भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की महत्वपूर्ण बैठक शुरू हो गई है, जो 4 से 6 फरवरी तक चलेगी। इस बैठक पर न केवल शेयर बाजार की, बल्कि हर उस आम आदमी की नजर है जिसकी जेब पर होम लोन या कार लोन की EMI का बोझ है। हर बार की तरह इस बार भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रेपो रेट में कटौती होगी? हालांकि, ताजा संकेतों और आर्थिक विशेषज्ञों की राय पर गौर करें तो इस बार राहत मिलने की उम्मीद थोड़ी कम नजर आ रही है। अधिकतर इकोनॉमिस्ट्स का मानना है कि रिजर्व बैंक फिलहाल 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में रहेगा और रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा, ताकि बाजार में स्थिरता बनी रहे।
एक्सपर्ट्स को क्यों नहीं दिख रही राहत की उम्मीद?
बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस के अनुसार, इस महीने महंगाई (CPI) और जीडीपी (GDP) के नए आंकड़े जारी होने वाले हैं। ऐसी संभावना है कि नई सीरीज में महंगाई और विकास दर के आंकड़े मौजूदा स्तर से थोड़े ऊपर रह सकते हैं। जब महंगाई बढ़ने का जोखिम होता है, तो आरबीआई आमतौर पर ब्याज दरों को कम करने का जोखिम नहीं उठाता। इसके अलावा, वैश्विक ब्रोकरेज हाउस 'बैंक ऑफ अमेरिका' (BofA) ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ किया है कि फिलहाल भारतीय अर्थव्यवस्था को रेट कट की बहुत ज्यादा जरूरत महसूस नहीं हो रही है। ग्रोथ आउटलुक सकारात्मक है और ट्रेड डील्स की वजह से अनिश्चितता के बादल भी छंट गए हैं।
ट्रेड डील और ग्रोथ का समीकरण
दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए ब्याज दरें घटाने की गुंजाइश दिख रही थी। लेकिन भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुई ट्रेड डील ने समीकरण बदल दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह डील आने वाले समय में आर्थिक विकास की रफ्तार को और मजबूती देगी। जब इकोनॉमी पहले से ही अच्छी गति से बढ़ रही हो, तो केंद्रीय बैंक को अतिरिक्त लिक्विडिटी डालने या रेट कट करने की आवश्यकता कम हो जाती है। यही कारण है कि 'बैंक ऑफ अमेरिका' ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की अपनी पिछली उम्मीद को अब 'होल्ड' कर दिया है। उनके मुताबिक, आरबीआई अब रेट कट करने के बजाय बाजार में नकदी (Liquidity) के प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देगा।
कब कम होता है रेपो रेट और आपकी जेब पर क्या होता है असर?
रेपो रेट वह दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक अन्य व्यावसायिक बैंकों को कर्ज देता है। जब आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ती है, तब आरबीआई रेपो रेट कम करता है ताकि बैंकों को सस्ता कर्ज मिले और वे आगे आम जनता को कम ब्याज दरों पर लोन दे सकें। इससे बाजार में पैसा बढ़ता है और निवेश को बढ़ावा मिलता है। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखें तो भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.3 प्रतिशत के मजबूत स्तर पर है और महंगाई भी काफी हद तक नियंत्रण में है। ऐसे में आरबीआई के पास ब्याज दरों को स्थिर रखने का एक ठोस आधार है।
