भारत में आज शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसके फोन में UPI (Unified Payments Interface) ऐप न हो। चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, हम बिना किसी एक्स्ट्रा चार्ज के चुटकियों में भुगतान कर देते हैं। हमारे लिए यह सेवा पूरी तरह मुफ्त है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अरबों रुपये की ये कंपनियां पेटीएम (Paytm), फोनपे (PhonePe) और गूगल पे (Google Pay) अगर हमसे कोई फीस नहीं लेतीं, तो फिर पैसा कैसे कमाती हैं? दरअसल, इनका बिजनेस मॉडल बहुत ही स्मार्ट तरीके से तैयार किया गया है, जहां हम 'ग्राहक' नहीं बल्कि इनका 'प्रोडक्ट' हैं।
कैसे कमाई करती हैं यूपीआई ऐप्स?
इन ऐप्स की कमाई का सबसे बड़ा जरिया है 'कमीशन और बिल भुगतान'। जब आप इन ऐप्स के जरिए अपना मोबाइल रिचार्ज करते हैं, बिजली का बिल भरते हैं, डीटीएच या गैस सिलेंडर बुक करते हैं, तो ये कंपनियां संबंधित ऑपरेटर से मोटा कमीशन लेती हैं। भले ही आपको लगता हो कि आपने 500 रुपये का रिचार्ज किया और 500 ही कटे, लेकिन उस ट्रांजैक्शन के पीछे टेलीकॉम कंपनी इन ऐप्स को एक निश्चित हिस्सा देती है। इसके अलावा, अब ये ऐप्स 'प्लेटफॉर्म फीस' के नाम पर भी आपसे 1 से 2 रुपये वसूलने लगे हैं, जो करोड़ों यूजर्स के हिसाब से एक बड़ी रकम बन जाती है।
ऐसे भी होती है कमाई
कमाई का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है 'मर्चेंट और साउंडबॉक्स सेवाएं'। आपने दुकानों पर पेटीएम या फोनपे का साउंडबॉक्स देखा होगा, जो पेमेंट मिलते ही 'पैसे प्राप्त हुए' बोलता है। ये कंपनियां दुकानदारों से इस मशीन का मंथली सब्सक्रिप्शन (किराया) लेती हैं। साथ ही, जब आप किसी क्यूआर कोड (QR Code) पर स्कैन करके पेमेंट करते हैं, तो बड़े मर्चेंट्स से 'मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (MDR) या अन्य सर्विस चार्ज के रूप में कमाई की जाती है। यही कारण है कि ये कंपनियां हर छोटी-बड़ी दुकान पर अपना क्यूआर कोड लगवाने के लिए होड़ में रहती हैं।
फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स सेल
तीसरा बड़ा जरिया है 'फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स की बिक्री'। इन ऐप्स के पास करोड़ों यूजर्स का डेटा होता है। वे जानते हैं कि आप कितना खर्च करते हैं और आपकी खरीदारी की आदतें क्या हैं। इस डेटा के आधार पर ये कंपनियां आपको पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड, बीमा (Insurance) और म्यूचुअल फंड जैसे प्रोडक्ट्स पिच करती हैं। जब भी कोई यूजर इनके प्लेटफॉर्म से लोन लेता है या बीमा पॉलिसी खरीदता है, तो बैंक या बीमा कंपनी इन ऐप्स को भारी कमीशन देती है। आज के समय में 'डिजिटल लेंडिंग' (लोन देना) इन ऐप्स के लिए मुनाफे का सबसे बड़ा इंजन बन गया है। हालांकि ये कंपनियां दावा करती हैं कि आपका डेटा सुरक्षित है, लेकिन वे आपकी पसंद-नापसंद का विश्लेषण करके टारगेटेड विज्ञापन दिखाती हैं। साथ ही, ऐप्स के भीतर मौजूद 'ब्रांड वाउचर' और 'कैशबैक ऑफर' के जरिए भी कंपनियां विज्ञापनदाताओं से पैसा कमाती हैं। संक्षेप में कहें तो, UPI केवल इन कंपनियों के लिए एक दरवाजा है, जिससे वे आपको अपने ऐप पर लाते हैं। एक बार जब आप ऐप के इकोसिस्टम में घुस जाते हैं, तो वे आपको रिचार्ज, लोन और इंश्योरेंस जैसी सेवाओं के जरिए 'मोनेटाइज' (पैसे बनाना) करते हैं।
