BRICS 2026 : भारत नई दिल्ली में 12-13 सितंबर 2026 को 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारत का लक्ष्य इस मंच के जरिए व्यापारिक असंतुलन को दूर करना और एक संतुलित दुनिया का निर्माण करना है। BRICS के माध्यम से भारत दुनिया में शांति, समानता और विकास को बढ़ावा दे रहा है। ब्रिक्स दुनिया के प्रमुख उभरते और विकासशील देशों का एक खास समूह है। इसका मुख्य काम दुनिया के आर्थिक, राजनीतिक और वित्तीय मुद्दों पर आपस में मिलकर चर्चा करना है। BRICS नाम इसके शुरुआती सदस्य देशों के नाम के पहले अक्षरों से बना है। ये देश ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। यह समूह किसी कठिन कानूनी नियम या संधि पर नहीं चलता है। इसका कोई स्थायी मुख्यालय भी नहीं है। इसके सभी फैसले आपस में बातचीत और सबकी सहमति से लिए जाते हैं।
BRICS का इतिहास और नया रूप
'BRIC' शब्द का इस्तेमाल पहली बार साल 2001 में ब्रिटेन के एक अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने किया था। उन्होंने बताया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन भविष्य में दुनिया की अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा देंगे। बाद में इसमें दक्षिण अफ्रीका भी जुड़ गया और यह BRICS बन गया। जनवरी 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी इसमें शामिल हो गए। इसके बाद जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी इसका हिस्सा बना। अब इस बड़े रूप को 'BRICS+' भी कहा जाता है।
भारत के लिए BRICS का महत्व
भारत के लिए BRICS एक ऐसा मंच है जहां वह अपनी बात दुनिया के सामने मजबूती से रख सकता है। भारत किसी भी सैन्य गुट में शामिल हुए बिना बड़े देशों के साथ मिलकर काम करता है। भारत एक तरफ BRICS में रहता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप और G20 के देशों के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखता है। इसे भारत की स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति माना जाता है।
दुनिया के बड़े मंचों पर भारत की आवाज
भारत चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसे बड़े वैश्विक संगठनों में बदलाव हो। भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता चाहता है। BRICS के जरिए भारत को अन्य विकासशील देशों का साथ मिलता है। इससे भारत की मांग और अधिक मजबूत हो जाती है।
गरीब और विकासशील देशों की मदद
भारत खुद को 'ग्लोबल साउथ' यानी विकासशील देशों की आवाज मानता है। BRICS के जरिये भारत भोजन की सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, सस्ती दवाओं और तकनीक से जुड़े मुद्दे उठाता है। इससे अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के गरीब देशों को बहुत मदद मिलती है।
विकास कार्यों के लिए आसानी से पैसा
BRICS देशों ने मिलकर 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) बनाया है। यह बैंक सदस्य देशों को सड़कें, पुल और मेट्रो बनाने के लिए पैसा देता है। भारत इस बैंक से सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाला देश रहा है। भारत में चेन्नई, इंदौर और मुंबई मेट्रो तथा दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल जैसी बड़ी परियोजनाएं इसी बैंक की मदद से बन रही हैं।
भारतीय सामान के लिए नए बाजार
BRICS के विस्तार से भारत को व्यापार के नए मौके मिले हैं। अब भारतीय कंपनियां अपनी दवाएं, गाड़ियां, कपड़े, अनाज और डिजिटल सेवाएं आसानी से नए देशों में बेच सकती हैं। इससे भारत का निर्यात बढ़ता है और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।
तेल और जरूरी खनिजों की सुरक्षा
भारत को अपनी फैक्ट्रियों और गाड़ियों के लिए बड़ी मात्रा में पेट्रोल, डीजल और गैस की जरूरत होती है। रूस, सऊदी अरब, UAE और ईरान जैसे देश तेल के बड़े उत्पादक हैं। वहीं ब्राजील और इंडोनेशिया के पास जरूरी खनिज हैं। BRICS के कारण भारत को ये चीजें आसानी से और लगातार मिलती रहती हैं।
तकनीक और डिजिटल भारत का प्रसार
भारत तकनीक के मामले में काफी आगे बढ़ रहा है। भारत ने UPI, आधार और CoWIN जैसे बेहतरीन डिजिटल सिस्टम बनाए हैं। BRICS के जरिए भारत अपनी इन सफल तकनीकों को दूसरे देशों को भी सिखा रहा है। इसके साथ ही अंतरिक्ष अनुसंधान और वैज्ञानिक खोजों में भी सभी देश मिलकर काम करते हैं।
रुपये में व्यापार और डॉलर पर कम निर्भरता
आमतौर पर दो देशों के बीच व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है। लेकिन BRICS देश अब अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने पर जोर दे रहे हैं। भारत अब दूसरे देशों के साथ रुपये में व्यापार को बढ़ावा दे रहा है। इससे भारत के पैसे की बचत होती है और विदेशी बाजार के उतार-चढ़ाव से देश सुरक्षित रहता है।
