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वट सावित्री व्रत कथा 2026: कब और कैसे करें वट सावित्री व्रत का पारण, जानें व्रत के पारण का सही समय और पारण विधि

सावित्री व्रत कब है 2026 (Vat Savitri Vrat kab hai) वट सावित्री का व्रत कैसे किया जाता है, व्रत कथा, पूजा विधि, सामग्री सूची, पूजन का समय, सत्यवान सावित्री की कहानी LIVE Updates:


Vat Savitri Vrat 2026 Puja Muhurat: वट सावित्री व्रत पूजा का मुहूर्त
वट सावित्री की और भी जानकारी से पहले आपको वट सावित्री व्रत का मुहूर्त बता दें-जैसा कि शास्त्रो में बताया गया है कि ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए।
16 मई को सुबह 5 बजकर 12 मिनट से अमावस्या तिथि लग जाएगी।
16 मई की ही मध्य रात को 1 बजकर 31 मिनट पर अमावस्या तिथि समाप्त होगी।
सोभाग्य योग 10 बजकर 26 मिनट तक रहेगा।
शुभ चौघड़िया 7 बजकर 11 मिनट से 8 बजकर 53 मिनट।
चल चौघडिया 12 बजकर 17 मिनट से 1 बजकर 59 मिनट।
अभिजीत मुहूर्त 12 बजे से 12 बजकर 54 मिनट।
नोट पूजा का शुभ समय सुबह में सौभाग्य योग में 10 बजकर 26 मिनट तक उत्तम रहेगा। जबकि दोपहर में 12 बजे से 12 बजकर 54 मिनट तक समय रहेगा विशेष रूप से शुभ रहेगा।

वट सावित्री व्रत के पारण का समय:
वट सावित्री व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त में किया जाता है। पारण का शुभ मुहूर्त 17 मई की सुबह 5 बजकर 58 मिनट से 7 बजे तक रहेगा।

वट सावित्री व्रत 2026 की तारीख को लेकर इस बार महिलाओं के बीच कंफ्यूजन बना हुआ है। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि वट सावित्री व्रत किस तारीख पर रखा जाएगा, तो यहां आपको सही तिथि, पूजा मुहूर्त और पारण समय की पूरी जानकारी मिल जाएगी। इसके साथ ही आगे पढ़ें सत्यवान-सावित्री की पौराणिक कथा, पूजा विधि और व्रत में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की पूरी लिस्ट। LIVE Updates में जानिए वट सावित्री व्रत 2026 से जुड़ी हर जरूरी जानकारी आसान और साफ भाषा में। जानें बरगद के पेड़ की पूजा कैसे होती है और कौन से रंग की साड़ी इसमें पहनी जाती है।


वट सावित्री व्रत में करें यह पावन आरती, मिलेगा अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद:


अश्वपती पुसता झाला।। नारद सागंताती तयाला।।

अल्पायुषी स त्यवंत।। सावित्री ने कां प्रणीला।।
आणखी वर वरी बाळे।।मनी निश्चय जो केला।।

आरती वडराजा।।

दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री।

भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा ।।

ज्येष्ठमास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशी ।।

त्रिरात व्रत करूनीया। जिंकी तू सत्यवंताशी।

आरती वडराजा ।।

स्वर्गावारी जाऊनिया। अग्निखांब कचळीला।।

धर्मराजा उचकला। हत्या घालिल जीवाला। येश्र गे पतिव्रते। पती नेई गे आपुला।।

आरती वडराजा ।।

जाऊनिया यमापाशी। मागतसे आपुला पती।

चारी वर देऊनिया। दयावंता द्यावा पती।

आरती वडराजा ।।

पतिव्रते तुझी कीर्ती। ऐकुनि ज्या नारी।।

तुझे व्रत आचरती। तुझी भुवने पावती।।

आरती वडराजा ।।

पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती।।

स्वर्गी पुष्पवृष्टी करूनिया। आणिलासी आपुला पती।।

अभय देऊनिया। पतिव्रते तारी त्यासी।।

आरती वडराजा ।।

Medha ChawlaUpdated May 16, 2026, 11:55 IST
वट सावित्री व्रत कथा 2026: कब और कैसे करें वट सावित्री व्रत का पारण, जानें व्रत के पारण का सही समय और  पारण विधि

वट सावित्री व्रत कथा 2026: कब और कैसे करें वट सावित्री व्रत का पारण, जानें व्रत के पारण का सही समय और पारण विधि

सावित्री व्रत कब है 2026 (Vat Savitri Vrat kab hai) Vrat Katha, Puja Vidhi, Samagri List, Pujan Ka Samay, Satyavan Savitri ki kahani LIVE Updates: वट सावित्री व्रत 2026 को लेकर इस बार सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह व्रत 16 मई को रखा जाएगा या 17 मई को। हिंदू पंचांग के अनुसार वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर मनाया जाता है, इसलिए इसे ज्येष्ठ अमावस्या व्रत भी कहा जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं। साल 2026 में ज्येष्ठ अमावस्या 16 मई, शनिवार को पड़ रही है, इसलिए उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में इसी दिन वट सावित्री व्रत मनाया जाएगा। व्रत के दौरान महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उसके चारों ओर धागा बांधकर परिक्रमा लगाती हैं। जानें पूजा में कौन से रंग की साड़ी पहनें। कैसे करें वट वृक्ष की पूजा।

शनि जयंती की पूजा सामग्री | Vat Savitri Aarti In Hindi Lyrics: वट सावित्री आरती | बड़ अमावस्या की कथा

वट सावित्री व्रत की कथा:

पौराणिक कथाओं के अनुसार मद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान नहीं थी। संतान सुख की इच्छा में राजा ने कठोर तपस्या और मां सावित्री की आराधना शुरू की। कहा जाता है कि वे प्रतिदिन मंत्रोच्चारण के साथ एक लाख आहुतियां अर्पित करते थे। उन्होंने पूरे 18 वर्षों तक अत्यंत श्रद्धा और नियमपूर्वक यह साधना की। राजा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी सावित्री उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें वरदान देते हुए कहा कि जल्द ही उनके घर एक तेजस्वी कन्या का जन्म होगा।

