श्मशान से लौटते वक्त पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखना चाहिए, जानिए इसके पीछे का असली कारण
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Dec 21, 2025, 05:11 PM IST
Cremation Rules: आपने अक्सर अपने बड़ों से सुना होगा कि श्मशान से लौटते वक्त कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए, लेकिन क्या आप इसके पीछे का कारण जानते हैं? आखिर क्यों श्मशान से आते वक्त पीछे मुड़कर देखना मना होता है। इसका कारण आपको गरुड़ पुराण में मिलेगा। आइए जानते हैं कि श्मशान से आते वक्त पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखा जाता है?
श्मशान से आते समय न करें ये काम
Cremation Rules: हमने अक्सर सुना है कि श्मशान से आते समय कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए। दरअसल हिंदू धर्म में जीवन को एक चक्र माना जाता है, जहां जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न संस्कारों का महत्व है। कुल 16 संस्कारों में से अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जो मृतक की आत्मा को मुक्ति दिलाने का माध्यम है। गरुड़ पुराण में मौत, आत्मा की यात्रा और अंतिम रस्मों के बारे में बताया गया है।
इस ग्रंथ में बताया गया है कि मृत्यु के बाद शरीर पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) में विलीन हो जाता है, लेकिन आत्मा का सफर जारी रहता है। अंतिम संस्कार के दौरान कई नियमों का पालन करना जरूरी है, ताकि आत्मा बिना किसी बाधा के परलोक पहुंच सके। इनमें से एक प्रमुख मान्यता श्मशान घाट से लौटते समय पीछे मुड़कर न देखना भी है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक तथा भावनात्मक कारण हैं। आइए जानते है कि श्मशान से आते समय पीछे पलटकर क्यों नहीं देखना चाहिए।
श्मशान घाट से पीछे मुड़कर न देखने की मान्यता और उसके कारण
हिंदू परंपरा में अंतिम संस्कार के बाद श्मशान से लौटते समय कभी पीछे नहीं देखना अशुभ माना जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, दाह संस्कार के तुरंत बाद मृतक की आत्मा कुछ समय तक श्मशान में ही रहती है, जहां वह अपने प्रियजनों को देखती है। यदि कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर देखता है, तो आत्मा के मन में मोह जागता है और वह परिवार के साथ लौटने की कोशिश कर सकती है, जिससे उसका मोक्ष प्राप्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।
यह काफी भावुक क्षण होता है, क्योंकि आत्मा अपने सांसारिक बंधनों से मुक्त होना चाहती है, लेकिन परिवार का स्नेह उसे रोक सकता है। वहीं, दक्षिण भारत में इस मान्यता का और सख्त पालन होता है, जहां चिता जलाने के बाद सभी बिना पीछे देखे ही लौट जाते हैं। यह परंपरा न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे परिवार वाले मृतक की याद से जल्दी उबर पाते हैं और जीवन की ओर ध्यान केंद्रित करते हैं। माना जाता है कि यदि इस नियम की अनदेखी की जाती है, तो घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश कर सकती है, जिससे स्वास्थ्य या आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
यदि गलती से पीछे मुड़कर देख लिया तो क्या करें?
हर संभव प्रयास करना चाहिए कि श्मशान से लौटते समय पीछे न देखा जाए, लेकिन यदि अनजाने में ऐसा हो जाए तो गरुड़ पुराण और अन्य शास्त्रों में बताए उपाय अपनाएं। घर पहुंचकर सबसे पहले अग्नि के पास हाथ-पैर सेंकें, फिर पत्थर, लोहा और जल को स्पर्श करें। उसके बाद एक पत्थर पीछे की ओर फेंकें और चारों दिशाओं में जल छिड़कें। नीम की पत्तियां चबाकर थूकना या हरी मिर्च खाकर मुंह साफ करना भी फायदेमंद है। अंत में तुरंत स्नान करें, ताकि कोई नकारात्मक ऊर्जा शरीर या घर में न बचे। ये उपाय आत्मा को शांत करने और परिवार को सुरक्षा प्रदान करने के लिए हैं।
अंतिम संस्कार में करने चाहिए ये काम
गरुड़ पुराण के अनुसार सूर्यास्त के बाद कभी दाह संस्कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि रात में आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती और वह भटक सकती है। उत्तर भारत में यह नियम सख्ती से पालन किया जाता है, जहां रात होने पर शव को अगले दिन तक रखा जाता है। वहीं, महिलाओं को श्मशान घाट जाने की मनाही है, क्योंकि उन्हें भावनात्मक रूप से कमजोर माना जाता है और उनका रोना आत्मा की शांति में बाधा डाल सकता है।
हालांकि, आधुनिक समय में यदि कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो, तो महिलाओं को अंतिम रस्में करती हैं। इसके अलावा, शव को साफ वस्त्र पहनाकर, फूल, चंदन और विशेष लकड़ियों से चिता सजानी चाहिए। चिता पर रखने से पहले परिजनों को परिक्रमा करनी चाहिए, जो अंतिम विदाई का प्रतीक है। दाह के बाद घर को गंगा जल से शुद्ध करना जरूरी है, ताकि कोई अशुद्धि न रहे।
गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार का महत्व
गरुड़ पुराण में मौत के बाद की रस्मों के बारे में बताया गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार मृत शरीर को पहले शुद्ध किया जाता है, फिर जमीन पर रखा जाता है। इसमें मृत शरीर को गंगा जल से स्नान कराना और चंदन लगाया जाता है, ताकि आत्मा को शांति मिले। गरुड़ पुराण के अनुसार, मौत के बाद 13 दिनों तक गर्भवास की रस्में की जाती हैं, जिसमें पिंडदान और तर्पण प्रमुख हैं।
इनसे मृतक की आत्मा को भोजन और जल मिलता है और वह यमलोक की ओर प्रस्थान करती है। वहीं, अचानक मौत (दुर्घटना या हिंसा से) होने पर विशेष रस्म जैसे नारायण बली करनी चाहिए, ताकि आत्मा को पार लगाया जा सके। यह मान्यता आज भी भारत के कई हिस्सों में प्रचलित है, जहां परिवार वाले इन रस्मों को सख्ती से निभाते हैं ताकि पूर्वजों की आत्मा को शांति मिले और वंश में कोई दोष न आए।