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अब बिजली स्टोर भी होगी, जानें कैसे ₹1.86 लाख करोड़ की PM-DHARA करेगी कायापलट?

बिजली उत्पादन बड़ी प्रॉब्लम नहीं है। बल्कि, उस बिजली को स्टोर करना और सही जगह न्यूनतम क्षय के साथ डिलीवर करना चुनौती है। इस मुश्किल से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ₹1.86 लाख करोड़ की PM-DHARA पेश की है।

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पीएम धारा से बदलेगी देश की दिशा

PM-DHARA : भारत में रिन्यूएबल एनर्जी यानी सोलर और विंड पावर की क्षमता लगातार बढ़ रही है। लेकिन जैसे-जैसे ग्रीन एनर्जी का उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे एक नई चुनौती सामने आ रही है कि इस बिजली को ग्रिड तक कैसे पहुंचाया जाए और जो अतिरिक्त बिजली बने, उसे स्टोर कैसे किया जाए, ताकि जब सोलर या विंड से एनर्जी उत्पादन घटे, तो बिजली की कमी नहीं हो जाए।

इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने PM-DHARA यानी PM-डेवलपिंग हार्मोनाइज्ड एंड एक्सेलरेटेड रिन्यूएबल एनर्जी एक्सेस से जुड़े ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-3 (GEC-III) को मंजूरी दी है। इस योजना का कुल प्रोजेक्ट आउटले ₹1,86,405 करोड़ है। इसका मकसद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के इंट्रा स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) को मजबूत करना, 135 GW तक नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की बिजली के इस्तेमाल को संभव बनाना और 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) तैयार करना है। योजना को FY2032-33 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

आखिर PM-DHARA की जरूरत क्यों पड़ी?

इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए राजस्थान के किसी इलाके में दिन के समय तेज धूप है और वहां लगे सोलर प्लांट (Solar Plants) भारी मात्रा में बिजली बना रहे हैं। लेकिन उसी समय उस इलाके में बिजली की मांग कम है। अगर वहां से दूसरे इलाकों तक बिजली पहुंचाने के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन लाइन (Transmission Lines) नहीं हैं, तो पैदा हुई पूरी बिजली का इस्तेमाल नहीं हो पाएगा। ऐसे समय में इस एनर्जी को कम करना या रोकना पड़ सकता है। इसे कर्टेलमेंट (Curtailment) कहा जाता है।

इसके अलावा सोलर और विंड पावर की एक और समस्या है। इनसे बिजली का उत्पादन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। सोलर से दिन में ज्यादा मिलती है और शाम के बाद तेजी से घट जाती है। वहीं, विंड पावर हवा की गति के साथ बदलती रहती है। इसलिए ऊर्जा के उत्पदन में उतार-चढ़ाव चलता रहता है। इस वजह से ट्रांसमिशन के साथ ही स्टोरेज इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत करना भी जरूरी हो गया है। सरकार की नई योजना इसी समस्या का समाधान करती है।

₹1.86 लाख करोड़ कहां खर्च होंगे?

इस योजना का सबसे बड़ा हिस्सा ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने पर खर्च किया जाएगा। यानी करीब ₹1.36 लाख करोड़ से राज्यों के भीतर बिजली पहुंचाने वाले ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत किया जाएगा। वहीं ₹50,000 करोड़ से 50 GWh बैटरी स्टोरेज (Battery Storage) तैयार करने का प्रावधान है।

PM-DHARA का हिस्सारकम
अंतर्राज्यीय/राज्य के भीतर पारेषण व्यवस्था₹1,36,378 करोड़
बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS)₹50,000 करोड़
कुल परियोजना लागत₹1,86,405 करोड़
केंद्र सरकार की वित्तीय सहायता₹54,082 करोड़
केंद्र सरकार कुल ₹54,082 करोड़ की वित्तीय मदद देगी। सरकार के मुताबिक इससे इंट्रा स्टेट ट्रांसमिशन चार्जेेज कुछ बोझ कम करने में मदद मिलेगी और इसका फायदा बिजली की लागत पर पड़ सकता है।

135 GW का मतलब क्या है?

यहां एक चीज साफ समझना जरूरी है। 135 GW का मतलब 135 GW नई रिन्युएबल एनर्जी कैपेसिटी लगाना नहीं है। बल्कि, इसका मतलब है कि योजना के तहत तैयार किया जाने वाला ट्रांसमिशन इन्फ्रा से 135 GW तक रिन्युएबल पावर को ग्रिड तक पहुंचाने की क्षमता तैयार करना है। यानी राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु जैसे रिन्युएबल एनर्जी वाले राज्यों में अगर बड़े सोलर या विंड पावर प्रोजेक्ट में भारी मात्रा में बिजली बनती है, तो उसे अलग-अलग इलाकों तक पहुंचाने के लिए बेहतर ट्रांसमिशन नेटवर्क उपलब्ध होगा। सरकार का मकसद यह है कि रिन्यूएबल प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद ट्रांसमिशन की कमी के कारण बिजली ड्रिस्ट्रीब्यूट नहीं होने की स्थिति कम से कम हो।

बैटरी स्टोरेज की जरूरत क्यों?

इस योजना का दूसरा बड़ा हिस्सा 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज है। इसे बिजली का “बैंक” भी समझ सकते हैं। जब दिन में सोलर पावर ज्यादा बनेगी, जो इसमें जमा होती रहेगी और जब रात को उत्पादन घटेगा, तो इससे इस्तेमाल किया जा सकेगा। सरकार के मुताबिक BESS को बिजली उत्पादन, ग्रिड या दूसरी अहम जगहों पर लगाया जा सकेगा। यानी भविष्य का यह पावर सिस्टम सिर्फ बिजली पैदा ही नहीं करेगा, बल्कि ट्रांसमिशन और स्टोरेज भी करेगा।

बिजली बनाने से स्टोरेज तक बनेगा सिस्टम

बिजली बनाने से स्टोरेज तक बनेगा सिस्टम

आपको क्या फायदा होगा?

इस योजना का असर यह नहीं होगा कि अगले महीने हर घर का बिजली बिल अचानक कम हो जाएगा। इसका फायदा देश के पावर सिस्टम की क्षमता बढ़ने के साथ धीरे-धीरे दिखाई देने की उम्मीद है। खासतौर पर बिजली का ट्रांसमिशन और उपलब्धता भरोसेमंद होगी और आखिर में बिजली की दरों पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

रोजगार और उद्योंगो को भी मिलेगा फायदा

इतने बड़े ट्रांसमिशन और स्टोरेज इन्वेस्टमेंट से पवार सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन में रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। बैटरी स्टोरेज की मैन्युफैक्चरिंग और डेवलपमेंट बढ़ने से डोमेस्टिक एनर्जी स्टोरेज इंडस्ट्री को भी बढ़ावा मिल सकता है। इसके अलावा ऑपरेशन मेंटेनेंंस और ग्रिड मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में स्किल्ड जॉब्स की जरूरत बढ़ेगी।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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