कुछ समय बाद राजा अश्वपति के घर एक सुंदर और तेजस्वी कन्या ने जन्म लिया। देवी के आशीर्वाद से प्राप्त होने के कारण राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। बचपन से ही सावित्री अत्यंत बुद्धिमान, गुणवान और तेजस्वी थीं। उनकी सुंदरता और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि उनके योग्य वर मिलना कठिन हो गया। राजा अश्वपति अपनी पुत्री के विवाह को लेकर चिंतित रहने लगे।

पिता की चिंता दूर करने के लिए सावित्री ने स्वयं अपने लिए योग्य वर की खोज करने का निर्णय लिया। वह तपोवन और विभिन्न आश्रमों में भ्रमण करने लगीं। इसी दौरान उनकी मुलाकात वन में रहने वाले राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुई। सत्यवान बेहद धर्मपरायण, साहसी और गुणी युवक थे। सावित्री ने उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया।

जब सावित्री ने अपने पिता को सत्यवान के बारे में बताया, तब उसी समय वहां नारद मुनि उपस्थित थे। नारद मुनि ने सावित्री को बताया कि सत्यवान सभी गुणों से युक्त हैं, लेकिन उनकी आयु बहुत कम है और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर राजा अश्वपति चिंतित हो गए और उन्होंने सावित्री को निर्णय बदलने के लिए समझाया। लेकिन सावित्री अपने संकल्प पर अडिग रहीं। उन्होंने कहा कि एक बार जिसे पति मान लिया, उसके अलावा किसी और को स्वीकार नहीं करेंगी। अंततः सावित्री और सत्यवान का विवाह हो गया।

विवाह के बाद सावित्री अपने पति और ससुर की सेवा में लग गईं। जैसे-जैसे सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आने लगा, सावित्री ने कठोर व्रत और तपस्या शुरू कर दी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन वे अपने पति के साथ जंगल गईं। लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी यमराज उनके प्राण लेने वहां पहुंचे।

यमराज जब सत्यवान की आत्मा लेकर जाने लगे, तब सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने उन्हें वापस लौटने के लिए कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म और पति के प्रति प्रेम का हवाला देते हुए उनका पीछा नहीं छोड़ा। सावित्री की निष्ठा, भक्ति और दृढ़ संकल्प से यमराज अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री से वरदान मांगने को कहा।

सावित्री ने पहले अपने ससुर का खोया हुआ राज्य और नेत्रज्योति मांगी। फिर अपने पिता के लिए संतान सुख का वरदान मांगा। अंत में उन्होंने स्वयं के लिए सौ पुत्रों की माता बनने का आशीर्वाद मांग लिया। यमराज ने वरदान दे दिया, लेकिन तुरंत उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, क्योंकि पति के बिना सावित्री मां कैसे बन सकती थीं। तब यमराज ने प्रसन्न होकर सत्यवान को पुनर्जीवन प्रदान कर दिया।

इस प्रकार सावित्री ने अपने प्रेम, तपस्या और अटूट विश्वास से अपने पति को मृत्यु के मुख से वापस ला दिया। यही कारण है कि सावित्री को आदर्श पतिव्रता नारी माना जाता है और वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।



धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और बुद्धिमानी से यमराज से सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यही कारण है कि इस व्रत को पति की लंबी आयु और अटूट दांपत्य प्रेम का प्रतीक माना जाता है। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि वट सावित्री व्रत का सही पूजा मुहूर्त क्या है, व्रत में कौन-कौन सी सामग्री लगती है और पारण किस समय किया जाएगा, तो यहां आपको हर जरूरी जानकारी मिलेगी। साथ ही पढ़ें सत्यवान-सावित्री की पूरी कथा, पूजा विधि, व्रत के नियम और ज्येष्ठ अमावस्या से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं। LIVE Updates में जानिए वट सावित्री व्रत 2026 से जुड़ी हर छोटी-बड़ी अपडेट सबसे आसान भाषा में।

वट सावित्री व्रत की पूजा किस समय पर करें:

पूजा के लिए 16 मई 2026 को सुबह 07:12 बजे से 08:24 बजे
अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा।

पीरियड्स में वट सावित्री व्रत कर सकते हैं क्या

वट सावित्री व्रत 2026 डेट

वट सावित्री व्रत 2026 में 16 मई को शनिवार के दिन रखा जाएगा। इस तिथि का व्रत मुख्य तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं।

प्रेग्नेंसी में वट सावित्री व्रत कैसे करें, पीरियड्स आने पर क्या व्रत कर सकते हैं

गर्भवती महिलाएं फलाहार या दूध-फल लेकर व्रत कर सकती हैं।
प्रेग्नेंट महिलाएं अधिक देर तक भूखे रहने से बचें।
वट की पूजा करने तेज धूप में देर तक बाहर न निकलें।
यदि स्वास्थ्य ठीक न हो तो घर में ही पूजा कर लें।
डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता जरूर दें।

वट सावित्री व्रत पर क्यों होती है वट वृक्ष की पूजा, जानें क्या है बरगद के पेड़ का महत्व

इसकी जड़ों में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास होता है। यही वजह है कि इस पेड़ को अक्षय और दिव्य माना गया है। कहा जाता है कि वट वृक्ष कभी आसानी से सूखता नहीं और इसकी शाखाएं लगातार फैलती रहती हैं। इसी कारण इसे दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक भी माना जाता है।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि, यहां जानिए वर अमावस पर पूजन की पूरी जानकारी

MAY 16, 2026 11:55 IST

वट सावित्री व्रत पारण का शुभ मुहूर्त

कुछ जगहों पर अमावस्या तिथि समाप्त होते ही पारण करने की मान्यता है। जो महिलाएं अगले दिन पारण करेंगी, उनके लिए 17 मई सुबह 5:31 बजे से 7:00 बजे तक का समय अत्यंत शुभ माना गया है।
MAY 16, 2026 10:58 IST

