खड़ग प्रसाद शर्मा ओली उर्फ केपी ओली। चार बार नेपाल का प्रधानमंत्री रह चुका ये नेता अपने पद से इस्तीफा दे चुका है। वजह बनी है जेन जी प्रोटेस्ट। भ्रष्टाचार, भाई भतीजावाद और सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शुरू हुआ यह आंदोलन महज 24 घंटे में ही प्रधानमंत्री सहित कई बड़े मंत्रियों के इस्तीफे करवा चुका है। मरने वालों की संख्या 19 पहुंच चुकी है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के दुबई जाने की चर्चा है। लेकिन आखिर नेपाल में ऐसे हालात आए क्यों? क्या केपी शर्मा ओली का भविष्य भी शेख हसीना की तरह होने जा रहा है। नेपाल में इस वक्त जेन ज़ी आंदोलन के लिए विलेन नंबर 1 बने प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पूरी कहानी हम जानेंगे। इस कहानी के ज़रिए आप नेपाल के राजनीतिक उथल पुथल की कहानी को भी बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।
मुश्किल बचपन और नक्सलबाड़ी आंदोलन
1952 में एक गरीब ब्राह्मण घर में पैदा हुए केपी शर्मा ओली का बचपन काफी तकलीफों से गुज़रा। चार साल की उम्र में ही मां का देहांत हो गया। स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद ही बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन से ओली प्रभावित हो चुके थे. उनके एक दूर के चाचा रामनाथ दहल की वजह से ओली पूरी तरह वामपंथ के आकर्षण में घिर चुके थे।
ओली का सियासी सफर 14 साल की उम्र से शुरू हुआ जब वह 1966 में राजशाही और पंचायत व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन में कूद पड़े. 1970 में वह नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (CPN) में शामिल हुए लेकिन जल्द ही झापा आंदोलन (1970-73)में हिस्सा लेने के लिए गिरफ्तार हो गए. इस आंदोलन का मकसद सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ना था.
नेपाल में उन दिनों में राजशाही हुआ करती थी। राजा को लोग ईश्वर का प्रतिनिधि मानते थे। लेकिन ओली और उनके वामपंथी साथी नक्सलबाड़ी की तरह हथियारों के साथ क्रांति करने के हिमायती थे। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी जल्द ही बिखर गई लेकिन 1972 में ओली झापा विद्रोही गुट के सचिव बनाए गए। मोहन चंद्र अधिकारी, राम नाथ दहल जैसे लोग वामपंथी आंदोलन से आम लोगों को जोड़ने के हिमायती थे लेकिन अधिकांश सदस्य हथियारबंद क्रांति के समर्थक थे।
जब ओली ने ली भारत में शरण
आखिरकार चंद्र प्रकाश मैनाली ने पार्टी की कमान संभाली और ओली को बाहर का रास्ता दिखा दिया। अगले ही महीने उनके चाचा रामनाथ दहल की हत्या हो जाती है। इस दौरान जान बचाने के लिए केपी शर्मा ओली पहले बिराटनगर जाते हैं. लेकिन नेपाल में ओली की जान को खतरा था। लिहाजा वो मोहन चंद्र अधिकारी से बात करते हैं जो उस वक्त भारत के कानपुर में छुपे हुए थे. ओली भी कानपुर पहुंच जाते हैं। लेकिन 1973 में देश लौटते ही ओली को गिरफ्तार कर लिया जाता है। अगले 14 साल केपी शर्मा ओली नेपाल के अलग अलग जेलों में बिताते हैं। इसी दौरान उन्हें नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्स लेनिन) का सेंट्रल कमेटी मेंबर बनाया जाता है। इस दौरान ओली जेल में ही थे।
राजनेता केपी ओली का उदय और नेपाली क्रांति
