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Bangladesh Violence: भीड़ ने खदेड़ा, घेरा और पीटने लगे; ऐसे हुई बांग्लादेशी एक्टर शांतो खान और उसके पिता की हत्या

Bangladesh: बांग्लादेशी एक्टर शांतो और उसके पिता और फिल्म निर्माता सलीम को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। घर से निकलकर अभिनेता और उसके पिता भाग रहे थे, तभी उन्हें भीड़ ने घेर लिया। इस बीच एक्टर ने बंदूक से फायरिंग करके पहले तो भाग गए, लेकिन फिर उन्हें पकड़कर लोगों ने मार डाला।

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अभिनेता शांतो खान और उसके पिता सलीम खान।

Photo : Times Now Digital
KEY HIGHLIGHTS
  • बांग्लादेशी अभिनेता शांतो खान और उनके पिता सलीम खान की पीट-पीटकर हत्या
  • फिल्म निर्माता सलीम खान ने टॉलीवुड सितारों के साथ कई बंगाली फिल्में बनाई थीं
  • अभिनेता शांतो खान और उनके पिता की हत्या से कोलकाता फिल्म इंडस्ट्री में मातम

Brutal Lynching of Bangladeshi Actor and His Father: प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे की खबर के बाद बांग्लादेश के चांदपुर में गुस्साई भीड़ ने बांग्लादेशी अभिनेता शांतो खान (Shanto Khan) और उनके पिता सलीम खान की पीट-पीटकर हत्या कर दी। टॉलीवुड इंडस्ट्री से जुड़े एक उल्लेखनीय फिल्म निर्माता सलीम कई फिल्मों पर काम कर रहे थे, जिनमें देव अभिनीत 'कमांडो' भी शामिल थी। पिता और बेटे ने गोलीबारी करने के बाद भागने की कोशिश की, लेकिन वो पकड़े गए और भीड़ ने उन्हें मार डाला।

भीड़ ने एक्टर और उसके पिता की हत्या की

बांग्लादेशी एक्टर शांतो खान और उनके प्रोड्यूसर पिता सलीम खान को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग से सलीम जुड़े थे। उन्होंने हसीना के पिता मुजीब-उर-रहमान पर बनी फिल्म प्रोड्यूस भी की थी। इस घटना से पहले सोमवार दोपहर को कोलकाता में सलीम के साथ उनकी फिल्मों में काम करने वाले टॉलीवुड के कार्यकारी निर्माता अरिंदम दास ने उनसे बात भी की थी। आपको बताते हैं कि आखिर उनकी हत्या कैसे और कहां की गई।

कैसे, कहां हुए एक्टर और उसके पिता की हत्या?

द डेली स्टार की एक रिपोर्ट के अनुसार, चांदपुर में लक्ष्मीपुर यूनियन परिषद के अध्यक्ष सलीम खान और उनके अभिनेता बेटे शांतो खान (Shanto Khan Bangladesh) की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। हसीना के इस्तीफे की खबर फैलते ही सलीम और उनके बेटे अपने गांव से भागकर बलिया यूनियन के फरक्काबाद बाजार चले गए। जब लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो वे गोलियां चलाकर भागने में कामयाब हो गए। जब वे पास के बागराबाजार इलाके में पहुंचे, तो गुस्साई भीड़ ने उन्हें पकड़ लिया और पीट-पीटकर मार डाला। चांदपुर सदर पुलिस स्टेशन के प्रभारी शेख मोहसिन आलम ने मामले की पुष्टि की।

अरिंदम दास ने बताया, 'मैंने सोमवार को सलीम भाई (Salim Khan Bangladesh) से बात की थी। कुछ ही घंटों बाद, 'कमांडो' के निर्देशक शमीम अहमद रोनी ने मुझे अमेरिका से फोन किया और पूछा कि क्या मुझे कोई खबर मिली है। सलीम भाई के बारे में एक दुखद खबर सुनकर उनके हाथ कांप रहे थे। जब मैंने जांच की, तो जो पता चला, उससे मैं स्तब्ध रह गया।' फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई दिग्गजों ने इस घटना पर सदमा और दुख व्यक्त किया है।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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