पश्चिम एशिया संकट के चलते दुनियाभर के तेल बाजारों में हाहाकार मचा हुआ है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार कच्चे तेल की कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इस बीच, केंद्र सरकार ने डीजल पर निर्यात ड्यूटी को दोगुना से ज्यादा बढ़ा दिया। वैश्विक बाजार में आई इस आग को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने डीजल और हवाई ईंधन (ATF) के निर्यात पर लगने वाली ड्यूटी में भारी इजाफा कर दिया है। अब डीजल के निर्यात पर शुल्क को 21.5 रुपये से बढ़ाकर सीधे 55.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। वहीं, एटीएफ पर निर्यात शुल्क 29.5 रुपये से बढ़ाकर 42 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करना और बढ़ते आयात खर्च के बीच संतुलन बनाना है।
कच्चे तेल पर दबाव का असर
भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि हम अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल दूसरे देशों से खरीदते हैं। मार्च 2026 के दौरान भी कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई थीं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में निर्यात शुल्क बढ़ाकर सरकार रिफाइनरी कंपनियों द्वारा बाहर भेजे जाने वाले तेल पर नियंत्रण कस रही है, ताकि देश के भीतर तेल की कमी न हो और कीमतों को काबू में रखा जा सके।
सरकारी तेल कंपनियों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 27 मार्च, 2026 को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये की कटौती की थी। सरकार ने यह फैसला टैक्स रेवेन्यू का त्याग कर कंपनियों के घाटे को रोकने के लिए लिया था। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया भारी उछाल को देखते हुए सरकार को एक बार फिर दखल देना पड़ सकता है।
