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भारत में पैर पसार रहा $2 ट्रिलियन एसेट वाला जापानी बैंक SMBC, रिजर्व बैंक से मिली मंजूरी

SMBC Expanding in India: $2 ट्रिलियन एसेट वाला जापानी बैंक सुमितोमो मित्सुई बैंकिंग कॉरपोरेशन (SMBC) अब अपना दायरा तेजी से बढ़ाने की तैयारी में है। RBI ने SMBC को देश में Wholly Owned Subsidiary (WOS) बनाने के लिए इन-प्रिंसिपल मंजूरी दे दी है। माना जा रहा है कि इस कदम से भारतीय बैंकिंग सेक्टर में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कॉर्पोरेट फंडिंग से लेकर विदेशी निवेश तक कई मोर्चों पर बदलाव देखने को मिल सकता है।

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जापानी बैंक की भारत में एंट्री (इमेज क्रेडिट, कैन्वा)

RBI Approves SMBC WOS: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने जापान के Sumitomo Mitsui Banking Corporation (SMBC) को देश में पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक (WOS) स्थापित करने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। RBI के मुताबिक, यह मंजूरी SMBC को भारत में अपनी ब्रांच-बेस्ड मौजूदगी को एक लोकली इनकॉरपोरेटेड सब्सिडियरी में बदलने की अनुमति देती है। फिलहाल SMBC भारत में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु की शाखाओं के जरिए ऑपरेट करता है और GIFT City (IFSC) में भी इसकी मौजूदगी है।

बदलाव क्यों अहम?

अब तक SMBC भारत में विदेशी बैंक की ब्रांच के तौर पर काम कर रहा था, जहां विस्तार और ऑपरेशनल स्ट्रक्चर पर कुछ रेगुलेटरी सीमाएं रहती हैं। WOS बनने के बाद SMBC एक अलग कानूनी इकाई के रूप में भारत में रजिस्टर्ड होगा, जिससे बैंक को लोकल लेवल पर ज्यादा ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है। इसका मतलब यह भी है कि बैंक का मैनेजमेंट और गवर्नेंस स्ट्रक्चर भारत के नियमों के हिसाब से अधिक स्पष्ट और मजबूत तरीके से सेट हो सकता है।

RBI ने क्यों दी मंजूरी?

RBI के नजरिए से WOS स्ट्रक्चर विदेशी बैंकों पर निगरानी को ज्यादा प्रभावी बनाता है। लोकल सब्सिडियरी मॉडल में बैंक का कैपिटल बेस, एसेट्स और लायबिलिटीज भारत के भीतर ज्यादा स्पष्ट तरीके से ट्रैक किए जा सकते हैं। संकट के समय रेगुलेटर के पास रिस्क कंट्रोल और रेजोल्यूशन को लेकर ज्यादा स्पष्टता रहती है। यही वजह है कि 2008 के ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद दुनिया भर में लोकल इनकॉरपोरेशन को लेकर रेगुलेटर्स का फोकस बढ़ा है और RBI की 2025 गाइडलाइंस भी इसी दिशा में जाती हैं।

अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?

SMBC का WOS मोड में आना भारत के लिए एक तरह से लॉन्ग टर्म फॉरेन कैपिटल कमिटमेंट माना जा सकता है। इससे भारत-जापान निवेश संबंधों को मजबूती मिलेगी और बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए फंडिंग के विकल्प बढ़ सकते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग, एनर्जी ट्रांजिशन और क्रॉस-बॉर्डर बिजनेस से जुड़े प्रोजेक्ट्स में बैंकिंग सपोर्ट मजबूत होने की संभावना रहती है। इसका अप्रत्यक्ष फायदा यह हो सकता है कि अच्छी क्रेडिट प्रोफाइल वाली कंपनियों को प्रतिस्पर्धी दरों पर लोन और स्ट्रक्चर्ड फाइनेंसिंग के विकल्प ज्यादा मिलें।

ग्राहकों के लिए क्या बदलेगा?

इस फैसले का सबसे तेज असर बड़े कॉर्पोरेट और इंटरनेशनल बिजनेस से जुड़े ग्राहकों पर दिख सकता है। भारत में ऑपरेट कर रही जापानी कंपनियों और उनके सप्लाई चेन पार्टनर्स के लिए SMBC का लोकल सब्सिडियरी मॉडल बेहतर बैंकिंग सर्विस और तेज फाइनेंसिंग फैसिलिटी दे सकता है। वहीं रिटेल ग्राहकों के लिए बदलाव धीरे-धीरे सामने आएंगे, क्योंकि SMBC का भारत में फोकस पारंपरिक रूप से कॉर्पोरेट बैंकिंग और बड़े संस्थागत क्लाइंट्स पर रहा है। हालांकि WOS बनने के बाद अगर बैंक अपनी पहुंच बढ़ाता है तो समय के साथ नए प्रोडक्ट्स और बेहतर सर्विस स्टैंडर्ड्स का लाभ कुछ रिटेल और MSME सेगमेंट तक भी पहुंच सकता है।

बैंकिंग सिस्टम में क्या बदलेगा?

SMBC जैसी ग्लोबल बैंकिंग ताकत का विस्तार भारतीय बैंकिंग सिस्टम में प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकता है। इससे कॉर्पोरेट लेंडिंग सेगमेंट में प्राइसिंग और सर्विस क्वालिटी दोनों पर दबाव बनेगा, जो ग्राहकों के लिए पॉजिटिव है। साथ ही WOS मॉडल से सिस्टम की स्थिरता भी मजबूत होती है क्योंकि RBI के लिए इस स्ट्रक्चर में सुपरविजन, कंप्लायंस और रिस्क मैनेजमेंट को लेकर नियंत्रण ज्यादा प्रभावी होता है।

मंजूरी क्यों बड़ी खबर है?

SMBC को RBI की इन-प्रिंसिपल मंजूरी भारत के बैंकिंग सेक्टर के लिए एक स्ट्रक्चरल पॉजिटिव डेवलपमेंट है। यह कदम विदेशी बैंक की मौजूदगी को ज्यादा स्थायी और रेगुलेटरी रूप से मजबूत बनाता है, कॉर्पोरेट फंडिंग इकोसिस्टम में विकल्प बढ़ाता है और सिस्टम के लिए बेहतर सुपरविजन व रिस्क कंट्रोल का रास्ता खोलता है। कुल मिलाकर यह फैसला निवेश, प्रतिस्पर्धा और वित्तीय स्थिरता के तीनों मोर्चों पर भारत के लिए सकारात्मक संकेत देता है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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