य प्रदेश के मंदसौर, नीमच और तलाम में बड़ी मात्रा में अफीम की खेती होती है। किसान यहां बाकायदा केंद्रीय नारकोटिक्स विभाग से लाइसेंस लेकर अफीम उगाते हैं, लेकिन अब उनकी फसल पर खतरा मंडरा रहा है। दरअसल, यहां बड़ी मात्रा में तोते फसल को चट कर जा रहे हैं। इससे किसानों की चिंता बढ़ गई है।

सरकार को नहीं दे पा रहे उपज

किसानों को अपनी उपज को सरकार को देना होता है, लेकिन तोतों की वजह से अब वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। अगर, ऐसा ज्यादा समय के लिए होता है तो नारकोटिक्स विभाग किसानों का कांट्रेक्ट खत्म कर देता है। ऐसे में किसानों को एक तरफ तोतों से अफीम की खेती बचाने की चिंता है तो दूसरी तरफ कांट्रेक्ट खत्म होने की भी टेंशन है।

प्लास्टिक की नेट लगाकर बचा रहे फसल

तोतों से अफीम की फसल बचाने के लिए किसान कई तरीके अपना रहे हैं। इसके तहत वे अपनी उपज पर प्लास्टिक की नेट लगा रहे हैं, इससे उनकी समस्या कुछ हद तक दूर भी हुई है, लेकिन किसान इसका स्थाई समाधान चाहते हैं। दरअसल, किसानों के खेतों में नीलगाय और अन्य अवारा पशुओं का भी खतरा बना रहता है।

कई तरह की दवाएं बनाने में होता है प्रयोग

बता दें, अफीम से ह्रदय, रक्त, मनोरोग व नींद की दवाएं बनाई जाती है। सरकार इसी के लिए किसानों को लाइसेंस देती है और उनकी उपज नारकोटिक्स विभाग की देखरेख में होती है। भारत में अफीम की तस्करी पूरी तरह से अवैध है। ऐसा करने पर 10 साल तक की जेल व एक लाख रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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