आजकल निवेशकों में IPO को लेकर जबरदस्त उत्साह देखने को मिलता है। हर कोई चाहता है कि वह किसी अच्छे आईपीओ में निवेश करे और लिस्टिंग के दिन शानदार मुनाफा कमाए। यही वजह है कि जैसे ही किसी बड़ी या चर्चित कंपनी का IPO खुलता है, लोग तुरंत आवेदन कर देते हैं। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि कई बार अप्लाई करने के बावजूद अलॉटमेंट हाथ नहीं लगता। तब मन में सवाल उठता है कि क्या प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी है या हमसे कोई गलती हो रही है। अगर आपके साथ भी ऐसा हुआ है, तो इसके पीछे की वजह समझना जरूरी है।
सच्चाई यह है कि IPO अलॉटमेंट की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और नियमों के अनुसार होती है। लेकिन इसे समझे बिना कई बार निराशा हाथ लगती है। अगर आप भी हर बार अप्लाई कर रहे हैं और शेयर नहीं मिल रहे, तो अब अलॉटमेंट की प्रक्रिया और उसके पीछे की वजहें जानने का समय आ गया है, ताकि अगली बार आप समझदारी से आवेदन करें और अलॉटमेंट मिलने की संभावना बढ़ा सकें। तो आइए आज आपको बताते हैं आईपीओ में अलॉटमेंट कैसे मिलता है और इसके लिए क्या नियम कानून हैं?
सबसे पहले IPO सब्सक्राइब होने के बाद कंपनी और बैंकर यह देखते हैं कि कितने आवेदन आए हैं और कितने शेयर उपलब्ध हैं। अगर किसी IPO में उतने ही आवेदन आए हों, जितने शेयर उपलब्ध हैं, तो लगभग हर निवेशक को शेयर अलॉट हो जाते हैं। लेकिन असली समस्या तब आती है जब IPO ज्यादा सब्सक्राइब होता है, यानी शेयर कम और आवेदन बहुत ज्यादा होते हैं।
ऐसी स्थिति में SEBI की गाइडलाइन लागू होती है और अलॉटमेंट के लिए लॉट सिस्टम अपनाया जाता है। IPO में एक न्यूनतम लॉट होता है मान लीजिए एक लॉट में 20 शेयर हैं, तो रिटेल निवेशक कम से कम एक लॉट के लिए ही आवेदन कर सकता है। अगर IPO बहुत ज्यादा ओवरसब्सक्राइब हो जाए, तो हर एक एप्लिकेंट को एक लॉट देने की कोशिश की जाती है। इस दौरान कंप्यूटराइज्ड लकी ड्रॉ यानी ऑटोमैटिक रैंडम सिस्टम के ज़रिए तय होता है कि किसे अलॉटमेंट मिलेगा और किसे नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी होती है, बल्कि यह पूरी तरह पारदर्शी और सिस्टम-बेस्ड होती है।
ओवरसब्सक्रिप्शन की स्थिति में अलॉटमेंट प्रक्रिया लॉट सिस्टम और लकी ड्रॉ के आधार पर होती है। यानी भले ही आपने ज्यादा लॉट लगाए हों, लेकिन एक लॉट के हिसाब से ही मौका मिलता है। कई निवेशक अपने परिवार के अलग-अलग PAN और डिमैट खाते से आवेदन करते हैं ताकि अलॉटमेंट मिलने की संभावना बढ़ जाए।
IPO अलॉटमेंट में अलग-अलग कैटेगरी भी होती हैं। रिटेल निवेशकों के लिए आमतौर पर 35% हिस्सेदारी होती है, जबकि बड़े निवेशकों यानी QIBs (Qualified Institutional Buyers) के लिए 50% शेयर आरक्षित रहते हैं। बाकी हिस्सा NII (Non-Institutional Investors) यानी HNI और अन्य निवेशकों के लिए होता है। इसके अलावा कुछ कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए भी कोटा रखती हैं। इस तरह हर कैटेगरी के अनुसार आवेदन की गिनती और अलॉटमेंट तय किया जाता है।
कई लोग सोचते हैं कि अगर वे ज्यादा लॉट के लिए आवेदन करेंगे तो अलॉटमेंट मिलने के चांस बढ़ जाते हैं। लेकिन रिटेल कैटेगरी में अलॉटमेंट एक लॉट के आधार पर होता है। यानी चाहे आप 1 लॉट अप्लाई करें या 10 लॉट ओवरसब्सक्रिप्शन में आपकी किस्मत लकी ड्रॉ पर ही निर्भर होती है। हां, अगर IPO कम सब्सक्राइब होता है, तब ज्यादा लॉट लगाने से आपको ज्यादा शेयर मिल सकते हैं।
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अगर आप IPO अलॉटमेंट पाना चाहते हैं तो कुछ बातें ध्यान रखें सही समय पर आवेदन करें, UPI पेमेंट गलती से भी पेंडिंग न छोड़े, अलग-अलग PAN से अप्लाई करने की रणनीति अपनाएं और कम से कम एक लॉट जरूर अप्लाई करें। कुल मिलाकर, IPO अलॉटमेंट प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती है और इसमें किसी भी तरह की गड़बड़ी नहीं होती। अलॉटमेंट न मिलना ओवरसब्सक्रिप्शन और किस्मत का भी खेल है।
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