वट सावित्री व्रत की आरती (Vat Savitri Vrat Aarti Lyrics)

अश्वपती पुसता झाला।। नारद सागंताती तयाला।।

अल्पायुषी स त्यवंत।। सावित्री ने कां प्रणीला।।
आणखी वर वरी बाळे।।मनी निश्चय जो केला।।

आरती वडराजा।।

दयावंत यमदूजा। सत्यवंत ही सावित्री।

भावे करीन मी पूजा। आरती वडराजा ।।

ज्येष्ठमास त्रयोदशी। करिती पूजन वडाशी ।।

त्रिरात व्रत करूनीया। जिंकी तू सत्यवंताशी।

आरती वडराजा ।।

स्वर्गावारी जाऊनिया। अग्निखांब कचळीला।।

धर्मराजा उचकला। हत्या घालिल जीवाला। येश्र गे पतिव्रते। पती नेई गे आपुला।।

आरती वडराजा ।।

जाऊनिया यमापाशी। मागतसे आपुला पती।

चारी वर देऊनिया। दयावंता द्यावा पती।

आरती वडराजा ।।

पतिव्रते तुझी कीर्ती। ऐकुनि ज्या नारी।।

तुझे व्रत आचरती। तुझी भुवने पावती।।

आरती वडराजा ।।

पतिव्रते तुझी स्तुती। त्रिभुवनी ज्या करिती।।

स्वर्गी पुष्पवृष्टी करूनिया। आणिलासी आपुला पती।।

अभय देऊनिया। पतिव्रते तारी त्यासी।।

आरती वडराजा ।।
MAY 16, 2026 10:55 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-12

आरती ॐ जय जगदीश हरे

ॐ जय जगदीश हरे, प्रभु जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट, क्षण में दूर करे।।
जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का।
सुख-सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का।।
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी।।
तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी।।
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता।।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति।।
दीनबन्धु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे।।
विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा।।
श्री जगदीश जी की आरती, जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावे।।
MAY 16, 2026 10:54 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-11

आरती शिवजी की

जय शिव ओंकारा हर शिव ओंकारा,
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा।।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे,
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे।।
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज सोहे,
तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे।।
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी,
चंदन मृगमद सोहे भाले शुभकारी।।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे,
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे।।
कर मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूल धर्ता,
जगकर्ता जगहर्ता जगपालनकर्ता।।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका,
प्रणवाक्षर की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पत्ति पावे।।
MAY 16, 2026 10:54 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-10

ऐसा कहकर फाँस को लिये हुए यमराज ने सत्यवत (सत्यवान) के शरीर से अंगुष्ठमात्र शरीर वाले पुरुष (जीवात्मा) को बलपूर्वक निकाल लिया। इसके बाद पितृलोक से संबंधित यमपुरी के मार्ग की ओर चलना शुरू किया, तो वरारोहा सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चली।
यम ने पतिव्रता होने के नाते चलने में न थकती हुई उससे कहा– हे सावित्री! एक मुहूर्त हुआ तुम यहाँ तक मेरे साथ आ गई, अब लौट जाओ। हे विशाल नेत्रों वाली! कोई जीव बिना आयु समाप्त हुए इस यमपुरी के मार्गों पर नहीं आ सकता।

सावित्री ने कहा– आपके जैसे विशिष्ट पुरुष के साथ पति का अनुसरण करती हुई मुझे कभी भी शर्य या ग्लानि नहीं हो सकती। सज्जनों की गति (सहारा) एकमात्र सज्जन ही हैं, दूसरा नहीं। इसी प्रकार स्त्रियों की गति उनका पति, वर्णाश्रमों की गति वेद और शिष्टों की गति गुरु हैं। इस संसार में सब प्राणियों के लिये स्त्रियों के लिये तो एक मात्र पति को छोड़कर दूसरा कोई आधार (स्थान) नहीं है। इस प्रकार से धर्म तथा अर्थ से भरे हुए सुन्दर मधुर अन्य वचनों से भी मृत्युपति (यमराज) ने प्रसन्न होकर सावित्री से यह बात कही।

यमराज ने कहा– हे भामिनि! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, तुम मुझसे वर माँगो। उस (सावित्री) ने भी विनय से सिर झुका कर अपने लिये राज्य पाने का वर माँगा और अपने महात्मा श्वसुर के लिये देखने की शक्ति पाने के साथ-साथ पुनः राज्य-प्राप्ति एवं अपने पिता के लिये सौ पुत्रों की तथा अपने लिये भी सौ पुत्रों की प्राप्ति के लिए वर माँगा। पर पति के लिए जीवनदान एवं निरन्तर धर्म की सिद्धि प्राप्त करने के वरदान माँगा। इस प्रकार वर माँगने पर यमराज (यमराज) ने भी उसे अभीष्ट वर प्रदान कर वापस किया। उसके बाद सावित्री पति का जीवनदान प्राप्त कर प्रसन्नचित्त होती हुई अपने पति के साथ शान्ति से अपने आश्रम को चली गई। उसी सावित्री ने ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन इस सावित्री व्रत को किया था, जिसके प्रभाव से राजा (द्युमत्सेन) को पुनः नेत्र की प्राप्ति हुई। उसके बाद उन्हें निष्कंटक अपने देश तथा राज्य की प्राप्ति हुई और सावित्री के पिता को सौ पुत्र तथा सावित्री को भी सौ पुत्र प्राप्त हुए।

