Mother's Day:मां..ममता का आंचल, 'मदर्स डे' पर लाज़िमी है मुनव्वर राना का 'मां' को समर्पित ये 'मशहूर शेर'

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated May 9, 2021, 10:00 AM IST

Munawar Rana Shayari on Maa:मदर्स डे (Mother's Day) 9 मई को मनाया जा रहा है कहते हैं कि मां (Maa) को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, कोई भी मां की ममता का कर्ज जिंदगी भर नहीं उतार सकता। 

Mother's Day:मां..ममता का आंचल, 'मदर्स डे' पर लाज़िमी है मुनव्वर राना का 'मां' को समर्पित ये 'मशहूर शेर'

मदर्स डे (mother's day) ग्राफटन वेस्ट वर्जिनिया में एना जार्विस के द्वारा समस्त माताओं तथा मातृत्व के लिए खास तौर पर पारिवारिक एवं उनके आपसी सम्बन्धों को सम्मान देने के लिए आरम्भ किया गया था। यह दिवस अब दुनिया के हर कोने में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता हैं। 

एना जार्विस को अपनी माँ से खास लगाव था। जार्विस अपनी माँ के साथ ही रहती थी और उन्होने कभी शादी भी नहीं की थी। माँ के गुजर जाने के बाद एना ने माँ से प्यार जताने के लिए मदर्स डे की शुरूआत की, तब से हर साल मई माह के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है।

इस जहां में मां से ज्यादा अनमोल कुछ भी नहीं है और इस दुनिया में मां की तुलना किसी से भी नहीं की जा सकती दुनिया में कोई भी मां की जगह नहीं ले सकता,  आप शायरी या कविता या जिस भी जरिए से आप चाहें अपनी मां के प्रति अपने प्यार और सम्मान को जता सकते हैं। 

शायर मुनव्वर राना ने तो मां को लेकर बेहद मर्मस्पर्शी कविताएं और शायरियां लिखी हैं, आप भी देखें उनका ये मां को समर्पित ये मशहूर शेर-

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ

ख़ुद को इस भीड़ में तन्हा नहीं होने देंगे
माँ तुझे हम अभी बूढ़ा नहीं होने देंगे

यहीं रहूँगा कहीं उम्र भर न जाउँगा
ज़मीन माँ है इसे छोड़ कर न जाऊँगा

अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कु्छ भी नहीं होगा
मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है

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मैथिलीशरण गुप्त की "मां" (Story on Maa) पर लिखी ये कहानी भी आपको मां की यादों से सराबोर कर देगी-


"माँ कह एक कहानी।"
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?"
"कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।"




"तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी।"
"जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।"

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।"
"लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।"

"गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खग शर से, हुई पक्ष की हानी।"
"हुई पक्ष की हानी? करुणा भरी कहानी!"

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।"
"लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।"

"मांगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।"
"हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।"

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी।"
"सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।"

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?
कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लूँ तेरी बानी"
"माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।

कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।"
"न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।"

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