अगर आप DTH या केबल टीवी पर किसी पेड चैनल के लिए पैसे चुकाते हैं, लेकिन वही चैनल स्मार्ट टीवी ऐप पर मुफ्त में देख सकते हैं, तो आने वाले समय में यह व्यवस्था बदल सकती है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) के नए ड्राफ्ट टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीविजन, रेडियो एंड एसोसिएटेड सर्विसेज) रूल्स, 2026 ने इसी मुद्दे पर नई बहस छेड़ दी है। सरकार ने 12 जून को 43 पेज का ड्राफ्ट जारी किया है और इस पर 27 जुलाई 2026 तक सुझाव मांगे हैं।
पुराने नियमों को एक फ्रेमवर्क में लाने की तैयारी
सरकार का कहना है कि इस ड्राफ्ट का उद्देश्य 2001 से लागू विभिन्न प्रसारण दिशानिर्देशों को टेलीकम्युनिकेशन एक्ट, 2023 के तहत एक ही नियमावली में शामिल करना है, हालांकि प्रसारकों का मानना है कि ड्राफ्ट के कुछ प्रावधान इंटरनेट के जरिए टीवी चैनल दिखाने वाले ऐप्स पर भी DTH और केबल जैसे नियम लागू कर सकते हैं।
आखिर विवाद किस बात पर है?
ड्राफ्ट के नियम 2(21) में इंटरनेट को भी टीवी प्रसारण के माध्यम की श्रेणी में रखा गया है। उद्योग का कहना है कि इससे इंटरनेट पर टीवी चैनल स्ट्रीम करने वाले ऐप्स भी DTH और केबल ऑपरेटरों की तरह रेगुलेट हो सकते हैं।
वहीं, नियम 26(1)(b) में कहा गया है कि टीवी चैनलों का वितरण केवल अधिकृत प्लेटफॉर्म जैसे DTH, केबल, HITS और IPTV ऑपरेटरों के जरिए ही किया जा सकता है। ब्रॉडकास्टर्स को चिंता है कि यदि इस नियम में बदलाव नहीं हुआ तो वे अपने ही टीवी चैनलों को अपनी वेबसाइट, मोबाइल ऐप या स्मार्ट टीवी ऐप पर सीधे स्ट्रीम नहीं कर पाएंगे।
TRAI पहले से कर रहा है नए मॉडल पर विचार
इंटरनेट आधारित टीवी सेवाओं को लेकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) भी अलग से विचार कर रहा है। अप्रैल 2026 में TRAI ने Application-based Linear Television Distribution (ALTD) पर एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया था।
इसमें उन ऐप्स को शामिल किया गया है जो स्मार्ट टीवी, मोबाइल और वेब ब्राउज़र पर तय समय के अनुसार टीवी चैनलों जैसी लाइव स्ट्रीमिंग उपलब्ध कराते हैं। इसमें FAST (Free Ad-Supported Streaming Television) चैनल भी शामिल हैं।
DTH और ऐप्स के लिए एक जैसे नियम क्यों चाहते हैं कुछ विशेषज्ञ?
कुछ उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक ही चैनल DTH पर पेड है और वही स्मार्ट टीवी ऐप पर मुफ्त उपलब्ध है, तो इससे बाजार में असमान प्रतिस्पर्धा पैदा होती है। उनका कहना है कि DTH, केबल और IPTV ऑपरेटरों को लाइसेंस, फीस, कंटेंट नियम और शिकायत निवारण जैसी कई शर्तों का पालन करना पड़ता है, जबकि ऐप आधारित सेवाओं पर ऐसी बाध्यता नहीं है। इससे दर्शकों को भी अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर समान सुरक्षा और पारदर्शिता नहीं मिलती।
ब्रॉडकास्टर्स और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म क्यों कर रहे विरोध?
ब्रॉडकास्टर्स और स्ट्रीमिंग कंपनियों का तर्क है कि इंटरनेट आधारित ऐप्स को DTH और केबल की तरह रेगुलेट करना उचित नहीं होगा। उनका कहना है कि DTH और केबल ऑपरेटर सैटेलाइट, स्पेक्ट्रम और केबल नेटवर्क जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर का संचालन करते हैं, जबकि मोबाइल या स्मार्ट टीवी ऐप केवल मौजूदा इंटरनेट नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में ऐप डेवलपर्स या ब्रॉडकास्टर्स पर लाइसेंस, बैंक गारंटी, सिक्योरिटी क्लियरेंस और अन्य अनुपालन की शर्तें लागू करना उनके लिए अतिरिक्त बोझ साबित हो सकता है।
अब सरकार के सामने क्या है सबसे बड़ा सवाल?
इस पूरे विवाद का केंद्र यही है कि क्या किसी टीवी चैनल के नियम उसके कंटेंट के आधार पर तय होने चाहिए या फिर उस प्लेटफॉर्म के आधार पर, जिसके जरिए वह दर्शकों तक पहुंच रहा है? यदि सरकार सभी प्लेटफॉर्म पर एक जैसे नियम लागू करती है, तो भविष्य में स्मार्ट टीवी ऐप्स पर मुफ्त में उपलब्ध कुछ पेड चैनलों की व्यवस्था बदल सकती है, हालांकि अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। सरकार को मिले सुझावों, TRAI की सिफारिशों और ड्राफ्ट नियमों में संभावित संशोधनों के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इंटरनेट आधारित टीवी सेवाओं के लिए अंतिम नियम क्या होंगे।