इस प्रकार सावित्री व्रत के सम्पूर्ण माहात्म्य को मैंने तुमसे कह दिया।

पार्वती जी ने कहा- हे देव! सावित्री के द्वारा किया हुआ वह महान व्रत किस प्रकार का है और ज्येष्ठमास में उसका विधान कैसे किया जाता है।
वे विष्णो! उस व्रत के देवता कौन हैं? कौन-कौन मंत्र हैं? क्या फल है? सो हे महेश! इस सनातन धर्म को विस्तारपूर्वक आप मुझसे कहें।
ईश्वर (शंकर) जी ने कहा- हे देवदेवि! सावित्री व्रत को आदरपूर्वक सुनो हे महाभागे! उस सती (सावित्री) ने जिस प्रकार से इस व्रत को किया, उसे मैं कह रहा हूँ।
हे भामिनि! ज्येष्ठशुक्ल की चतुर्दशी तिथि के दिन प्रातः दन्त-धावन कर चुकने के बाद तीन रात्रि तक उपवास करने का नियम करो। यदि व्रती अशक्त (उपवास करने में असमर्थ) हो तो त्रिरात्रि होकर ज्येष्ठ की रात्रि में उपवास कर और चतुर्दशी के दिन बिना मांगे प्राप्त हुए अन्न को ग्रहण करे तथा पूर्णिमा के दिन उपवास करे।

हे सुभगे! प्रतिदिन तलाव, महानदी या झरना अथवा पाण्डु-वृक्ष में स्नान करने से सर्वपापों का फल प्राप्त करेंगे।
ये यथाशक्ति! विशेष करके पूर्णिमा में सरसों और मृतिका मिश्रित जल से स्नान करना चाहिए। प्रस्थ (६४ रुपये) अटे लायक पात्र में बालू भर कर अथवा यव, शालिधान्य, तिल आदि भरे, फिर दो वस्त्र के टुकड़ों से वेष्टित बाँस की डलियों में सब अवयवों से सुशोभित सुवर्ण या मिट्टी अथवा काष्ठ की बनी हुई सावित्री की प्रतिमा को रखकर, उसमें सावित्री के लिये दो वस्त्र देवे और ब्रह्मा की प्रतिमा के लिये श्वेतवस्त्र देवे। इस प्रकार से ब्रह्मा के साथ सावित्री का यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन करो। पूर्ण तैयार हुए तरोई, कौड़ी, नारियल, खजूर, बेंत, अनार, नींबू, जंबीरी नींबू, नारंगी, बिजौरा, कटहल, जीरा, काली मिर्च के दाने, गुड़, सेंधा नमक एवं अंकुरित सप्तधान्य को बाँस की बनी हुई डलिया में रखकर सुशोभित वस्त्र से वेष्टित कर कंकुम-केशर के रंग से रंग देवे।

इस प्रकार से ब्रह्माजी की प्रिया सावित्री की स्थापना होती है। ब्रह्मा के साथ उस सावित्री प्रतिमा का मंत्र के साथ पूजन करो। इतर पुराणों में यह मंत्र कहा हुआ है, जिसके पूर्व में ॐकार यह वर्ण है— “ऐसी वीणा और पुस्तक धारण करने वाली वेदों की जननी हे देवी! तुम्हें नमस्कार है, मुझे विधवा न होने का वरदान दो।”

इस प्रकार से विधिवत पूजन करके वहाँ (पूजा-स्थल) पर रात्रि जागरण की विधि करावो। गाने-बजाने के साथ नर-नारीवृन्द मिलकर नृत्य-शास्त्र में विचार के साथ गायें और हँसी-खुशी के साथ रात्रि व्यतीत करें और सावित्री की कथा अच्छे ब्राह्मणों की प्रतिमा देवो।

इसके बाद सावित्री कल्प (सावित्री-विषयक पूजा-पद्धति) जानने वाले, सावित्री कथा के वाचक, ज्योतिषी, उच्छ्वृत्तिवाले (खलिहान में बिखरे अन्न को बीन कर जीविका चलाने वाले) दरिद्र, अग्निहोत्र कर्म करने वाले ब्राह्मण को इस प्रकार विधिपूर्वक सावित्री प्रतिमा का दान दे। उसी पूर्णिमा को रात्रि में वट के नीचे 14 (चौदह) द्विज-दम्पत्तियों को निमंत्रित करे। उसके बाद प्रभात समय में उनको उपस्थित होने पर भक्ष्य भोजन आदि सामग्री को सावित्रीस्थल (वटवृक्ष के नीचे) ले आवें। बुद्धिमान जन पवित्रता के साथ पाक बनाकर और उसको यत्नपूर्वक रक्षा करके गृहिणीयुक्त निमंत्रित ब्राह्मणों को बुला कर उस सावित्री के पूजन-स्थल में उनका पैर धोकर उन सबों को बैठावें दे देवी। सावित्री के समक्ष उन द्विज दम्पत्तियों को भोजन करावें। इस प्रकार में उन सबों को भोजन कराना मानी पुण्य भोजन कराना हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जो दूसरी बार सावित्री के समक्ष द्विज-दम्पत्तियों को भोजन कराता है, वह मानो केशव भगवान को भोजन कराता है, जिससे प्रसन्न होकर वर देने वाले भगवान विष्णु उन्हें इष्ट वर देते हैं। तीसरी बार भोजन कराने पर सावित्री के सहित ब्रह्माजी का भोजन कराना हो जाता है। वहाँ (सावित्री के समक्ष) एक-एक बार भोजन कराना करोड़-करोड़ बार भोजन कराने के समान समझा जाता है।

हे महादेवी! सावित्री के पूजन-स्थल वट के नीचे 18 प्रकार के श्रेष्ठ भोजन बनाकर देवी (सावित्री) के समक्ष द्विज-दम्पत्तियों को खिलाने से उनके कुल में कोई स्त्री न विधवा, न बन्ध्या, न अभागिनी, न कन्या मात्र को पैदा करने वाली तथा न अपने पति को अप्रिय लगने वाली ही होती है और असत्य आदि नारियों के प्रसिद्ध दोष सभी उसके कुल की स्त्रियों में नहीं होते हैं। इसलिए हे देवि! विष्णु व्रत के साथ सावित्री देवी के आगे कंजूसी-लोभ से रहित हो भोजन देना चाहिए। उस समय स्त्रियों को अम्ल (खट्टा) और क्षार पदार्थ युक्त भोजन कभी नहीं करना चाहिए, बल्कि पाँच प्रकार के मधुर, हृदय को प्रिय लगने वाले तथा सुन्दर रीति से पकाये हुए अन्न का ही भोजन कराना चाहिए, घृत से पूर्ण और अधिक दूध में पड़े हुए पूए बनावें और दूसरे पूए ऐसे बनावें जो वर्ति (सेवई) के रूप में शोक हरने से ‘अशोकवर्तिका’ नाम से प्रसिद्ध हैं। तीसरे पूए खजूर के बने हुए होने चाहिए। चौथे गुड़ और घृत से युक्त संयाव के रूप में होने चाहिए।