1987 में जेल से रिहा होने के बाद ओली पार्टी की राजनीति में पूरी तरह एक्टिव हो जाते हैं। उन्हें लुंबिनी ज़ोन का प्रमुख बनाया जाता है। लेकिन नेपाल में 1960 से ही राजनीतिक पार्टियां प्रतिबंधित थीं। देश में सिर्फ पंचायत के चुनाव होते थे। फिर आता है 1990 का जनआंदोलन जिसमें कम्युनिस्ट पार्टियां हो या कांग्रेस सभी ने देश में लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ी। उस वक्त भी नेपाल की राजधानी में 2 लाख से अधिक लोग जमा हो गए थे। गोलियां चली थी। दर्जनों लोग मारे गए थे। प्रधानमंत्री का घर फूंक दिया गया था। राजा वीरेंद्र विक्रम की मूर्तियां तोड़ डाली गईं। आखिरकार राजा को झुकना पड़ा और नेपाल में मल्टी पार्टी डेमोक्रेसी की शुरुआत हुई। केपी शर्मा ओली झापा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बनते हैं। नेपाली कांग्रेस को बहुमत मिलता है लेकिन उनके प्रमुख नेता कृष्णा प्रसाद भट्टाराई अपना चुनाव काठमांडू से हार गए। उन्हें हराया था कम्युनिस्ट नेता मदन कुमार भंडारी ने। 1991 के चुनावों में जहां कांग्रेस को 112 सीटें आई थीं वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ने भी 69 सीटों पर कामयाबी दर्ज की थी। गिरजा प्रसाद कोइराला नेपाल के नये प्रधानमंत्री बनते हैं।
हिंदू राष्ट्र नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार
लेकिन 1994 तक नेपाल की आर्थिक हालत खस्ता हो चुकी थी। विपक्ष ने सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसी माहौल में कोइराला सरकार आंतरिक कलह का शिकार होती है और संसद में पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव में हार जाती है। दोबारा चुनाव होते हैं जिसमें 88 सीटों के साथ कम्युनिस्ट पार्टी सबसे बड़े दल के तौर पर उभरती है। अल्पमत की सरकार बनती है और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मनमोहन अधिकारी न सिर्फ नेपाल बल्कि एशिया के पहले चुने हुए कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री बनते हैं। नेपाल दुनिया की इकलौती राजशाही थी जहां कोई कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री चुना गया था। मनमोहन अधिकारी की इसी सरकार में केपी शर्मा ओली को गृह मंत्री बनाया गया। लेकिन यह सरकार अधिक दिन चलनी नहीं थी सो चली भी नहीं। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा राजशाही के अंदर इस लोकतंत्र को नकली मानता था। 1996 में ही नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का माओवादी धड़ा नेपाल में सरकार के खिलाफ शशस्त्र लड़ाई छेड़ देता है। नेपाल उसके बाद अगले 10 सालों तक माओवादियों की हिंसक क्रांति का गवाह बनता है।
हिंदू राष्ट्र से सेकुलर लोकतंत्र तक
2001 में राजा वीरेंद्र विक्रम सिंह की पूरे परिवार सहित हत्या हो जाती है। उनके छोटे भाई ज्ञानेंद्र नेपाल के राजा की गद्दी संभालते हैं। लेकिन राजा वीरेंद्र विक्रम सिंह की हत्या का शक उनके भाई पर भी था। जनता को नये राजा पर भरोसा नहीं था। ना ही राजनीतिक पार्टियों को। माओवादी तो मौका ढूंढ ही रहे थे तख्तापलट का। इसके बाद नेपाल में राजशाही के खिलाफ दूसरा बड़ा आंदोलन होता है 1990 के बाद। आखिरकार 2006 में राजा को हटा दिया जाता है। 2006 में नेपाल ने न सिर्फ राजा को हटाया बल्कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र से बदलकर धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की घोषणा भी कर दी जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर की चीज थी। राजशाही पूरी तरह समाप्त हो गई और राजा पर कई टैक्स लाद दिए गए। राजशाही का समर्थक बड़ा धड़ा इस फैसले से निराश हो गया क्योंकि अब उनके मुताबिक नेताओं को नियंत्रित करने के लिए कोई और शक्ति नहीं बची।
