बिजनेस

क्या फिक्स्ड डिपॉजिट का ऑटो-रिन्यूअल सच में बेस्ट ऑप्शन है? जानें बैंक का ये खेल

एफडी मैच्योर होने पर उसे ऑटो-रिन्यू कराना हमेशा फायदे का सौदा नहीं होता। नई ब्याज दर पुरानी एफडी से कम हो सकती है, जिससे रिटर्न प्रभावित हो सकता है।

Image

Fixed Deposit Auto Renewal

जब बात सुरक्षित निवेश और गारंटीड रिटर्न की आती है, तो भारत में आज भी फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposit) को सबसे भरोसेमंद विकल्प माना जाता है। अक्सर जब हम बैंक में एफडी कराते हैं, तो फॉर्म भरते समय बैंक कर्मचारी हमसे एक विकल्प पर टिक करने को कहते हैं 'ऑटो-रिन्यूअल' (Auto-Renewal)। इसका सीधा मतलब यह होता है कि जब आपकी एफडी मैच्योर होगी, तो बैंक बिना आपसे पूछे उसे अगले उतने ही समय के लिए दोबारा रिन्यू (नवीनीकरण) कर देगा। बहुत से लोग इसे एक बेहद आसान और झंझट-मुक्त सुविधा मानते हैं क्योंकि इसमें मैच्योरिटी के बाद बैंक के चक्कर नहीं काटने पड़ते। लेकिन क्या यह सुविधा वाकई आपके फायदे की है, या इसके पीछे बैंकों का कोई छिपा हुआ खेल है जो आपके मुनाफे को कम कर देता है?

ऑटो-रिन्यूअल के पीछे का 'ब्याज दर' वाला खेल

मान लीजिए आपने 3 साल पहले 7% की ब्याज दर पर ₹1 लाख की एफडी कराई थी। आज वह एफडी मैच्योर हो गई है। अगर आपने 'ऑटो-रिन्यूअल' का विकल्प चुना हुआ है, तो बैंक उस ₹1 लाख (और उस पर मिले ब्याज) को अगले 3 साल के लिए फिर से फिक्स कर देगा। लेकिन ट्विस्ट यहीं पर है! बैंक आपको वह पुरानी 7% वाली ब्याज दर नहीं देगा, बल्कि उस दिन बाजार में जो नई ब्याज दर चल रही होगी, वही लागू होगी।

नुकसान का गणित: अगर आज के समय में बैंक ने अपनी ब्याज दरें घटाकर 6% कर दी हैं, तो आपकी एफडी अपने आप कम ब्याज दर (6%) पर रिन्यू हो जाएगी। इसके विपरीत, अगर बैंकों में ब्याज दरें बढ़कर 8% हो चुकी हैं, और बैंक के पास उसी समय 'स्पेशल एफडी स्कीम' (जैसे 400 या 500 दिनों वाली स्कीम) चल रही है जिसमें सबसे ज्यादा ब्याज मिल रहा है, तो ऑटो-रिन्यूअल आपको उसका फायदा नहीं देगा। वह आपको केवल रेगुलर टाइम पीरियड की सामान्य ब्याज दर ही देगा। इस तरह आप ज्यादा मुनाफा कमाने का एक बेहतरीन मौका चूक जाते हैं।

एडिशनल बेनिफिट्स और सीनियर सिटीजन घाटा

ऑटो-रिन्यूअल का सबसे बड़ा नुकसान हमारे घर के बुजुर्गों यानी वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) को होता है। अमूमन बैंकों में सीनियर सिटीजंस को 0.50% से लेकर 0.75% तक का अतिरिक्त ब्याज मिलता है। लेकिन कई बार ऑटो-रिन्यूअल के समय सिस्टम इस एडिशनल बेनिफिट को ठीक से कैच नहीं करता या फिर स्पेशल टेन्योर (विशेष अवधि) का लाभ बुजुर्गों को नहीं मिल पाता। इसके अलावा, यदि आप मैच्योरिटी के समय खुद बैंक जाते हैं या नेट बैंकिंग चेक करते हैं, तो आप अपनी जरूरत के हिसाब से पैसे को किसी अन्य बैंक में ट्रांसफर कर सकते हैं जहां ज्यादा ब्याज मिल रहा हो। लेकिन ऑटो-रिन्यूअल आपको उसी एक बैंक में बांधकर रख देता है।

तो फिर निवेशकों को क्या करना चाहिए?

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऑटो-रिन्यूअल का विकल्प चुनने के बजाय हमेशा 'न न-ऑटो रिन्यूअल' या 'क्रेडिट टू अकाउंट' (Credit to Account) का विकल्प चुनना चाहिए। इसका फायदा यह होता है कि एफडी पूरी होते ही पूरा पैसा (मूलधन + ब्याज) सीधे आपके सेविंग्स अकाउंट में आ जाता है।

पैसा अकाउंट में आने के बाद आप खुद मार्केट रिसर्च कर सकते हैं कि इस समय कौन सा बैंक सबसे ज्यादा ब्याज दे रहा है। आप चाहें तो उस पैसे को किसी बेहतर म्यूचुअल फंड, पोस्ट ऑफिस स्कीम या फिर उसी बैंक की किसी नई स्पेशल एफडी स्कीम में दोबारा निवेश कर सकते हैं। संक्षेप में कहें तो, आलस या सुविधा के चक्कर में 'ऑटो-रिन्यूअल' चुनना आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है। अपनी मेहनत की कमाई पर अधिकतम रिटर्न पाने के लिए हमेशा मैच्योरिटी की तारीख याद रखें और अपने पैसों पर खुद कंट्रोल रखें।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

और पढ़ें
End of Article