प्यारी, धन-धान्य तथा बहुत बड़े कुटुम्ब वाली होती हैं। पुरुषों के दान से उसके कुल में ज्वर, सन्ताप और किसी प्रिय के वियोग का दुःख नहीं होता है।
अशोकवृक्षों के दान से १२ पीढ़ी तक उसका कुल बहुओं, लड़कों, अनगिनत दास-दासियों से भरा रहता है और जो स्त्रियां गुड़ियों को देती हैं उनके कुल में बहुओं के साथ-साथ लड़कियां भी पुण्यिनी होती हैं।
शिवरिणी (सिंदूर) का दान करने वाली युवतियों को उक्त सभी फल प्राप्त होते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। मोदकों (लड्डुओं) के दान से उसका सम्पूर्ण कुल सर्व प्रकार की सिद्धियों से भरा-पूरा रहता है — ऐसा पितामह (ब्रह्माजी) का वचन है।

हे देवी! आठ वर्ष की गौरी (कन्याओं) को भोजन कराने से यह विशिष्ट फल होता है कि वह जन्म-जन्म में सौभाग्यशालिनी, पुण्यिनी, पतिव्रता, धन की वृद्धि से सुशोभित, सहस्रों को भोजन कराने वाली होती है। मुख्य पान (पीने योग्य पदार्थ) जो हृदय को प्रिय लगनेवाले और मधुर हों, जैसे—द्राक्षापान (अंगूर का शर्बत), गुड़ से युक्त इमली का पान, खांड से बने हुए मीठे शर्बत, इसके अतिरिक्त अन्य जो भी योग्य वर्ण सुगन्धित पान हों, उन्हें द्विज-दम्पत्तियों को देना (पिलाना) चाहिए।

विधिपूर्वक पूजन करके उन द्विज-दम्पत्तियों को वस्त्रादि (धोती, साड़ी, कंचुकी आदि) पहनाकर, केंकुम आदि से सुगन्धित वस्तु का लेप शरीर में लगाकर फूल-माला से अलंकृत कर गन्ध-धूप से पूजन करके अंत में नारियल देना चाहिए और उन द्विज-दम्पत्तियों के आंखों में अंजन और मस्तक में सिन्दूर लगाकर मनोहर सुगन्धित और कोमल सुपारियाँ को पात्र में रखकर उनके हाथ में देने के बाद प्रणाम कर उनका विसर्जन कर दें।
अन्त में, इस कृत्य से निवृत्त होकर बन्धु एवं बालकों के साथ स्वयं भोजन करें। यदि पूजन-स्थल में भोजन न कर सकें तो घर जाकर भोजन करना चाहिए, जिससे देवी प्रसन्न हों।
इसी प्रकार से अपने घर आकर पिण्डदानपूर्वक पितरों का सर्वविधि-श्राद्ध करना चाहिए। ऐसा करने से उनके पितृगण ब्रह्मा के एक दिन (४ अरब ३२ करोड़ वर्ष) तक सन्तुष्ट बने रहते हैं। तीर्थ में आठ गुना पुण्य अपने घर में दान देने से होता है क्योंकि द्विजातियों द्वारा किये हुए श्राद्धों को नीच जन नहीं देख पाते। अतः एकान्त गृह में गुप्त रूप से पितरों का श्राद्ध करना उचित होता है, नीच के देखने मात्र से वह श्राद्ध हत (निष्फल) हो जाने से पितरों को नहीं प्राप्त हो पाता है।

इसलिए जहां तक हो सके प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध को गुप्तत्व से करना चाहिए क्योंकि पितरों को तृप्ति देने वाले ऐसे ही श्राद्ध को ब्रह्माजी ने स्वयं बताया है। पूर्वोक्त गौरी (कन्या) का भोजन कराना आदि जो क्रियाएं हैं — वे उमा की क्रियाएं कहलाती हैं और मनुष्यों को कीर्ति प्रदान करने वाली होने से राजसी कही जाती हैं। अपना हित चाहने वाले व्यक्तियों को कहे हुए ये दान सदा देने चाहिए। यदि सात्विक फल की चाहत हो, तो श्राद्ध में विशेष रूप से इस प्रकार के दान देने चाहिए जैसा कि ऊपर कहा गया है।

हे देवी! सावित्री व्रत का उद्यापन सभी प्रकार के पापों से छुटकारा पाने के लिये मनुष्यों को अवश्य करना चाहिए। इसके करने से इच्छा या अनिच्छा से किये हुए सभी पाप तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।[10:50 AM, 5/16/2026] Sanjay Upadhyay: हैं—वे उत्तम कहलाते हैं और मनुष्यों को कीर्ति प्रदान करने वाली होने से राजसी कही जाती हैं, अपना हित चाहने वाले व्यक्तियों को कहे हुए ये दान सदा देने चाहिए। यदि सात्विक फल की चाहत है, तो श्रद्धा में विशेष रूप से इस प्रकार के दान देने चाहिए जैसा कि ऊपर कह आये हैं।

हे देवी! सावित्री व्रत का उद्यापन सभी प्रकार के पापों से छुटकारा पाने के लिये मनुष्यों को अवश्य करना चाहिए। इसके करने से इच्छा या अनिच्छा से किये हुए सभी पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं, जो लोग इस प्रकार से वट सावित्री की यात्रा करते हैं, उनको इस लोक में सौभाग्य, धन, धान्य, सुन्दर स्त्रियाँ विविध रूप में प्राप्त होती हैं। इस यात्रा-विधान को जो कोई मनुष्य भक्तिपूर्वक करता है या इस वटसावित्री व्रत-कथा को सुनता है वह पापों से छुटकारा पा जाता है।

