पाकिस्तान ने भले ही फीफा विश्व कप में कभी शिरकत नहीं की लेकिन वो अप्रत्यक्ष तौर पर विश्व कप में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है। मौजूदा दौर में दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल के महाकुंभ का आयोजन पाकिस्तान के बगैर तकरीबन नामुमकिन सा हो गया है। ये सुनकर आपको भी आश्चर्य होगा, लेकिन ये दावा पूरी तरह सही है। क्योंकि फीफा विश्व कप में जिस गेंद के इर्दगिर्द सभी खिलाड़ी धमाचौकड़ी मचाते नज़र आएंगे उसका निर्माण पाकिस्तान में होता है 44 साल से ये सिलसिला चल रहा है। जानिए क्यों मेड इन पाकिस्तान गेंदों का फीफा विश्व कप में होता है इस्तेमाल?
सियालकोट में बनती है गेंद
अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की साझा मेजबानी में आयोजित होने जा रहे फीफा विश्व कप 2026 में उपयोग की जाने वाली ऑफीशियल फुटबॉल का नाम ट्रायोंडा (Trionda) है। स्पेनिश में इसका अर्थ होता है तीन लहरें। इस हाईटेक फुटबॉल को एडिडास ने डिजायन किया है और निर्माण पाकिस्तान के सियालकोट स्थित फॉरवर्ड स्पोर्ट्स नाम की कंपनी ने किया है। आगामी फीफा विश्व कप में इस्तेमाल होने जा रही गेंद की डिजायन में तीनों मेजबान देशों की झलक नजर आती है। इसके पैनल में नीले, लाल और हरे रंग का इस्तेमाल किया गया है। मेजबान देशों से जुड़े खास निशान जैसे कि स्टार, मैपल लीफ और ईगल शामिल हैं।
पूरी तरह हाईटेक है ट्रायोंडा
ये फुटबॉल हाईटेक है, इसमें मोशन सेंसर लगा है जो प्रति सेकेंड 500 बार डेटा भेजता है। इस तकनीक से मैच ऑफीशियल्स को ऑफसाइड के फैसले लेने और वीडियो असिस्टेंट रेफरी(VAR) में मदद मिलती है। इसकी सटीक बनावट है जो वर्ल्ड कप के इतिहास में सबसे कम पैनल वाला डिज़ायन है। ये डिज़ायन गेंद की फ्लाइट, स्टेबिलिटी और एरोडायनमिक्स को सुनिश्चित करता है।
पहली बार कब हुआ मेड इन पाकिस्तान गेंद का इस्तेमाल
फीफा विश्व कप में पहली बार मेड इन पाकिस्तान फुटबॉल का इस्तेमाल साल 1982 में हुआ था। स्पेन में आयोजित विश्व कप में टैंगो नाम की फुटबॉल का उपयोग हुआ था। वो पाकिस्तान के सियालकोट में बनी थी। उसके बाद साल 2014, 2018, 2022 और 2026 में फीफा विश्व कप में सियालकोट में बनी फुटबॉल का इस्तेमाल हुआ। साल 2014 में ब्राजील में बज़ूका, 2018 में रूस में टेलस्टार 18, 2022 में कतर में अल रिहला और इस बार ट्रायोंडा का उपयोग हो रहा है।
100 साल से सियालकोट में बन रही है फुटबॉल
सियालकोट में चमड़े की कारीगरी का इतिहास 100 साल से पुराना है। यहां हाथ से चमड़े का उत्पाद बनाने का काम होता है। यहां के कारीगरों को बारीक सिलाई करने में महारथ हासिल है। यह दुनियाभर के अन्य जगहों में बनने वाले फुटबॉल से पाकिस्तानी फुटबॉल को अलग करती है। सियालकोट में बनी फुटबॉल की गुणवत्ता भी उच्च स्तर की है। सियालकोट में बनी गेंद फीफा के कड़े मानकों में पूरी तरह खरी उतरती है। जिसमें आकार, वजन, उछाल और दबाव शामिल है इसी वजह से एडिडास जैसी दिग्गज कंपनियां यहीं से फीफा के वैश्विक आयोजनों के लिए फुटबॉल का निर्माण कराती हैं। पाकिस्तान में दुनियाभर में उपयोग होने वाली सत्तर प्रतिशत फुटबॉल का निर्माण होता है। फुटबॉल के मैदान पर पाकिस्तान की अमिट छाप बनती जा रही है।
