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क्या धरती से खत्म होने वाला पहला देश बन जाएगा दक्षिण कोरिया? तेजी से घर रही बर्थ रेट, सदी के अंत तक खत्म हो जाएगी 70% आबादी

South Korea Birth Rate: दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर में मौजूदा गिरावट की सबसे बड़ी वजह सरकार द्वारा लागू की गई परिवार नियोजन नीतियां हैं। 1960 के दशक में यहां जन्मदर प्रति महिला 6 बच्चे थी। आर्थिक विकास की होड़ में अब यह घटती जा रही है और सरकार के सामने संकट बनकर खड़ी हो गई है।

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दक्षिण कोरिया में तेजी से घट रही जन्मदर (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Photo : iStock

South Korea Birth Rate: दक्षिण कोरिया...एक ऐसा देश जो तेज आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण के लिए जाना जाता है, एक अभूतपूर्व संकट से जूझ रहा है। दक्षिण कोरिया की जन्मदर तेजी से घट रही है। यहां महिलाएं बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं और आर्थिक व सामाजिक दबाव घटती जन्मदर का कारण बन रहा है। यही ट्रेंड जारी रहा तो सदी के अंत तक दक्षिण कोरिया की आबादी अपने मौजूदा आकार के एक तिहाई तक सिमट सकती है।

कुछ अनुमानों के मुताबिक, घटते जन्म दर के कारण सदी के अंत तक दक्षिण कोरिया की आबादी 52 मिलियन से घटकर मात्र 17 मिलियन रह जाएगी। इससे भी खराब स्थिति यह हो सकती है कि देश अपनी 70 फीसदी आबादी को खो सकता है और यहां केवल 14 मिलियन लोग ही बच सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था अस्थिर हो जाएगी और अभूतपूर्व सामाजिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।

कैसे घटी दक्षिण कोरिया की जन्म दर

दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर में मौजूदा गिरावट की सबसे बड़ी वजह सरकार द्वारा लागू की गई परिवार नियोजन नीतियां हैं। 1960 के दशक में यहां की सरकार ने इस बात को लेकर चिंता जताई कि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास से ज़्यादा हो रही है, इसलिए उसने जन्मदर को कम करने के उपाय किए। उस समय, दक्षिण कोरिया की प्रजनन दर प्रति महिला 6 बच्चे के स्तर पर थी। सरकार ने ऐसी नीतियां लागू कीं कि1982 तक प्रजनन दर गिरकर 2.4 हो गई और अर्थव्यवस्था में उछाल आया। 1983 तक प्रजनन दर और गिर गई, जो तब से घट ही रही है। ऐसे में उस समय सरकार द्वारा किए गए जनसंख्या नियंत्रण के उपाय अब दक्षिण कोरिया के अस्तित्व के लिए संकट बन गए हैं।

क्यों बच्चे नहीं पैदा करना चाहती हैं महिलाएं

  • शहरी क्षेत्रों में परिवार से ज्यादा करियर को प्राथमिकता।
  • आधे से अधिक महिलाएं पैरेंटिंग को महिला रोजगार में बाधा मानती हैं।
  • दोहरी आय वाले परिवारों में महिलाओं को विवाह या बच्चे पैदा करने में देरी का इसे पूरी तरह त्यागने का अधिकार।
  • दक्षिण कोरिया की एक तिहाई महिलाएं शादी नहीं करना चाहतीं।
  • 93% महिलाएं घर के काम व बच्चों की परवरिश को बोझ मानती हैं।
  • दक्षिण कोरिया में 2.5% बच्चे ही विवाद के बाहर पैदा होते हैं।
  • घरेलू जिम्मेदारियों में अधिक समानता की मांग।

जन्मदर बढ़ाने में जुटी सरकार

दक्षिण कोरिया की सरकार ने उच्च जन्मदर को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां लागू की हैं। इसमें बच्चों की देखभाल के लिए विदेशी घरेलू कामगारों की भर्ती करना, कर लाभ प्रदान करना और यहां तक कि 30 वर्ष की आयु तक तीन या अधिक बच्चे होने पर पुरुषों को अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट देने का प्रस्ताव करना। हालांकि, अब तक, इन उपायों का बहुत कम प्रभाव पड़ा है।

Pranjul Srivastava
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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