हे देवी! जो पुरुष ज्येष्ठ की पूर्णिमा के दिन विधिपूर्वक सावित्री के पूजन-स्थल (वट-वृक्ष) की १०८ या ५४ अथवा २७ प्रदक्षिणा चलपूर्वक करते हैं तो उनके जन्म अज्ञानवश किये हुए—अगम्या स्त्रियों के साथ गमनादि पाप अथवा अन्य भी किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है, जो उक्त सावित्री के स्थल (वटवृक्ष) के नीचे जाकर श्रद्धा-वन्दन किया करते हैं और अपनी पत्नी के हाथ के लाये हुए पाण्डु-कूप के जल से सावित्री की जड़ों अथवा मिट्टी को अपने हाथ में धारण करते हैं तथा लेकर आकर मंत्रोपासन करते हैं। उनके द्वारा १२ वर्ष तक की संध्योपासना की हुई मानी जाती है। पाण्डु-कूप में स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल होता है। दान देने से १० गुना फल और उपवास करने तथा सुनने से अनन्त फल होता है।
MAY 16, 2026 10:54 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-9

सावित्री ने दुःखित होकर कहा– हे महाबाहो! आप विश्राम करें, पीछे हम श्रम को दूर करने वाले आश्रम को चलेंगे। जैसे ही पृथ्वी पर बैठी हुई सावित्री ने सत्यवान के सिर को अपनी गोद में रखा वैसे ही उसे कृष्णवर्ण, पिंगलवर्ण वाले, किरीटधारी, पीत वस्त्र पहने हुए, साक्षात सूर्य के समान उदित हुए पुरुष को देखा। उसे देखकर सावित्री प्रणाम कर मधुर वचनों में उससे कहने लगी– आप देवताओं अथवा दैत्यों में से कौन हैं, जो मुझे धर्मच्युत करने के लिए आये हैं। मुझे अपने धर्म से च्युत करने के लिए कोई समर्थ नहीं है क्योंकि हे पुरुष श्रेष्ठ! मुझे धधकती आग की लपट के समान ही समझिये।
यमराज ने कहा– मैं सब प्राणियों के लिये शुभंकर और कर्मानुसार उनका उचित दण्ड देने वाला यम हूँ। हे पतिव्रता सावित्री! समीप में पड़े हुए तुम्हारे इस पति की आयु समाप्त हो गई है। इसे यमदूत पकड़ कर नहीं ले जा सकेंगे, इसीलिये मैं स्वयं आया हूँ।
MAY 16, 2026 10:53 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-8

तिथि के सम्बन्ध में आज से चौथे दिन मेरे पति को मरना चाहिए—यह सोचकर तीन रात्रि तक निराहार व्रत रहने का उद्देश्य रखकर रात-दिन आश्रम में स्थिररूप से रहने लगी। इसके बाद तीन रात्रि बीत जाने पर प्रातःकाल (मरण-तिथि वाले दिन) स्नान कर देवताओं का तर्पण करने के बाद चारुहासिनी सावित्री ने सास-ससुर का पद-वन्दन किया। इसके बाद जब कुल्हाड़ी लेकर सत्यवान जंगल की ओर चला तब जाते हुए अपने पति के पीछे-पीछे सावित्री भी चली। वन में पहुँचकर सत्यवान जल्दी से फल, पुष्प, समिधा और कुशा तथा सूखी लकड़ियों को इकट्ठा कर ले जाने योग्य भार बनाने लगा। काटते-काटते उसके सिर में पीड़ा होने लगी, जिससे उस कार्य को छोड़कर वट वृक्ष की एक शाखा का सहारा लेकर सावित्री से कहने लगा—हे सुमुखी! सिर की वेदना मुझे दुःख दे रही है। अतः मैं तुम्हारी गोद में शयन करना चाहता हूँ।
MAY 16, 2026 10:53 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-7

इस प्रकार नारदजी की बात सुनकर राजकन्या सावित्री ने राजा से कहा— राजा लोग किसी से एक बार कोई बात कहते हैं। ब्रह्मदेवता (ब्राह्मण) एक ही बार कहते हैं और एक ही बार कन्या दी जाती है, ये तीनों कर्म एक ही बार किये जाते हैं (बार-बार नहीं)। दीर्घायु हो अथवा अल्पायु, गुणवान हो अथवा निर्गुण, वर को एक बार वरण कर लिया। अब दूसरे वर को वरण नहीं करूँगी। पहले मन से निश्चय करके बाद में उसे वाणी द्वारा प्रकट किया जाता है। पुनः उसके बाद कर्म द्वारा किया जाता है। इससे प्रत्येक कार्य में मन को प्रमाण माना जाता है अर्थात् मन के विरुद्ध कार्य नहीं किया जाता है।

नारदजी ने कहा—‘राजन्! यदि आपको युद्ध हो तो अपनी पुत्री सावित्री को द्यूमत्सेन निपुत्रक के आश्रम में जाकर सत्यवान के साथ वर नारदजी आकाशमार्ग से स्वर्गलोक चले गये। उसके बाद राजा ने भी शुभ मुहूर्त से सम्पन्न वैदिक ब्राह्मणों के द्वारा पुत्री सावित्री का विवाह सम्बन्धी सभी कार्य सम्पन्न किया और तपस्विनी सावित्री भी मनोभिलषित उस (सत्यवान) पति को पाकर ऐसी प्रसन्न हुई जैसे कोई पुण्यवान पुरुष स्वर्ग को देखकर प्रसन्न होता है।
पुनः शिवजी पार्वती से कहते हैं—हे पार्वती! इस प्रकार उस आश्रम में उस समय हुए उन (सावित्री और सत्यवान) के कुछ समय व्यतीत हुए। उस समय केवल एक साध्वी सावित्री ही ऐसी थी कि जिसके चित्त में रात-दिन जो नारद ने कही हुई बात थी, उसकी याद बनी रहती थी। उसके बाद वह दिन बीत जाने पर वह समय (मरण काल का) आ गया कि जिसमें सत्यवान को मरना था।
MAY 16, 2026 10:50 IST

