बेटे की दवा खत्म होने को आई तो तड़प उठा पिता, साइकिल से 3 दिन में तय की 300 KM की दूरी 

समाचार एजेंसी एएनआई के साथ बातचीत में आनंद ने कहा, 'मैंने अपने बेटे की दवाओं के बारे में पता किया लेकिन वे दवाएं यहां उपलब्ध नहीं थीं। मेरे बेटे की दवा की खुराक एक दिन भी छोड़ी नहीं जा सकती।'

Mysore: Man Travels 112 Km on Cycle to Get Medicines for Son
मैसुरू में पिता ने अपने बेटे के लिए 300 किलोमीटर साइकिल चलाई।  |  तस्वीर साभार: ANI

मुख्य बातें

  • मैसुरु के एक गांव में रहने वाले आनंद के बेटे की दवाएं खत्म होने को आई थीं
  • मैसुरु मं दवाओं के न मिलने पर वह साइकिल से बेंगलुर के लिए रवाना हुए
  • तीन दिन में तय की करीब 300 किलोमीटर की दूरी, लोग कर रहे प्रशंसा

बेंगलुरु : संतान के प्रेम में इंसान बड़ी से बड़ी मुश्किलों एवं बाधाओं को पार कर जाता है। मैसुरु के एक गांव में रहने वाले 45 साल के आनंद ने जिंदादिली की एक ऐसी ही मिसाल पेश की है। अपने बीमार बच्चे की दवा लाने के लिए उन्होंने तपती धूप में करीब 300 किलोमीटर साइकिल चलाई। आनंद का लड़का 'स्पेशल चाइल्ड' की श्रेणी में आता है और उसकी दवा की एक भी खुराक छोड़ी नहीं जा सकती। आनंद की इस दिलेरी की पूरे इलाके में चर्चा हो रही है। लोग उनकी सराहना एवं प्रशंसा कर रहे हैं तो कुछ लोग सिस्टम की आलोचना कर रहे हैं।  

मैसुरू में सार्वजनिक परिवहन बंद है
कोरोना संक्रमण पर रोक लगाने के लिए कर्नाटक में लॉकडाउन लागू है। ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक परिवहन बंद हैं। आनंद के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह निजी वाहन कर मैसुरु के अपने गांव से बेंगलुरु शहर जाएं। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले आनंद ने अपने बेटे की दवा लाने के लिए साइकिल से बेंगलुरु जाने का फैसला किया। समाचार एजेंसी एएनआई के साथ बातचीत में आनंद ने कहा, 'मैंने अपने बेटे की दवाओं के बारे में पता किया लेकिन वे दवाएं यहां उपलब्ध नहीं थीं। मेरे बेटे की दवा की खुराक एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ी जा सकती। फिर मैं बेंगलुरु के लिए रवाना हुआ। दवा लाने में मुझ तीन दिन का समय लगा।'

कोप्पलू गांव के रहने वाले हैं आनंद
आनंद ने आगे कहा, 'डॉक्टरों ने मुझे भरोसा दिया है कि मेरे बेटे ने अगर 18 साल की उम्र तक लगातार दवा लिया तो वह अन्य बच्चों की तरह सामान्य हो जाएगा। बिना किसी और बात का ख्याल किए मैं साइकिल से बेंगलुरु के लिए निकल पड़ा।' आनंद मैसुरु के टी नरसीपुर तालुक के कोप्पलू गांव के रहने वाले हैं। 

मंगलवार को वापस घर पहुंचे
दैनिक मजदूरी करने वाले आनंद ने कहा कि उनके बेटे की दवाएं बुधवार तक खत्म हो जातीं। इसे देखते हुए उन्होंने शनिवार को अपनी साइकिल से यात्रा शुरू की। आनंद ने कहा, 'मैं रात तक बेंगलुरु पहुंच गया। वहां पहुंचने पर मैं एक मंदिर में सोया। अगले दिन अस्पताल से मैंने दवाएं लीं, इसके बाद मंगलवार तक घर लौट आया।' 

सोशल मीडिया पर आनंद की प्रशंसा
बेटे के लिए साइकिल से करीब 300 किलोमीटर की दूरी करने पर सोशल मीडिया पर आनंद की सराहना हो रही है। कुछ लोगों ने कहा कि अपने बच्चे के लिए पिता ही ऐसा काम कर सकता है। तो कुछ लोगों ने सरकार से आनंद की मदद करने की अपील की है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने व्यवस्था की आलोचना की है। 


 

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