Mothers day poem: मुनव्वर राना की कलम में मां की अद्भुत कविताओं का जादू

Mothers day poem in hindi: मां पर कविता और गजलों का जिक्र हो और मुनव्वर राना याद ना आएं यह मुमकिन नहीं। वह पहले ऐसे शायर हैं जिन्होंने गजलों में मां को बहुत अहमियत दी है।

Mother
सांकेतिक फोटो (तस्वीर साभार- unsplash) 

नई दिल्ली: आज मदर्स डे है यानी वो दिन जो ममतामयी मां को समर्पित होता है। दुनिया का कोई भी जीव हो वो अपनी मां के प्रति सदैव ऋणी होता है। क्योंकि मां अपने शिशु को ना सिर्फ महीनों गर्भ में रखती है बल्कि लालन-पालन की पूरी जिम्मेदारी उठाती है। अपने बच्चे के प्रति वह अनेक जिम्मेदारियां उठाती है जिसमें उसका अथक त्याग और पूर्ण समर्पण होता है। मां को लेकर कई शायरों ने शेर लिखा है, कई कवियों ने कविताएं लिखी है। मुनव्वर राना की कलम ने मां की अद्भुत ममता को उकेरा है।

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में मां आई

यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया
मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के मां आई

अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता
बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहां आई

किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद
उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआं आई

मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी
तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूं उर्दू जबां आई

क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता
ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या खिजां आई

घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं
उड़ाने के लिए आंधी अगर नाम-ओ-निशां आई

कभी ऐ खुश-नसीबी मेरे घर का रुख भी कर लेती
इधर पहुँची उधर पहुंची यहाँ आई वहां आई

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हँसते हुए मां बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक से मिट्टी नहीं खाते

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है मां बच्चे समझते हैं

हवा दुखों की जब आई कभी खिजां की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी मां की तरह

सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी मां कहते हैं

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी मां की तरह खुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों मां ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात मां की दुआ से उलझ पड़े

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक मां है जो मुझसे खफा नहीं होती

तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा

मां को समर्पित देश और दुनिया की साहित्य की किताबों में लाखों कहानियां है। मुनव्वर राना एक उम्दा शयर है जिन्होंने मां पर बेमिसाल कविताएं लिखी है जो दिल को छू लेती है। मां को लेकर उनकी कविताओं बेहद मर्मस्पर्शी और संदेवनशील है। उनकी कविताएं मां के साथ उन पलों का एहसास कराती है जो मां की ममता,त्याग और समर्पण से जुड़ी होती है।

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