क्या वट सावित्री व्रत में पानी पी सकते हैं

वट सावित्री व्रत करने वाली कुछ महिलाएं निर्जला उपवास करती हैं, जबकि कुछ महिलाएं जल और फलाहार के साथ व्रत पूरा करती हैं।
MAY 16, 2026 10:49 IST

कितनी देर में शुरु होगा वट सावित्री का पूजन



वट सावित्री व्रत का पूजन लगभग 1 घंटे बाद शुरू हो जाएगा। दोपहर 11:50 बजे से 12:45 बजे तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा जो पूजा के लिए सबसे शुभ समय है।
MAY 16, 2026 10:46 IST

वट सावित्री व्रत पर क्या नहीं करना चाहिए

वट वृक्ष की पूजा करते समय उसकी टहनियां या पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसा करना अशुभ माना जाता है।
MAY 16, 2026 10:53 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-6

यह सुनकर नारदजी ने कहा—‘हे राजन्! सावित्री ने यह बड़ा कष्टप्रद कार्य कर डाला। बाल-बुद्धि होने से इसने केवल गुणवान समझ कर सत्यवान को वरण कर लिया है। उसका पिता सत्य बोलता है, माता सत्य बोलती है और वह स्वयं भी सत्य बोलता है। इससे उसका नाम मुनियों ने ‘सत्यवान’ रखा है। उसको नित्य अश्व (घोड़े) प्रिय हैं और वह मिट्टी के घोड़े बनाया करता है तथा चित्र में भी घोड़ों को लिखता रहता है, इससे उसे ‘चित्राश्व’ भी कहते हैं। सत्यवान दान और समान है, ब्राह्मणों की रक्षा करने वाला और सत्यवादी तथा औशीनर शिवि के समान है। ययाति के समान उदार, चन्द्रमा के समान देखने में प्रिय लगने वाला, रूप में दूसरे अश्विनीकुमार के समान और धूमसेन के रन्तिदेव के शिष्य के समान बलवान है, किन्तु उसमें केवल यही एक दोष है—दूसरा कोई नहीं कि सत्यवान आज से ठीक एक वर्ष पर क्षीणायु हो जाने से देहत्याग कर देगा।…
MAY 16, 2026 10:28 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-5

इसीलिए हे पुत्री! मैं तुमको भेज रहा हूँ कि तुम स्वयं अपने योग्य वर ढूँढ़ लो। वृद्ध मंत्रियों के साथ शीघ्र जाओ और मेरी बात को मानो। इसके बाद जैसा कहेंगे वैसा ही होगा।’ ऐसा कह कर सावित्री घर से निकल कर राजर्षियों के रम्य तपोवनों की ओर चल पड़ी और वहाँ पहुँच कर मनीषियों, वृद्धजनों को प्रणाम कर सभी तीर्थों और आश्रमों में जाकर पुनः मंत्रियों के साथ सावित्री अपने गृह पर आ गई और वहाँ पर पिताजी के समक्ष देवर्षि नारद को बैठे हुए देखेगी।
आसन पर बैठे हुए नारदजी को प्रणाम कर मुस्कुराती हुई जिस कार्य के लिए वन में गई थी, सारी कथाएँ उनसे कहने लगी—
सावित्री बोली—‘हे देवर्षि नारदजी! शाल्वदेश में द्युमत्सेन नाम से विख्यात एक क्षत्रिय राजा हैं, जो देववश अन्धे हो गये हैं। उस समय उनका छोटा-सा एक बालक और उसकी माँ थी। ऐसे समय में अवसर पाकर उनका पूर्व वैरी दर्भ नामक एक सामन्त राजा ने उससे राज-पाट छीन लिया। अतः वह आर्य द्युमत्सेन छोटे बच्चे को साथ लिये हुए अपनी स्त्री के साथ जंगल की ओर चले दिये। उनका वह पुत्र वन में ही बड़ा होकर धर्मप्रिय, सत्य बोलने वाला है। अतः अपने अनुरूप पति समझ कर मैंने उसे मन से वरण कर लिया है।
MAY 16, 2026 10:27 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-4

पूष्पांजलि ग्रहण करके सखियों से घिरी हुई, लक्ष्मीदेवी के समान सुन्दररूप से सुशोभित हुई, वरारोहा वह राजकन्या समीप में जाकर पिता के चरणों में प्रणाम कर प्रथम पुष्पांजलि को निवेदित कर, हाथ जोड़कर राजा के पार्श्व में स्थित हुई। युवावस्था को प्राप्त हुई देखकर राजा ने उसके विवाह में मंत्रियों से सलाह की और राजकन्या से कहने लगा—
‘हे पुत्री! तुम्हें योग्य वर देने का समय आ गया है। इधरसे कोई (तुम्हारे तेज से आकर्षित होकर) तुम्हें माँगने के लिए नहीं आता और मैं पिता के कर्तव्य की उपेक्षा कर रहा हूँ। अन्तः हे पुत्री! देवताओं के नियत ये जिस तरह निन्दनीय न होऊँ, वैसा तप करके मैंने धर्मशास्त्रों में पढ़ा और सुना भी है कि जिस पिता के गृह में रहती हुई विवाह के पहले ही जो कन्या रजोधर्म से युक्त हो जाती है, वह शूद्रा के समान समझी जाती है तथा उसके पिता को ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है।
MAY 16, 2026 10:12 IST

कितने बजे शुरू होगा वट सावित्री व्रत का पूजन

आज अभिजीत मुहूर्त लगभग सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा। जिसमें वट सावित्री व्रत का पूजन शुभ रहेगा।
MAY 16, 2026 09:48 IST

आज के व्रत में बरगद की पूजा क्यों की जाती है

पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उसकी परिक्रमा कर धागा बांधती हैं।
MAY 16, 2026 10:17 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-3

