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कच्चे तेल में फिर आया उबाल, Brent Crude 90 डॉलर पार, क्या फिर बिगड़ेगा तेल का खेल?

अमेरिका-ईरान की जगं में अब सऊदी अरब की एंट्री हो चुकी है। इसके अलावा युद्ध का दायर बढ़कर मिस्र तक पहुंच गया है। क्रूड के दाम में फिर तेजी है। ब्रेंट क्रूड फिर से 90 डॉलर पहुंच गया है।

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क्रूड के दाम में उबाल

US Iran War अब विकराल होता जा रहा है। युद्ध में सऊदी अरब की एंट्री हो चुकी है। पहली बार मिस्र भी हमले की जद में आ गया है। वहीं, ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ईरान को अब पूरी तरह बर्बाद कर दिया जाएगा। इस घटनाक्रम के बीच क्रूड के दाम में फिर उछाल आया है। Brent Crude फिलहाल 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है।

अमेरिका-ईरान जंग के चलते पश्चिम एशिया में पिछले 6 महीने से तनाव है। ग्लोबल ऑयल सप्लाई का 20% हिस्सा रखने वाला रास्ता होर्मुज स्ट्रेट इस युद्ध का केंद्र बन गया, जिसे अमेरिका और ईरान ने बंद कर दिया था और क्रूड के दाम 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए। लेकिन, जून में दोनों देशों ने शांति समझौता किया, जिसके बाद क्रूड 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आ गया था।

इस बार अलग तरह की चिंता

अब दोनों देशों में फिर से तनाव बढ़ा है। लेकिन, इस बार ऑयल सप्लाई बंद होने का रिस्क सिर्फ होर्मुज तक सीमित नहीं है। बल्कि, सऊदी अरब और मिस्र को प्रभावित करने वाला लाल सागर और बाब अल मंडेब स्ट्रेट भी इसकी जद में है। इस तरह कुल मिलाकर दुनिया की करीब 40 फीसदी एनर्जी सप्लाई कट ऑफ होने का खतरा है। अगर ये दोनों रास्ते लंबे समय तक बंंद रहे, तो दुनिया को अभूतपूर्व ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है।

उबल रहा क्रूड

पिछले एक सप्ताह से लगातार WTI Crude भाव 80 से 85 और Brent Crude का भाव 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल के बीच बना हुआ है। फिलहाल ग्लोबल एनर्जी बाजार यह उम्मीद कर रहा है कि जल्द ही दोनों देशों के बीच कोई समझौता होगा और एनर्जी सप्लाई का रिस्क घटेगा। हालांकि, अब यह उम्मीद घट रही है। क्योंकि, युद्ध में सऊदी अरब की सीधे एंट्री हो चुकी है। इसके अलावा होर्मुज और बाब अल मंडेब में शिपिंग की चिंताएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा अमेरिका में कच्चे तेल का भंडार उम्मीद से ज्यादा घटा है, जिससे सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है।

अभी कितना है भाव

बुधवार रात ब्रेंट क्रूड करीब 90.85 डॉलर तक पहुंच गया, जबकि WTI भी 85 डॉलर के ऊपर निकल गया। हालांकि, गुरुवार सुबह हल्की मुनाफावसूली हुई। लेकिन, अब भी ब्रेंट 90 डॉलर के आसपास बना हुआ है।

भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अगर ब्रेंट लंबे समय तक 90 डॉलर या उससे ऊपर रहता है तो इसके कई असर हो सकते हैं। मसलन, तेल कंपनियों की लागत बढ़ेगी, जिसे एक समय के बाद ग्राहकों तक पास ऑन किया जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि पेट्रोल और डीजल महंगे होने का जोखिम बढ़ रहा है। फ्यूल महंगा होने का सीधा मतलब होता है कि महंगाई बढ़ सकती है, जिससे सरकार का आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है। इसकी वजह से रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। डॉलर की तुलना में कमजोर रुपया आयात को और महंगा कर देगा।

क्या 100 डॉलर की ओर बढ़ सकता है तेल?

विश्लेषकों का मानना है कि अभी बाजार में "रिस्क प्रीमियम" जुड़ा हुआ है। यानी कीमतें केवल वास्तविक सप्लाई में कमी की वजह से नहीं, बल्कि भविष्य के खतरे को देखते हुए भी बढ़ रही हैं। लेकिन, होर्मुज में आवाजाही और घटती है, ईरान या उसके सहयोगी तेल टैंकरों को निशाना बनाते हैं,

या अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य संघर्ष और तेज होता है, तो ब्रेंट क्रूड दोबारा 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच सकता है। दूसरी ओर यदि तनाव कम होता है और तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य रहती है तो कीमतों में राहत मिल सकती है।

    Yateendra Lawaniya
    यतींद्र लवानियाauthor

    प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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