इस फैसले के बाद से लोग काफी निराश हो गए थे. नेपाल के स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि बिना किसी बहस के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह को सत्ता से बाहर करने पर उनके प्रति सहानभूति बढ़ गई थी. अब जब दूसरी ओर नेपाल भ्रष्टाचार से त्रस्त है, तब ऐसे में स्थानीय लोगों का मानना है कि देश में एक ऐसी ताकत होनी चाहिए, जो इन्हें रोक सके. आखिरकार नेपाल राजनीतिक अस्थिरता का ही शिकार हुआ और राजशाही हटने के बाद से 14 सरकारें और 10 प्रधानमंत्री देख चुका है। केपी शर्मा ओली कुल चार बार प्रधानमंत्री बन चुके हैं। पहली बार 2015-2016 में उसके बाद 2018-2021 और तीसरी बार 2021 में कुछ महीनों के लिए PM रह चुके हैं।15 जुलाई 2024 को ओली चौथी बार PM की कुर्सी पर काबिज़ हुए. ओली एक सख्त, राष्ट्रवादी और मेहनती लीडर के तौर पर देखे जाते रहे हैं। लेकिन उनके आलोचक उन्हें एक ऐसे चालबाज़ नेता के तौर पर देखते हैं जो सत्ता पाने के लिए हर हथकंडा आजमा सकता है।.
ओली: भारत से तकरार, चीन का यार!
भारत के साथ केपी शर्मा ओली का रिश्ता खट्टा-मीठा रहा है। यह अलग बात है कि इसी भारत ने उनकी दो बार जान बचाई है। पहली 70 के दशक में जब वो अपनी जान बचाने के लिए कानपुर आ गए थे। दूसरी 2007 में जब दिल्ली के ही अपोलो असप्ताल में उनकी किडनी ट्रांसप्लांट का ऑपरेशन हुआ। लेकिन ओली का दिल हमेशा चीन के लिए धड़कता रहा। 2015 में सीमा नाकाबंदी के मुद्दे पर ओली ने भारत पर उनकी सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया। इसके अलावा लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाने वाला विवादित नक्शा जारी किया, जिसे भारत ने पूरी तरह खारिज कर दिया. हालांकि दोनों देश बातचीत की टेबल पर बैठे लेकिन तनाव बरकरार रहा। ओली ने चीन के साथ रिश्ते मजबूत किए, जिससे भारत के साथ और ठन गई.
Gen Z क्रांति और ओली की विदाई
ओली क्रांति के रास्ते सत्ता पर आए और क्रांति के ही रास्ते उनकी सत्ता से विदाई भी हो गई है। ओली मीडिया के प्रति असहिष्णु रहे हैं।भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद के आरोपों से घिरे रहे हैं। उनकी चीन से गलबहियां और भारत से दुश्मनी भी नेपाल में बड़ी संख्या में मौजूद मधेशी समुदाय को रास नहीं आता है। इसी साल नेपाल में राजशाही वापस लाने के लिए भी प्रोटेस्ट हुए थे। नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग भी उठ रही है। इस बीच जेन जी आंदोलन के रास्ते ओली अपनी सत्ता गंवा चुके हैं। हालांकि आंदोलन के दौरान दोनों तरफ से हिंसा हुई। पुलिस की गोलियों से प्रदर्शनकारी मारे गए। इसके बाद प्रदर्शनकारियों के गुस्से का शिकार मंत्री से लेकर बड़ी संख्या में सरकारी अमले से जुड़े लोग हुए। यहीं महात्मा गांधी की याद आती है जो अहिंसक आंदोलनों का पूरा शास्त्र सिखा कर गए हैं। लेकिन शायद जेन ज़ी गांधी से ज्यादा गूगल से प्रभावित है। बहरहाल ये पहला आंदोलन है जिसे जेन ज़ी आंदोलन कहा गया है। देखना होगा कि इसकी नियति क्या होती है।