वट सावित्री व्रत-कथा

पार्वतीजी ने कहा—हे देवताओं के भी देवता, जगत के पति शंकर भगवान! प्रभासक्षेत्र में स्थित ब्रह्माजी की प्रिया जो सावित्री देवी हैं, उनका चरित्र आप मुझसे कहिए, जिसमें उनके व्रत का माहात्म्य और उनके सत्यनिष्ठ इतिहास से पतिव्रता स्त्रियों के पतित्व को देने वाला, सौभाग्यदायक और महान उदय का करने वाला हो, तब शुक्र भगवान ने कहा—हे महादेवी! प्रभासक्षेत्र में स्थित सावित्री के असाधारण चरित्र को मैं तुमसे कहता हूँ।

हे महेश्वरी! सावित्री-स्थल नामक स्थान में राजकन्या सावित्री ने जिस प्रकार से उत्तम वटसावित्री व्रत का पालन किया।मद्र (मद्रास) देश में एक धर्मात्मा, सभी प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाला, राजधानी तथा राज्य में रहने वाली प्रजाओं का प्रिय अश्वपति नामक राजा था, जो कि क्षमाशील, संतापरहित, सत्यवादी और इन्द्रियों को वश में रखने वाला था। एक समय वह राजा प्रभासक्षेत्र की यात्रा के निमित्त वहाँ पर आया और विधिपूर्वक स्नान करता हुआ सावित्री के स्थल पर पहुँचा। वहीं पर उस राजा ने अपनी रानी के साथ इस व्रत को किया, जो सावित्री के नाम से (सावित्री व्रत से) प्रसिद्ध सभी प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

भूर्भुवः स्वः (भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक) इस मंत्र की साक्षात मूर्ति बन कर स्थित श्रीब्रह्माजी की प्रिया सावित्री देवी उस राजा पर प्रसन्न हुई। कमण्डलु को धारण करने वाली वह सावित्री देवी दर्शन देने के बाद पुनः अदृश्य हो गई और बहुत दिनों के बाद उसी राजा के यहाँ देवी के समान रूप वाली कन्या के रूप में उत्पन्न हुई। सावित्री की प्रसन्नता से प्राप्त तथा सावित्री की पूजा करने के बाद हुई, अतः राजा ने ब्राह्मणों की आज्ञा से अपनी उस कन्या का नाम भी सावित्री रखा।

इसलिए सावित्री सयानी और शरीर धारण की हुई लक्ष्मी के समान शोभित होती हुई बढ़ने लगी और धीरे-धीरे कुमारी अवस्था को प्राप्त हुई। उसे अत्यन्त सुन्दर देह और स्वर्ण की प्रतिमा के समान दिखाई पड़ती थी। लोग उसे देखकर यही समझते थे कि यह कोई देवकन्या है। कमल के समान विशाल नेत्रों वाली एवं तेज से अग्नि के समान तेजस्वी हुई वह सावित्री महर्षि भृगु द्वारा कहे गए सावित्री व्रत को करने लगी।

व्रत के आरम्भ में सुन्दर वर्ण वाली उसे उपवास करके शिर से स्नान को हुई सावित्री देवता की प्रतिमा के पास जाकर अग्नि में हवन करके ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया और उन ब्राह्मणों से अवशिष्ट॥
MAY 16, 2026 09:32 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-2

फिर तीन कुश, तिल, जल से ‘ॐ नमोऽस्तु’ इत्यादि मंत्र पढ़ कर दक्षिणा का संकल्प कर द्वि-दम्पत्तियों को दक्षिणा देकर स्वयं बन्धुओं के साथ भोजन करें।
॥ इति पूजाविधि समाप्त ॥
श्री गणेशाय नमः
MAY 16, 2026 09:31 IST

वत सावित्री व्रत की पूजा विधि भाग-1

वत के मूल में स्नानादि निवृत्य समापन कर चुके के बाद शुद्ध आसन पर बैठ कर कलशस्थापन कर यथाविधि आवाहित पंचदेवों की तथा विष्णु की पूजा कर तीन कुशा और तिल, जल लेकर “ॐ नमोज्येष्ठायै” इत्यादि मूलोक्त संकल्प पढ़ कर स्वर्ण, काष्ठ या मृत्तिका की बनी हुई प्रतिमा सावित्री तथा ब्रह्मा की बना कर अक्षत लेकर “ॐ नमो ब्रह्मणा सह सावित्र्यै। इहागच्छ इह तिष्ठ सुप्रतिष्ठिता भव” इस मंत्र से आवाहन कर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नानीय, पुनराचमनीय को क्रम से “ॐ नमो ब्रह्मणा सह सावित्र्यै नमः” इस मंत्र को पढ़ते हुए अर्पण करें।


इसी प्रकार अनुलेपन, सिन्दूर, अक्षत, श्वेतवस्त्र, रक्तवस्त्र, पुष्प, बिल्वपत्र, पुष्पमाला, गन्ध, धूप, दीप, ताम्बूल, नानाविध नैवेद्य आदि का अर्पण करते हुए सविधि पूजन करें। अन्त में आचमनीय, पुष्पांजलि और नीराजन एवं कपूर, दीप आदि भी अर्पण करें। उसके बाद “ॐ कारुण्यके देवि…” इत्यादि मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करें।

उसके बाद कथा सुनकर नृत्य, गीत, वाद्य आदि से सावित्री की प्रतिमा के समीप रात्रि में जागरण करें और प्रातःकाल होने पर स्नानादि कृत्य से निवृत हो गन्ध, पुष्प व वस्त्रालंकारादि से पूजन कर द्विज-दम्पत्तियों को भोजन करायें। उसके बाद उन दोनों के हाथ में पात्रस्थ सुपारी, नारियल का फल देकर दक्षिणार्पण से उन्हें सन्तुष्ट “ॐ नमो ब्रह्मणा” इत्यादि मन्त्र से विसर्जन करें।
MAY 16, 2026 09:30 IST

वट सावित्री व्रट कैसे करें

वट सावित्री व्रत में सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें। फिर बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री-सत्यवान की पूजा करें। पेड़ पर कच्चा धागा लपेटकर परिक्रमा करें और व्रत कथा सुनें। अंत में आरती कर पति की लंबी आयु की कामना करें।